फर्श पर नींद-प्लास्टिक की कटोरी में दाल- 20 प्लेयर्स के लिए 1 टॉयलेट: क्या कुछ नहीं सहा हमारी वर्ल्ड चैंपियन वुमन्स क्रिकेट टीम ने; जानिए खास बातें
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2003 से 2005 तक बॉलीवुड एक्ट्रेस, टीवी ब्रॉडकास्टर मंदिरा बेदी ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम की काफी मदद की। मंदिरा ने अपनी एंडोर्समेंट इनकम इंडियन वुमन क्रिकेट टीम को डोनेट कर दी थी। इस तस्वीर में टीम इंडिया की पूर्व कप्तान मिताली राज के साथ मंदिरा बेदी।
स्पोर्ट्स डेस्क. एक रूमानी सी कहानी…एक आसमां छू लेने का ख्वाब…और एक दिन ये सब आंखों के सामने सच हो जाए, साकार हो जाए तो….? यही तो हुआ 2 नवंबर की रात नवी मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में।
भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने ताकतवर साउथ अफ्रीका को वनडे वर्ल्ड कप के फाइनल में शिकस्त दी और ‘क्वींस ऑफ वर्ल्ड क्रिकेट’ बन गईं। इस जीत के कई किस्से कहानियां पढ़े, सुने और लिखे जाते रहेंगे। इनमें खट्टी मीठी यादें होंगी..कुछ कहा तो कुछ अनकहा सच होगा। सफर चलता रहा है, चलता रहेगा। ये जीत एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। और इस पड़ाव तक भी पहुंचने का सफर भी बहुत मुश्किल रहा। ऐसे ही कुछ बातें यहां जानिए…राज एक्सप्रेस के साथ।
कौन सुना रहा है ये कहानी
लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर की छोटी बहन नूतन गावस्कर। टीम इंडिया की पूर्व कप्तान शांता रंगास्वामी और डायना इदुल्जी।

कुछ मुश्किलों की बानगी
नूतन और शांता ने न्यूज एजेंसी से भारत में महिला क्रिकेट और उसके विश्व विजेता बनने के सफर में आई मुश्किलों और चुनौतियों पर बातचीत की है। नूतन ने भारत में महिला क्रिकेट की मशाल को थामा और उसे यहां तक पहुंचते देखा।
नूतन कहती हैं- शुरुआती दौर में महिला क्रिकेटर्स को इग्नोर किया जाता था। उन्हें खेलने के लिए न तो पैसे मिलते और न सुविधाएं। वो वक्त भी गुजरा जब हमारी प्लेयर्स किसी होटल, लॉज या धर्मशाला की डोरमेट्री में सोती थीं। कई बार सिर्फ फ्लोर ही उनका बिस्तर होता था। कुछ क्रिकेटर बैडिंग साथ ले जाती थीं। नूतन के मुताबिक- 20 महिला क्रिकेटर्स के लिए सिर्फ एक टॉयलेट और वो भी बेसिक हाईजीन के मामले में फिसड्डी। सोचिए क्या होता होगा?
no money, no sponsors
बकौल नूतन - ये तो हमारी आयरन लेडीज ही थीं, जिन्होंने मुश्किलों के आगे हार नहीं मानी। उस दौर में खेलने का पैसा नहीं मिलता था, स्पॉन्सशिप तो दूर की कौड़ी थी। मगर उन लड़कियों को खुद पर यकीन था। वो सिर्फ सम्मान और जुनून के लिए खेलती थीं। हमसे तो यहां तक कहा गया कि वुमन्स क्रिकेट प्रोफेश्नल स्पोर्ट नहीं है। 1973 में वुमन्स क्रिकेट एशोसिएशन ऑफ इंडिया (WCAI) बना तो नूतन ही इसकी सेक्रेटरी थीं।
इंटरनेशनल टूर के लिए पैसा कहां से आया
नूतन आगे कहती हैं- पहला विदेश दौरा हमने न्यूजीलैंड का किया। हमारी कुछ प्लेयर्स NRI फैमिलीज के घर ठहरीं। इसके बाद मशहूर एक्टर मंदिरा बेदी ने अपने कमर्शियल्स से हासिल कमाई हमें डोनेट की, ताकि प्लेयर्स को इंग्लैंड दौरे के लिए टिकट खरीदने में दिक्कत न हो। एयर इंडिया ने उस वक्त कई बार टिकट स्पॉन्सर किए। इसकी वजह यह थी कि हम अपने देश को रिप्रेजेंट कर रहे थे।
पूरी टीम के पास सिर्फ 3 बैट
नूतन दर्द भरी मुस्कान के साथ कहती हैं- प्लेयर्स के पास क्रिकेट गियर्स (खेल का सामान) तो होता ही नहीं था। एक टीम के पास सिर्फ तीन बैट होते थे। दो ओपनर्स ले जातीं थीं। एक बैट वन डाउन यानी तीसरी बैटर के लिए होता था। एक बैटर आउट होती तो उसके पवैलियन में लौटने के बाद वही बैट, पैड्स और ग्लव्स अगली बैटर इस्तेमाल करती। इंटरस्टेट मैचेस में किसी टीम के पास तीन से ज्यादा बैट कभी रहे ही नहीं। मैंने नेशनल लेवल के मैचेस में भी ये कई बार देखा। कम्पलीट क्रिकेट किट होना तो जैसे ‘रेयर लग्जरी’ थी।
टीम इंडिया की पूर्व कप्तान शांता रंगास्वामी कहती हैं- मैच खेलने के लिए अकसर 36 से 48 घंटे का सफर ट्रेन से करना होता था। टिकट अपने पैसे से खरीदते और जनरल कंपार्टमेंट में बैठते। ज्यादातर वक्त डोरमेट्रीज में ही ठहरते। 20 लड़कियों के लिए एक टॉयलेट। बड़े से प्लास्टिक के बाउल में दाल आती। उसे छोटी-छोटी प्लास्टिक की कटोरियों में लेकर खाते। डायना इदुल्जी और शुभांगी कुलकर्णी के लिए मैच फीस तो जैसे कोई ख्वाब हो। बस हमारे पास एक ताकत थी- खुद पर चट्टान सा भरोसा।

तीन बैग और खेल का जुनून
शांता कहती हैं- अकसर लड़कियों के पास तीन बैग होते थे। पीठ पर उनकी बैडिंग। एक कंधे पर किट बैग और दूसरे पर सफर का सामान। हाथ में सूटकेस। आज वो दिन बहुत याद आते हैं। हमें उम्मीद है कि हमारी ये बेटियां देश की क्रिकेट को अब बहुत तेजी से आगे ले जाएंगी। आज जब वर्ल्ड चैंपियन बने हैं तो उम्र दोगुनी हो गई। अब तो ये सफर शुरू समझिए। रास्ता लंबा है। खुद पर यकीन रखना है और बस चलते जाना है….।

