18 साल से कम उम्र वालों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद होंगे?: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- IT नियम बदलेंगे, कंपनियों को भारतीय कानून मानने होंगे
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भारत में कर्नाटक पहला ऐसा राज्य है जिसने 16 से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का एक्सेस बैन कर रखा है। आंध्र प्रदेश में भी इस तरह का प्रस्ताव आ गया है। ऐसे में पूरे भारत में इस तरह का कानून लागू करने की मांग हो रही है। (सांकेतिक तस्वीर)
नेशनल डेस्क। अब भारत में भी 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर बैन लग सकता है। केंद्र सरकार इसके लिए Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules में बदलाव कर सकती है। यह बात केन्द्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने खुद सुप्रीम कोर्ट को बताई।
यह मुद्दा Just Rights for Children Alliance की याचिका पर सुनवाई के दौरान उठा। याचिका में बच्चों को ऑनलाइन दुनिया में होने वाले कई तरह के खतरों से बचाने के लिए उम्र की पाबंदी और उसके सख्त पालन की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई की।
कोर्ट ने पूछा- भारत में भी 18 साल की उम्र तय क्यों नहीं?
जस्टिस बागची ने पूछा कि जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अमेरिका में बच्चों के लिए कुछ पाबंदियां रखते हैं, तो भारत में भी उनके प्लेटफॉर्म को भारतीय कानून के हिसाब से क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने केंद्र से यह भी विचार करने को कहा कि क्या इंटरमीडियरी नियमों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर और प्लेटफॉर्म को भारतीय कानूनों के मुताबिक तैयार करने का निर्देश दिया जा सकता है।
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ग्रीक, इंडोनेशिया, मलेशिया, पुर्तगाल और UAE ने 16 से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। किसी देश में यह पूरी तरह बैन है तो किसी देश में कुछ सीमित ऐप पर यह रेस्ट्रिक्शन है। अमेरिका के कैलिफोर्निया स्टेट में भी इस तरह प्रतिबंध लागू है।

केंद्र बोला- भारतीय कानून मानना ही होगा
केंद्र ने यह माना कि 18 साल से कम उम्र के लोगों को सोशल मीडिया अकाउंट खोलने से रोकने के लिए नियम या कानून में साफ प्रावधान करना जरूरी होगा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को भरोसा दिया कि सोशल मीडिया कंपनियों को भारतीय कानून का पालन करना होगा। उन्होंने कहा- उन्हें भारतीय कानूनों के मुताबिक चलना होगा। कुछ किया जा सकता है, कुछ किया जाना चाहिए और कुछ किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि नाबालिग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बीच होने वाला समझौता कानूनी रूप से कितना मान्य है। केंद्र ने कहा कि नाबालिगों और सोशल मीडिया ऐप के बीच ऐसे एग्रीमेंट अमान्य करार माने जा सकते हैं। हालांकि, केंद्र ने यह साफ किया कि एजुकेशनल वेबसाइटों की सदस्यता माता-पिता की सहमति से ली जा सकती है।
NGO ने बताए बच्चों के लिए ये खतरे
याचिका दाखिल करने वाले NGO का कहना है कि इंटरनेट पर बच्चों की उम्र जांचने और उम्र की पाबंदी लागू करने का कोई प्रभावी और एक जैसा सिस्टम नहीं है। इसकी वजह से बच्चे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बना लेते हैं और फिर कई तरह के खतरों में पड़ जाते हैं। इनमें शामिल है...
- ऑनलाइन बच्चों को बहला-फुसलाकर फंसाना
- यौन शोषण का खतरा
- मानव तस्करी
- बच्चों के व्यवहार और पसंद की प्रोफाइलिंग
- निजी डेटा का गलत इस्तेमाल
- साइबर बुलिंग
- उम्र के हिसाब से inappropriate content तक पहुंच
पहले से गाइडलाइन, अब कानून में मजबूती की तैयारी
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एच.एस. फूलका ने कहा कि सरकार के पास इस मुद्दे से जुड़े दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं, लेकिन उन्हें प्रभावी तरीके से लागू करने की जरूरत है।
इसके जवाब में तुषार मेहता ने कहा कि 18 साल की उम्र की सीमा को सिर्फ गाइडलाइन तक सीमित रखने के बजाय इसे कानून या नियमों में मजबूती से शामिल करना चाहिए।
इसके बाद CJI सूर्यकांत ने केंद्र से इस प्रस्ताव को कानूनी आधार देने पर विचार करने और अगली सुनवाई में अपना जवाब देने को कहा।
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