वुमन यूरिनल छिपाने के लिए गमले थे: सिर्फ स्कर्ट वाली प्लेयर्स खेल सकती थीं; अब उसी मैदान के ऑनर्स बोर्ड हमारी प्लेयर्स
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स्पोर्ट्स डेस्क. लॉर्ड्स... यहां खेलना हर क्रिकेटर का सपना होता है। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था, जब इसी लॉर्ड्स ग्राउंड में वुमन्स क्रिकेटर के लिए न बराबरी थी और न सुविधाएं….
50 साल पहले (1976) महिलाओं को लॉन्ग रूम से एंट्री तक नहीं मिली। ड्रेसिंग रूम में यूरिनल छिपाने के लिए गमले रख दिए गए। जीत के बाद सेलिब्रेशन के लिए ग्लास तक नहीं थे।
आज वक्त बदला... और कहानी भी..
13 जुलाई 2026 को उसी लॉर्ड्स में भारतीय वुमन्स टीम ने इंग्लैंड को 270 रन से हराकर अपना पहला टेस्ट जीत लिया। जिस मैदान पर कभी महिलाओं को साइड वाले रास्ते से भेजा जाता था, आज वहीं भारतीय खिलाड़ियों के नाम ऑनर्स बोर्ड पर दर्ज हैं।
50 साल का यह सफर सिर्फ एक जीत की कहानी नहीं है। यह स्ट्रगल, उम्मीद, बराबरी और सपनों के सच होने की कहानी है। इस सफर में कई अनसुनी बातें हैं... कुछ दर्ज हैं, कुछ वक्त के साथ खो गईं।
आज ‘राज एक्सप्रेस’ के इस स्पोर्ट्स स्पेशल में हम ऐसे ही कुछ किस्से-कहानी बयां कर रहे हैं…चलिए शुरू से शुरू करते हैं….
1976... जब लॉर्ड्स वुमन्स के लिए तैयार नहीं था
4 अगस्त 1976 को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की वुमन्स टीमों ने पहली बार लॉर्ड्स में इंटरनेशनल मैच खेला। उस समय लॉर्ड्स पूरी तरह मेन्स क्रिकेट का ग्राउंड माना जाता था। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यहां वुमन्स क्रिकेट भी खेला जाएगा।
इसी वजह से जब वुमन्स प्लेयर ड्रेसिंग रूम पहुंचीं, तो वहां मौजूद यूरिनल को छिपाने के लिए उनमें गमले रख दिए गए थे। इंग्लैंड की पूर्व प्लेयर मेगन लियर ने बाद में बताया- हमारी कप्तान रेचल फ्लिंट ने यह देखकर मजाक में कहा था- ये गमले यहां ज्यादा दिन नहीं टिकेंगे….
हर कदम पर नजर रही
महिला खिलाड़ियों के वेलकम के लिए ड्रेसिंग रूम में फूल रखे गए थे और 2 वुमन अटेंडेंट भी मौजूद थीं। दूसरी तरफ पूरे पवेलियन में स्टाफ तैनात था ताकि कोई खिलाड़ी गलती से मेन्स प्लेयर वाले जोन में न चली जाए।
लॉन्ग रूम से एंट्री तक नहीं मिली
आज लॉर्ड्स का लॉन्ग रूम दुनिया के सबसे फेमस क्रिकेट रास्तों में गिना जाता है। हर प्लेयर ड्रेसिंग रूम से निकलकर यहीं से मैदान पर उतरने का सपना देखता है। लेकिन 1976 में वुमन्स प्लेयर को इस रास्ते से एंट्री की परमिशन नहीं मिली। कप्तान रेचल फ्लिंट टीम को साइड वाले रास्ते से मैदान पर लेकर गई थीं।

जीत मिली... सेलिब्रेशन के लिए ग्लास तक नहीं थे
इंग्लैंड ने वह मुकाबला जीता था। खिलाड़ी सेलिब्रेशन करना चाहती थीं। ड्रेसिंग रूम में शैम्पेन के लिए ग्लास तक नहीं थे। आखिरकार खिलाड़ियों ने चाय के कप में शैम्पेन डालकर सेलिब्रेशन किया।
इसके बाद, दोबारा लॉर्ड्स में खेलने के लिए महिलाओं को इंतजार करना पड़ा। वजह बताई गई कि ग्राउंड मेन्स क्रिकेट में बिजी रहता है। यानी वुमन्स क्रिकेट उस समय प्रायोरिटी नहीं था।
टीम इंडिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी
सिर्फ लॉर्ड्स ही नहीं, भारतीय महिला क्रिकेट का शुरुआती सफर भी आसान नहीं था। पूर्व कप्तान शांता रंगास्वामी और नूतन गावस्कर बता चुकी हैं कि उस दौर में खिलाड़ियों को मैच फीस तक नहीं मिलती थी। कई बार टीम धर्मशाला में रुकती थी। फर्श पर सोना पड़ता था।
20 खिलाड़ियों के लिए सिर्फ एक टॉयलेट होता था। खाना बड़े प्लास्टिक बाउल्स में आता था और छोटी प्लास्टिक की कटोरियों में खाया जाता था। हालात ऐसे थे कि पूरी टीम के पास सिर्फ 3 बैट होते थे। एक बल्लेबाज आउट होती तो वही बैट, पैड और ग्लव्स अगली बैटर यूज करती थी।
उस समय न स्पॉन्सर थे और न ही अच्छी फैसिलिटी। कई बार विदेश टूर के लिए भी पैसे नहीं होते थे। ऐसे में पूर्व एक्ट्रेस मंदिरा बेदी ने अपनी कमाई का हिस्सा वुमन क्रिकेट को दिया, ताकि प्लेयर इंग्लैंड टूर पर जा सकें। एयर इंडिया ने भी कई बार खिलाड़ियों के टिकट स्पॉन्सर किए।
2026... जब उसी लॉर्ड्स ने नई हिस्ट्री देखी
10 से 13 जुलाई 2026 के बीच खेले गए पहले वुमन्स टेस्ट में भारतीय महिला टीम ने इंग्लैंड को 270 रन से हराकर लॉर्ड्स में अपनी पहली टेस्ट जीत दर्ज की। पहली इनिंग्स में क्रांति गौड़ ने 37 रन देकर 5 विकेट लिए। दूसरी इनिंग्स में यास्तिका भाटिया ने 113 रन की सेंचुरी लगाई।
दोनों प्लेयर्स का नाम लॉर्ड्स के ऑनर्स बोर्ड पर दर्ज हुआ। पहली बार किसी भारतीय महिला खिलाड़ी का नाम इस ऐतिहासिक बोर्ड पर लिखा गया।

