बिना वसीयत बनाए मृत्यु हुई तो क्या होगा: परिवार को किन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है; समझें क्या कहते हैं नियम
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वसीयत नहीं होने पर संपत्ति का बंटवारा सक्सेशन लॉ के तहत किया जाता है। (AI जनरेटेड इमेज)
बिजनेस डेस्क। अक्सर कई लोगों को लगता है कि वे वसीयत नहीं लिखेंगे तो उनका परिवार खुद से सब कुछ आपस में बांट लेगा। कुछ परिवारों में ऐसा ही होता है। लेकिन कई मामलों में वसीयत के न होने पर कन्फ्यूजन, पेपरवर्क और कई बार सालों तक झगड़े हो सकते हैं।
जब कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मर जाता है, तो इन मामलों में संपत्ति का बंटवारा सक्सेशन लॉ (उत्तराधिकार कानून) के मुताबिक किया जाता है। भारत में ये नियम पर्सनल लॉ (व्यक्तिगत कानून) के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे में आप जिस तरह से संपत्ति का बंटवारा करना चाहते हैं, वैसा नहीं होगा।
इच्छा के मुताबिक बंटवारा नहीं होगा
मान लिजिए कि किसी शख्स की इच्छा है कि उसकी सेंविंग का एक हिस्सा ऐसे बच्चे को मिले, जिसे फ्यूचर में ज्यादा पैसों की जरुरत पड़ सकती है। या फिर वह अपनी संपत्ति का एक हिस्सा अपने उस भाई-बहन को देना चाहता है, जिसने उसकी लंबे समय तक देखभाल की है। अब अगर इन इच्छाओं को वसीयत में नहीं लिखा गया, तो बाद में इन्हें साबित करने में मुश्किल हो सकती है।
वसीयत के न होने पर कानून सबसे पहले यह देखता है कि मरने वाले के लीगल उत्तराधिकारी कौन हैं और कानून के मुताबिक उनका हक कितना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि यह लीगल प्रोसेस सही नहीं है। यह एक लीगल स्ट्रक्चर है, जो लोगों की पसंद के बजाय तय नियमों के आधार पर काम करता है। इसी वजह से लोगों को समय रहते अपनी वसीयत बना देनी चाहिए।

संपत्ति के बंटवारे में ज्यादा समय लग सकता है
वसीयत होने का मतलब यह नहीं है कि लीगल प्रोसेस जल्दी खत्म हो जाएगा। हालांकि, इससे परिवार को संपत्ति पर दावा साबित करने में आसानी होती है। परिवार के लिए आगे का प्रोसेस आसान हो जाता है।
वसीयत न होने पर परिवार के लोगों को मरने वाले की संपत्ति पर अपना हक साबित करने के लिए अलग-अलग डॉक्यूमेंट देने पड़ सकते हैं। संपत्ति के नेचर के मुताबिक, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन या गवर्नमेंट डिपार्टमेंट कानूनी वारिस प्रमाण पत्र (Legal Heir Certificate), उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) या अन्य जरूरी डॉक्यूमेंट मांग सकते हैं।
हर संपत्ति और हर मामले में अलग-अलग डॉक्यूमेंट मांगे जा सकते हैं। वहीं बैंक अकाउंट, शेयर, म्यूचुअल फंड, बीमा पॉलिसी और अचल संपत्ति (Immovable Property) के लिए प्रोसेस भी एक जैसा नहीं होता।
सिर्फ नॉमिनी होने से समस्या हल नहीं होगी
अक्सर लोग सोचते हैं कि उन्होंने बैंक अकाउंट, बीमा पॉलिसी या म्यूचुअल फंड में किसी को नॉमिनी बना दिया है तो अब वसीयत बनाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि वसीयत और नॉमिनी दोनों अलग-अलग चीजें हो सकती हैं।
नॉमिनी बनने से संपत्ति या रकम लेने का प्रोसेस आसान हो जाता है। लेकिन हर मामले में नॉमिनी ही संपत्ति का हकदार बने, यह जरुरी नहीं है। संपत्ति पर आखिरी अधिकार लागू कानून, संपत्ति के टाइप और अन्य लीगल फैक्ट्स पर डिपेंड करता है।
कई बार नॉमिनी रकम या संपत्ति पाने में एक रिप्रेजेंटेटिव या गार्जियन की तरह काम करता है। वहीं असली सक्सेसर (उत्तराधिकारी) को लॉ के मुताबिक चुना जाता है। ऐसे में फाइनेंशियल और लॉ एक्सपर्ट आमतौर पर नॉमिनेशन को वसीयत का एक ऑप्शन मानते हैं।

वसीयत लिखना होता है काफी आसान
अक्सर लोग वसीयत लिखने में देरी करते हैं। उन्हें लगता है कि जब वे रिटायर हो जाएंगे, तब वे वसीयत लिखेंगे या जब उनके पास ज्यादा पैसा होगा, तब वे वसीयत लिखेंगे। यह सोच बिल्कुल सही नहीं है, क्योंकि वसीयत लिखना सिर्फ अमीर लोगों का काम नहीं है। अगर आपके पास एक घर, कुछ बैंक अकाउंट, इंश्योरेंस पॉलिसी और इन्वेस्टमेंट हैं तो वसीयत में अपनी इच्छाएं लिखने से आपके परिवार की जिंदगी आसान हो जाती है।
वसीयत को अपडेट करना जरुरी
वसीयत लिखने के बाद अगर हालात बदलते हैं, तो उसे अपडेट कर देना चाहिए। शादी, बच्चे के जन्म, तलाक, नई संपत्ति खरीदने, किसी संपत्ति को बेचने या आपक फाइनेंशियल हालत में बदलाव होने पर वसीयत को अपडेट किया जा सकता है।
वसीयत लिखना क्यों जरुरी
वसीयत लिखने से मरने वाले को फायदा नहीं होता है, बल्कि उसके पीछे छूट जाने वाले परिवार को फायदा पहुंचता है। आज वसीयत लिखने से आपका परिवार बाद में लीगल प्रोसेस और कई तरह की परेशानियों से बच सकता है।
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