भारत के सबसे खूंखार तस्कर वीरप्पन के खात्मे की Inside Story: 2000 हाथियों-184 लोगों की हत्या का आरोप था; कटे सिर से फुटबॉल खेलता था
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वीरप्पन 18 अक्टूबर 2004 को एनकाउंट में मारा गया था।
स्पेशल डेस्क. 1990 का दशक में एक तस्कर ने तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के जंगलों में आतंक मचा रखा था। ये तस्कर इतना खतरनाक था कि जिस फॉरेस्ट ऑफिसर ने इसे एक बार पकड़ा था, उसकी न सिर्फ हत्या कर दी, बल्कि उसके कटे सिर को लेकर साथियों के साथ फुटबॉल खेलने लगा। आज हम बात कर रहे हैं भारत के सबसे खूंखार तस्कर वीरप्पन की...
18 अक्टूबर 2004 को वीरप्पन को एनकाउंट में ढेर कर दिया गया था। आज राज एक्सप्रेस के इस एक्सप्लेनर में वीरप्पन के आतंक से खात्मे तक की पूरी कहानी...
वीरप्पन का पूरा नाम कूज मुनिस्वामी वीरप्पन था। उसका जन्म 18 जनवरी 1952 को गोपीनाथम (कर्नाटक) के घने जंगलों के बीच एक गांव में हुआ। वीरप्पन भारत का सबसे कुख्यात चन्दन तस्कर था। इसके अलावा वो हाथियों के अवैध शिकार, हाथीदांत की तस्करी, किडनैपिंग, पुलिस और फॉरेस्ट अफसरों की हत्या के कई मामलों में आरोपी था।
2000 हाथियों और 184 लोगों की हत्या
14 साल की उम्र में वीरप्पन ने पहली बार हाथी को मारा। 17 साल तक आते आते उसने एक मर्डर भी कर दिया। वीरप्पन पर 2000 से ज्यादा हाथियों और 184 लोगों की हत्या का आरोप था।
वो इतना क्रूर और निर्दयी था कि अपनी जान बचाने के लिए नवजात बच्ची की भी हत्या कर दी थी। दरअसल, वीरप्पन को डर था कि उसकी नवजात बच्ची के रोने की आवाज सुनकर कहीं पुलिस उस तक न पहुंच जाए। बाद में पुलिस ने जंगल में दफन उसकी बच्ची का शव भी बरामद किया था।
वीरप्पन लंबी और घनी मूछें रखता था। 1993 में वीरप्पन ने 21 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। ये पुलिस फोर्स उसे पकड़ने गया था, लेकिन रास्ते में ही वीरप्पन ने बारूदी सुरंग से पुलिसकर्मियों की पूरी बस को उड़ा दिया। बस के परखच्चे उड़ गए और शव टुकड़ों में बिखर गए।
अफसर के कटे सिर से फुटबॉल खेली
1986 में वीरप्पन पकड़ा गया था। बाद में वो 4 पुलिसकर्मियों हत्या कर भाग गया। यही पहला और आखिरी मौका था जब वीरप्पन को गिरफ्तार किया गया था।
फॉरेस्ट अफसर श्रीनिवास से वीरप्पन इतना नाराज था कि उनकी हत्या के बाद वीरप्पन ने उनका सिर काटा और अपने साथियों को बुलाकर श्रीनिवास के कटे सिर के साथ फुटबॉल खेला। कहा जाता है कि श्रीनिवास को वीरप्पन ने सरेंडर करने का झांसा देकर अपने पास बुलाया था।
श्रीनिवास की सख्ती के चलते वीरप्पन परेशान था। यही वजह थी कि वो इस ईमानदार फॉरेस्ट अफसर को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगा था।
साउथ के सुपरस्टार की किडनैपिंग
वीरप्पन ने साल 2000 में दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों- कर्नाटक के एसएम. कृष्णा और तमिलनाडु के करुणानिधि को गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया था। वीरप्पन ने कन्नड़ फिल्मों के सुपर स्टार राजकुमार को किडनैप कर लिया।
इसके बाद कर्नाटक में कई जगह दंगे हुए। राजकुमार को आजाद कराने के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु की सरकारें महीनों तक मीडिएटर्स के जरिए वीरप्पन से बात करती रहीं।

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि दोनों राज्य सरकारों ने करोड़ों रुपये भी वीरप्पन को दिए। हालांकि, दोनों राज्यों ने इस बात से इनकार किया। 108 दिन बाद वीरप्पन ने राजकुमार को छोड़ दिया। जब उनसे सरकार की ओर से दिए गए पैसों को लेकर पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता।
