IPL में अब भी खिलाड़ी टीम बदल सकते हैं: कब तक खुली है ट्रांसफर विंडो, जानिए नियम और बाकी सबकुछ
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IPL 2025 सीजन रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) ने जीता था। यह इस टीम का पहला खिताब है।
स्पोर्ट्स डेस्क. इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) इतिहास की सबसे बड़ी ट्रेड इस बार देखने को मिली है। राजस्थान रॉयल्स (RR) संजू सैमसन को देकर चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) से बदले में ऑलराउंडर रवींद्र जडेजा और सैम करन लिए हैं। भारतीय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी भी ट्रांसफर हुए हैं। वे सनराइजर्स हैदराबाद से अब लखनऊ सुपर जायंट्स में पहुंच गए हैं।
अर्जुन तेंदुलकर, मयंक मारकंडे, नीतीश राणा और डोनोवन फरेरा की टीम भी बदल गई है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...
सबसे बड़ी बात ये है कि ट्रांसफर विंडो अभी बंद नहीं हुई है। इसके लिए अभी समय है। ऐसे में अभी और भी खिलाड़ी टीम बदल सकते हैं। हालांकि इसकी संभावना बेहद कम है।
IPL ट्रेड यानी ट्रांसफर विंडो को लेकर फैन्स के मन में कई तरह के सवाल होते हैं। IPL हर साल होता है। ऐसे में एक सवाल तो यही होता है कि आखिर यह ट्रांसफर विंडो क्या है। इससे किसे फायदा होता है और किसे नुकसान। दो फ्रेंचाइजी खिलाड़ियों का ट्रांसफर या ट्रेड कैसे करती हैं।
क्या इस पूरी ट्रांसफर की प्रोसेस में प्लेयर को भी कोई अधिकार होते हैं? क्या उन्हें भी कोई फायदा होता है? आइए जानते हैं इन्हीं सब सवालों के जवाब…
ट्रांसफर विंडो क्या है?
दो IPL सीजन और ऑक्शन के बीच फ्रेंचाइजीज के बीच खिलाड़ियों की अदला-बदली या प्लेयर्स की ट्रेड को ही ट्रांसफर विंडो कहते हैं।
कब शुरू हुई ट्रांसफर विंडो?
IPL का पहला सीजन 2008 में हुआ था, लेकिन पहली ट्रांसफर विंडो 2009 में शुरू हुई। पहली डील आशीष नेहरा और शिखर धवन को लेकर मुंबई इंडियंस और दिल्ली डेयरडेविल्स (अब दिल्ली कैपिटल्स यानी DC) के बीच हुई थी। धवन मुंबई और नेहरा दिल्ली टीम में गए थे।
किस तरह होता है प्लेयर्स का ट्रांसफर?
ट्रांसफर विंडो के तहत खिलाड़ियों की ट्रेड दो तरह प्लेयर फॉर प्लेयर और प्लेयर फॉर कैश से होती है। प्लेयर फॉर प्लेयर को दो तरफा ट्रेड और प्लेयर फॉर कैश को एक तरफा ट्रेड भी कहते हैं।
प्लेयर फॉर कैश: जब कोई फ्रेंचाइजी अपने प्लेयर को देने के बदले में रुपए लेती है, तो इसे प्लेयर फॉर कैश डील कहा जाता है। जैसे- 2024 सीजन में हार्दिक पंड्या के लिए गुजरात टाइटन्स (GT) और मुंबई इंडियंस (MI) के बीच डील हुई थी। मुंबई ने पंड्या को 15 करोड़ रुपये में लिया था।
प्लेयर फॉर प्लेयर: जब दो फ्रेंचाइजी आपस में प्लेयर्स को बदलती हैं, तो इसे प्लेयर फॉर प्लेयर डील कहा जाता है। इसमें खिलाड़ियों के बीच कीमत में जो अंतर होता है, उसे खरीदने वाली टीम को चुकाना पड़ता है। 2019 में सनराइजर्स हैदराबाद (SRH) ने शिखर धवन देकर दिल्ली कैपिटल्स (DC) से तीन खिलाड़ी लिए थे।
ट्रेड में प्लेयर को कोई अधिकार होते हैं?
ट्रांसफर विंडो में कोई भी डील खिलाड़ी की मर्जी के बगैर नहीं हो सकती। प्लेयर को यह अधिकार होता है कि वो डील को मना भी कर सकता है। इसके अलावा यदि कोई प्लेयर ट्रांसफर विंडो के तहत दूसरी टीम में जाना चाहता है, तो उसे फ्रेंचाइजी की मंजूरी चाहिए होती है। यहां फ्रेंचाइजी इनकार करने का अधिकार रखती है।
2010 का एक मामला इसमें सटीक बैठता है। जब राजस्थान रॉयल्स (RR) के रवींद्र जडेजा ने बगैर फ्रेंचाइजी को बताए दूसरी टीम से डील कर ली थी। साथ ही राजस्थान फ्रेंचाइजी के साथ नए कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करने से मना कर दिया था। तब जडेजा पर नियम तोड़ने के मामले में एक साल का बैन लगा था।
क्या ट्रांसफर फीस भी होती है?
जी हां, कोई टीम किसी खिलाड़ी को खरीदने के लिए एक्स्ट्रा रुपए चुका सकती है। इसे ही ट्रांसफर फीस कहते हैं। यह फीस कोई और नहीं बल्कि दोनों फ्रेंचाइजी आपसी समझौते से तय करती हैं। इस ट्रांसफर फीस की कोई लिमिट भी नहीं है। इसके लिए IPL गवर्निंग काउंसिल की मंजूरी जरूरी होती है।
क्या ट्रांसफर फीस में प्लेयर को कुछ मिलता है?
जरूरी नहीं है कि खिलाड़ी को ट्रांसफर फीस में हिस्सा मिले। मगर कई बार मिलता भी है। यह हिस्सा कितना होगा, यह प्लेयर और फ्रेंचाइजी के बीच सहमति के हिसाब तय होता है। इसका खुलासा भी बहुत ही कम होता है। रिपोर्ट्स की मानें तो ट्रांसफर फीस में प्लेयर को कम से कम 50% हिस्सा मिलता है।
विंडो कब से कब तक खुली होती है?
दो IPL सीजन और ऑक्शन के बीच यह ट्रांसफर विंडो हमेशा ओपन होती है। यह IPL सीजन खत्म होने के 1 महीने बाद ओपन होती है, जो अगले ऑक्शन से एक हफ्ते पहले तक चलती है। ऑक्शन के बाद फिर विंडो ओपन होती है, तो अगले IPL सीजन शुरू होने से एक महीने पहले बंद होती है।

