SIR पर बॉम्बे हाईकोर्ट की चुनाव आयोग को दो टूक: सॉफ्टवेयर के हिसाब से नहीं, कानून के मुताबिक चलिए; 6 वोटरों के नाम कटने पर पूछा- बिना सुनवाई कैसे हटाया
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने SIR के दौरान वोटरों के नाम हटाने की प्रोसेस पर चुनाव आयोग से कई सवाल पूछे।
नेशनल डेस्क। वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रोसेस को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को कुछ ऐसा सुनाया, जो अब सुर्खियों में है। कोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि SIR के नाम पर ऐसा नहीं हो सकता कि कानून और नियम पीछे रह जाएं और पूरा काम सॉफ्टवेयर के हिसाब से होने लगे।
मामला मुंबई के सांता क्रूज इलाके के एक परिवार के 6 सदस्यों से जुड़ा है। SIR के दौरान इन सभी के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। परिवार ने विधानसभा क्षेत्र के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में शिफ्ट किया था। इन्होंने एड्रेस बदलने के लिए फॉर्म-8 भी भरा था, लेकिन इसके बावजूद उनके नाम डिलीट हो गए। मामले की सुनवाई जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और अमित जामसांडेकर की डिवीजन बेंच कर रही थी।
'बिना सुनवाई किसी का नाम कैसे हटा सकते हैं?'
कोर्ट ने चुनाव आयोग से सीधा सवाल किया कि Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules में ऐसा अधिकार कहां दिया गया है, जिसके तहत किसी वोटर को सुनवाई का मौका दिए बिना उसका नाम वोटर लिस्ट से हटाया जा सके।
बेंच ने कहा- हमें कानून में दिखाइए कि बिना सुनवाई के नाम हटाने का अधिकार कहां है। अगर किसी का नाम हटाना है तो पहले उसे अपनी बात रखने का मौका देना होगा। कोर्ट ने संबंधित Electoral Registration Officer (ERO) को भी अगली सुनवाई में मौजूद रहने का निर्देश दिया।
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EC ने कहा- SIR में फॉर्म-8 काम नहीं कर रहा था
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरिश अग्नि ने बताया कि SIR के दौरान सिस्टम में फॉर्म-8 को प्रोसेस करने की सुविधा नहीं थी। इसी वजह से परिवार के सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हट गए। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर सिस्टम किसी अधिकारी को कानून के मुताबिक काम करने ही नहीं देता, तो यह गंभीर सवाल है।
बेंच ने कहा कि ERO के पास सॉफ्टवेयर की ऐसी पहुंच होनी चाहिए, जिससे वह नाम जोड़, हटा या उसमें बदलाव कर सके। ERO को किसी तीसरे व्यक्ति या सॉफ्टवेयर के निर्देशों पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने साफ कहा कि पहले कानून और नियम हैं, तकनीक बाद में। बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई लीगल वोटर सिर्फ तकनीकी दिक्कत की वजह से वोट देने के अधिकार से बाहर न हो। कोर्ट ने कहा- चुनाव आयोग को वोटर के लिए काम करना चाहिए। आखिरकार उनकी जिम्मेदारी है कि कोई वोटर न छूटे।
'यह तो कानून और नियमों को कुछ वक्त के लिए रोकने जैसा है'
जब EC की ओर से कहा गया कि SIR के दौरान फॉर्म-8 पर कोई बदलाव नहीं किया जा सकता था, तो कोर्ट ने इस पर भी सवाल उठाया। बेंच ने कहा कि इसका मतलब यह हुआ कि SIR शुरू करके कानून और नियमों को ही कुछ वक्त के लिए किनारे कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि एक अलग प्रोसेस शुरू कर दी जाए और उसके कारण मौजूदा कानून और नियम लागू ही न रहें।
कोर्ट ने कहा कि वह इस पूरी स्थिति से बहुत चिंतित है। बेंच ने यह भी पूछा कि अगर इन 6 लोगों को कोर्ट आना पड़ा, तो ऐसे कितने और वोटर होंगे जो कोर्ट तक नहीं पहुंच पाए?
EC के वकील ने जब यह कहा कि आयोग की किसी का नाम जानबूझकर हटाने की मंशा नहीं थी। इस पर कोर्ट ने दोहराया कि किसी व्यक्ति को सुनवाई का मौका दिए बिना उसका नाम हटाना कानून के मुताबिक नहीं है।
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'Form 6 भरने को क्यों कहा, जब Form 8 की सुविधा ही नहीं दी'
EC की ओर से कहा गया कि कुछ ऐसे वोटर, जिनके नाम SIR के दौरान हटे थे, उन्होंने बाद में फॉर्म-6 भरकर अपने नाम दोबारा जुड़वा लिए। आयोग ने यह भी कहा कि इस परिवार ने न तो enumeration form जमा किया और न ही फॉर्म-6 भरने को तैयार हुए।
इस पर कोर्ट ने आयोग की दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब सिस्टम ने फॉर्म-8 के जरिए एड्रेस बदलने की सुविधा ही नहीं दी, तो परिवार से फॉर्म-6 भरने के लिए कहने का कोई मतलब ही नहीं था।
कोर्ट ने कहा- SIR भी कानून के दायरे में ही होगा
बेंच ने कहा कि SIR कोई ऐसी अलग प्रोसेस नहीं हो सकती, जो मौजूदा कानून और नियमों से ऊपर हो। कोर्ट के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया को कानून के हिसाब से ही चलना होगा। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग जितनी बार चाहे वोटर लिस्ट में रिवीजन कर सकता है, लेकिन रिवीजन के दौरान भी किसी भी योग्य वोटर का नाम हटाया नहीं जा सकता।

