सिर्फ हाईकोर्ट जज और वकील ही क्यों: जस्टिस उज्जवल भुइयां का कॉलेजियम पर सवाल, बोले- टॉप लॉ स्कॉलर्स को भी सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया जाए
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जस्टिस उज्जवल भुइयां रविवार (30 अगस्त) नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 13वें कॉन्वोकेशन इवेंट में शरीक हुए थे।
नेशनल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश की सबसे बड़ी अदालत में जजों की नियुक्ति को लेकर एक सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ हाईकोर्ट के जजों और प्रैक्टिस कर रहे वकीलों को ही जज बनाने की परंपरा क्यों जारी है? देश के जाने-माने कानून विशेषज्ञों और लॉ स्कॉलर्स को भी सुप्रीम कोर्ट में जज बनने का मौका मिलना चाहिए।
जस्टिस भुइयां ने रविवार को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 13वें कॉन्वोकेशन में बोलते हुए कहा कि संविधान में पहले से ही ऐसे लोगों को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने का रास्ता मौजूद है। संविधान के आर्टिकल 124(3)(c) में ‘Distinguished Jurist’ यानी किसी खास स्तर के कानून विशेषज्ञ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने का प्रावधान है।
76 साल में एक बार भी इस्तेमाल नहीं हुआ प्रावधान
जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान लागू हुए 76 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन अब तक इस प्रावधान के तहत किसी भी कानून एक्सपर्ट को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया गया। उनके मुताबिक, यह अफसोस की बात है कि संविधान में मौजूद यह व्यवस्था अब तक इस्तेमाल नहीं की गई।
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उन्होंने कहा कि इसके पीछे दो वजह हो सकती हैं। या तो केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम मानता है कि भारत की लॉ एकेडमिक में ऐसे विशेषज्ञ नहीं हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए गंभीरता से देखा जा सके। या फिर इस प्रावधान पर अब तक ठीक से विचार ही नहीं किया गया।
‘स्कॉलर को कोर्ट का अनुभव नहीं’ वाली दलील पर भी सवाल
जस्टिस भुइयां ने उस आम दलील को भी खारिज किया कि कानून के प्रोफेसर या स्कॉलर अदालत में प्रैक्टिस नहीं करते, इसलिए उनमें जज बनने के लिए जरूरी प्रैक्टिकल अनुभव नहीं होता। उन्होंने इस तर्क को गलत बताया।

उन्होंने कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और केन्या जैसे देशों में जाने-माने कानून विशेषज्ञ और अकादमिक स्कॉलर जज बनते रहे हैं। ऐसे लोगों की खासियत यह होती है कि वे कानून को सिर्फ रोजमर्रा के कोर्ट केस के नजरिए से नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक और संवैधानिक सवालों के नजरिए से देखते हैं।
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'मुश्किल संवैधानिक मामलों में मदद कर सकती है अकादमिक सोच'
जस्टिस भुइयां के मुताबिक, संविधान में ‘Distinguished Jurist’ का प्रावधान रखने के पीछे एक खास सोच थी। ऐसे कानून विशेषज्ञ अपनी रिसर्च और अकादमिक काम के चलते कानून को अलग नजरिए से देखते और समझते हैं। इससे वे बेहद कठिन सार्वजनिक और संवैधानिक मामलों पर फैसला लेते वक्त मददगार साबित हो सकते हैं।
उनका मानना है कि ऐसे विशेषज्ञों को सुप्रीम कोर्ट में शामिल करने से बेंच में अलग-अलग तरह का अनुभव और सोच आएगी। इससे देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसलों में कानून पर रिसर्च और नई सोच का फायदा मिल सकता है।

