वंदे मातरम् न गाने पर सजा नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से क्यों कही यह बात; 1986 के फैसले की याद भी दिलाई
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राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' को लेकर बीते एक साल से कंट्रोवर्सी चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मंगलवार को एक अहम टिप्पणी की है।
नेशनल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (22 सितंबर) को केंद्र सरकार से कहा कि अगर कोई शख्स अपनी अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के चलते 'वंदे मातरम्' गाने से इनकार करता है, तो उसे सजा नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट ने इस मामले में 1986 के एक केस का हवाला दिया, जिसमें राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' नहीं गाने वाले बच्चों के पक्ष में फैसला सुनाया गया था।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने यह टिप्पणी कर्नाटक के गायक टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे।
टीएम कृष्णा ने किस नियम को चुनौती दी?
टीएम कृष्णा ने Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 में 2026 में किए गए संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने गृह मंत्रालय के 28 जनवरी और 9 जुलाई 2026 के आदेशों को भी चुनौती दी।
याचिका में कहा गया कि वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को अनिवार्य रूप से गाने की व्यवस्था से संविधान में मिले कई अधिकारों पर सवाल खड़े होते हैं। इनमें बोलने की आजादी, अंतरात्मा की आजादी, समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता शामिल हैं।
2026 में बदली गई धारा 3 के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत को गाने से रोकता है या ऐसे कार्यक्रम में रुकावट डालता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
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टीएम कृष्णा की ओर से पेश सीनियर एडव्होकेट एस. मुरलीधर ने कहा कि कानून में यह साफ नहीं किया गया है कि यहां 'राष्ट्रीय गीत' से वंदे मातरम् के कितने अंतरों का मतलब है।
उन्होंने यह भी कहा कि छह अंतरों वाले पूरे संस्करण को आधिकारिक रूप से लागू करने और उसे राष्ट्रगान से पहले गाने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल हैं।
उनके मुताबिक, इस बदलाव का असर उन लोगों पर पड़ेगा जो वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों को अपने धार्मिक विश्वास के खिलाफ मानते हैं। ऐसे में यह उनकी धार्मिक आजादी के खिलाफ है।
सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल और वकील के बीच तीखी बहस
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की याचिकाकर्ता के वकील एस. मुरलीधर के साथ तीखी बहस हुई।
मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सेक्युलरिज्म इतनी छोटी सोच वाला नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कानून नक्सलियों के विचार के मुताबिक नहीं बनते।
मुरलीधर ने इस टिप्पणी पर आपत्ति जताई और कहा कि एक कानून अधिकारी को इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने इस टिप्पणी को वापस लेने की मांग भी की।
मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार करते हुए कहा कि उनका इशारा उन लोगों की ओर था जो उनके मुताबिक कानून बनाने की प्रोसेस का सम्मान नहीं करते।
कोर्ट ने कहा- हम इन टिप्पणियों को रिकॉर्ड में नहीं ले रहे
दोनों पक्षों के बीच हुई इस बहस में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया। बेंच ने कहा कि वह इस बातचीत को रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बना रही है।
कोर्ट ने फिलहाल केंद्र को नोटिस जारी नहीं किया, लेकिन साफ संकेत दिया कि अगर कोई व्यक्ति किसी भी वजह से वंदे मातरम् नहीं गाता है, तो 1986 में जो व्यवस्था दी गई थी, उस आधार उसे किसी भी तरह से सजा नहीं दी जा सकती।
1986 में क्या हुआ था?
1986 के बिजॉय एमुनैएल मामले में केरल के तीन स्कूली बच्चों ने धार्मिक और व्यक्तिगत विश्वास के कारण राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मान से खड़े रहते थे।
स्कूल से निकाले जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने बच्चों के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि सम्मान के साथ राष्ट्रगान के समय खड़े रहना पर्याप्त है और किसी व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के खिलाफ गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