राजकुमार के किडनैपिंग के समय कर्नाटक के डीजीपी रहे सी दिनाकरन ने 2002 में अपनी किताब में दावा किया, ‘राजकुमार को छुड़ाने के लिए 20 करोड़ रुपये दिए गए थे। इस पर काफी विवाद भी हुआ।’
वीरप्पन के खिलाफ कैसे बिछाया गया जाल
"जून 2001 की बात है। मेरे फोन की घंटी बजती है। ये कॉल और किसी का नहीं बल्कि उस वक्त तमिलनाडु की सीएम सहीं जयललिता का था। CM ने कहा, हम आपको तमिलनाडु एसटीएफ का चीफ बना रहे हैं। इस (वीरप्पन) चंदन तस्कर की समस्या कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है।"
एसटीएफ चीफ बनते ही विजय कुमार ने वीरप्पन के बारे में खुफिया जानकारी जुटाना शुरू कर दिया। विजय के मुताबिक, वीरप्पन को पकड़ने के लिए पहले बड़ी टीमें बनाई जाती थीं। टीमें बड़ी होने के चलते वीरप्पन को पहले ही उनके बारे में जानकारी मिल जाती थी। विजय ने 6-6 अफसरों की छोटी टीमें बनाईं।
इसी दौरान उन्हें पता चला कि वीरप्पन की आंख में तकलीफ है। विजय कुमार के मुताबिक, ‘एसटीएफ ने ऐसा जाल बिछाया कि वीरप्पन आंख का इलाज कराने के लिए जंगल से बाहर आने के लिए मजबूर हो गया।’
उसके पास एक एंबुलेंस भेजी गई। इस एंबुलेंस को ले जाने वाले ड्राइवर और हेल्पर हकीकत में एसटीएफ के लोग थे। वीरप्पन को इस तरह से भरोसे में लिया गया कि ये दोनों लोग एसकेएस हॉस्पिटल सेलम से हैं।
20 साल के आतंक का 20 मिनट में अंत
ऑइन दोनों अफसरों को बताया गया था कि उन्हें एंबुलेंस कहां लेकर आनी है। उस जगह पर विजय कुमार अपनी टीम के साथ पहले से तैनात थे। विजय कुमार बताते हैं- हमने रास्ते में भी कुछ लोगों को बैठाया था। एंबुलेंस में वीरप्पन के बैठने के बाद ड्राइवर ने उन्हें संकेत दे दिया था कि वीरप्पन समेत चार लोग एंबुलेंस में बैठे हैं और उनके पास हथियार हैं।
एंबुलेंस को तय रास्ते से लाया जाता है। एक जगह पर एंबुलेंस चला रहे ड्राइवर सरवनन ने तेजी से ब्रेक लगाए। ये ब्रेक इतनी तेज लगाए गए थे कि बहुत तेज आवाज हुई और एंबुलेंस में बैठे सभी लोग अपनी जगह पर गिर गए। सरवनन और इंस्पेक्टर वैल्लईदुरई (हेल्पर) तेजी से एसटीएफ टीम की ओर भागकर पहुंचे और विजय कुमार को बताया कि एंबुलेंस में वीरप्पन है।
वीरप्पन ने पहचाने जाने के डर से अपनी मूछें भी छोटी कर ली थीं। वीरप्पन को एसटीएफ सरेंडर करने के लिए कहती है। लेकिन वो फायरिंग कर देता है। इसके बाद विजय कुमार की टीम भी जवाबी कार्रवाई करती है। 18 अक्टूबर 2004 को 20 मिनट चले एनकाउंटर में वीरप्पन अपने साथियों के साथ ढेर हो गया था। विजय कुमार के मुताबिक, एनकाउंटर में 338 राउंड फायरिंग हुई, लेकिन इनमें से सिर्फ 2 गोलियां वीरप्पन को लगीं। वीरप्पन के शव को जब अस्पताल में लाया गया तो हजारों लोग उसके शव को देखने के लिए जमा हो गए थे।
'एक दानव का अंत'
वीरप्पन की मौत भारत ही नहीं विदेशी मीडिया में भी सुर्खियां बनी। तमाम बड़े मीडिया हाउस ने इस खबर को प्रमुखता से छापा।
बीबीसी ने लिखा- Death of a legendary bandit (कुख्यात डकैत का अंत)
अलजजीरा- India's most wanted gunned down (भारत का वांछित अपराधी मारा गया)
द डॉन- Veerappan- the bandit who lived and died in jungles (वीरप्पन- डकैत जो जंगलों में जन्मा और वहीं मारा गया)
सीएनएन- Police kill India's 'Robin hood' (पुलिस ने भारत के रॉबिनहुड की हत्या की)
गार्जियन - Death of a 'Demon' (एक दानव का अंत)

