पुलिस का काम प्रोटेस्टर्स को पीटना नहीं: जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज से सुप्रीम कोर्ट जज नाराज, बोले- लोगों के अधिकारों का सम्मान नहीं करोगे तो कानून पर से भरोसा उठ जाएगा
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तस्वीर 20 जुलाई की है। इस दिन CJP के नेतृत्व में हजारों स्टूडेंट और युवाओं ने संसद की ओर मार्च किया था। इस दौरान पुलिस ने लाठी चार्ज और टीयर गैस का इस्तेमाल किया। पैलेट गन यूज करने के भी आरोप हैं। (फोटो सोर्स: ANI)
नेशनल डेस्क। जंतर-मंतर पर स्टूडेंट प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस एक्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि युवा IPS अधिकारियों का खुद लोकेशन पर जाकर प्रदर्शनकारियों को पीटना बेहद दुखद है। उनके मुताबिक, पुलिस अधिकारियों से जिस निष्पक्षता और संयम की उम्मीद की जाती है, वह अब धीरे-धीरे खत्म होती दिख रही है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि पुलिसिंग का मतलब सिर्फ ताकत दिखाना नहीं है। बिना जरूरत ज्यादा बल इस्तेमाल किए और लोगों के अधिकारों का उल्लंघन किए बिना भी प्रभावी तरीके से कानून-व्यवस्था संभाली जा सकती है।
जस्टिस भुइयां ने ये बातें रिटायर्ड IPS अधिकारी यशोवर्धन आजाद की किताब ‘Policing the Republic’ के लॉन्च के मौके पर कहीं।
‘पुलिस का काम लोगों के अधिकारों की रक्षा करना’
जस्टिस भुइयां ने कहा कि आम आदमी के लिए सड़क पर सीटी और लाठी लेकर खड़ा पुलिसकर्मी सरकार की ताकत और उसके अधिकार का चेहरा होता है। जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ गलत हुआ है तो वह पुलिस से मदद की उम्मीद करता है।
ऐसे में पुलिस पर लोगों का भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस ही लोगों के अधिकारों का सम्मान नहीं करेगी तो कानून में लोगों का भरोसा कमजोर होगा।

पुलिस पर आरोपों की जांच कर रही है सुप्रीम कोर्ट की जांच कमेटी
छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स के एक्शन की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट हाईलेवल कमेटी बना चुका है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली कमेटी लाठीचार्ज, आंसू गैस, पेलेट गन और इलेक्ट्रॉनिक बैटन के इस्तेमाल की जांच कर रही है। महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाने, उनके साथ बदसलूकी या छेड़छाड़ के आरोपों की भी जांच होगी। इसके अलावा CCTV और वीडियो फुटेज भी देखे जाएंगे।
‘हिरासत में मौत सभ्य समाज के सबसे गंभीर अपराधों में से एक’
जस्टिस भुइयां ने पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों और टॉर्चर पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि किसी सभ्य समाज में, जहां कानून का राज है, वहां हिरासत में मौत सबसे गंभीर अपराधों में से एक है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर सरकार के कर्मचारी ही कानून तोड़ने लगें तो इससे लोगों में कानून के प्रति सम्मान कम होगा और समाज में अराजकता बढ़ेगी।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी पुलिसकर्मी के गिरफ्तार करने के बाद नागरिक के मौलिक अधिकार खत्म हो जाते हैं? उनका कहना था कि गिरफ्तारी के बाद भी व्यक्ति के अधिकार बने रहते हैं और पुलिस को कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई करनी चाहिए।
फेक एनकाउंटर पर बोले- यह एक तरह से अपराधी सोच है
जस्टिस भुइयां ने फर्जी एनकाउंटर का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों को हमेशा गंभीरता से लिया है। 2011 के एक फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि फेक एनकाउंटर साबित होने पर इसे बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसी घटनाएं कानून के राज की मूल भावना को ही खत्म कर देती हैं। उन्होंने साफ कहा- एनकाउंटर की सोच एक अपराधी सोच है और यह पुलिसिंग का हिस्सा नहीं हो सकती।
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