TMC का नाम-निशान दोनों फ्रीज: ममता और बागी गुट अब नए सिंबल से चुनाव लड़ेंगे, दोनों खेमों को नए नाम और चुनाव चिन्ह मिले
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में TMC को 80 सीट मिली। इनमें से 60 से ज्यादा विधायक अब बागी गुट में हैं। ममता के साथ महज 20 विधायक होने की रिपोर्ट्स हैं।
नेशनल डेस्क। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदर चल रही खींचतान अब चुनावी मैदान तक पहुंच गई है। चुनाव आयोग (ECI) ने पार्टी के नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और उसके ‘फूल और घास’ वाले चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह रोक अक्टूबर में होने वाले विधानसभा उपचुनावों को देखते हुए लगाई गई है।
इसका मतलब है कि ममता बनर्जी और बागी गुट दोनों ही फिलहाल TMC के नाम और उसके पुराने चुनाव चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। ऐसे में दोनों खेमों को नया नाम और चुनाव चिन्ह सौंपा गया है। आयोग ने दोनों गुटों से नए पार्टी नाम और चुनाव चिन्ह के लिए विकल्प मांगे थे। दोनों खेमों ने तीन-तीन नाम और तीन-तीन सिंबल चुनाव आयोग को सौंपे थे। इन्हीं में से EC ने इन्हें नई पहचान आवंटित की है।
किसे क्या मिला?
ममता बनर्जी गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम मिला। इनका चुनाव चिन्ह 'फुटबॉल प्लेयर' है। वहीं बागी गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम दिया गया है। इस पक्ष का चुनाव चिन्ह 'लिफाफा' है। यह दोनों नाम और चुनाव चिन्ह महज अक्टूबर में होने वाले विधानसभा उपचुनाव के लिए हैं।
नंदीग्राम और रेजीनगर में हैं उपचुनाव
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव का ऐलान किया है। दोनों गुटों ने इन चुनावों के लिए अपने-अपने उम्मीदवार भी उतारे हैं। ऐसे में आयोग के इस फैसले से दोनों पक्षों की चुनावी पहचान बदल जाएगी।
आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि उसे रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी से पता चला है कि TMC में दो प्रतिद्वंद्वी गुट हैं। एक गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में है, जबकि दूसरा गुट खुद को पार्टी का असली प्रतिनिधि बता रहा है। इसलिए पार्टी का नाम और सिंबल किसी एक को नहीं दिया जा सकता। इस पर अंतिम फैसला आने तक दोनों पार्टियों के लिए पुराने नाम और चुनाव चिन्ह पर रोक लगाई गई है।
1998 से ममता की पहचान रहा है ‘फूल और घास’ का निशान
ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। उन्होंने खुद अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह का स्कैच बनाया था। तभी से 'फूल और घास' पार्टी और ममता की पहचान रही है। करीब 28 साल बाद ऐसा पहली बार होगा जब पश्चिम बंगाल के इन उपचुनावों में TMC नाम और उसका यह चुनाव चिन्ह मतपत्र/EVM पर नहीं होगा।

पार्टी के अंदर कैसे शुरू हुई पूरी लड़ाई?
TMC में यह विवाद 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद सामने आया। बागी विधायकों के एक गुट का नेतृत्व ऋतब्रत बनर्जी ने किया। जून में इस गुट ने करीब 60 से ज्यादा विधायकों के समर्थन का दावा किया और पार्टी संगठन में बदलाव की मांग उठाई। बाद में इस गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाने और सीनियर विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष बनाने का दावा किया।
ममता समर्थक गुट ने इन फैसलों को खारिज किया और ममता बनर्जी को ही पार्टी प्रमुख मानने की बात कही। इसके बाद दोनों पक्ष खुद को असली TMC बताते रहे हैं। हालांकि दो-तिहाई विधायक बागी गुट के पास होने से ममता का पलड़ा बेहद कमजोर रहा है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल चुनाव आयोग ने किसी एक गुट को असली TMC नहीं माना है। उसने दोनों को बराबर मौका देने के लिए पार्टी का मूल नाम और सिंबल फ्रीज किया है। दोनों गुट उपचुनाव में अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ उतरेंगे।
पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अंतिम फैसला बाद में होगा। यानी अभी यह अंतरिम व्यवस्था है, स्थायी फैसला नहीं है। वैसे इतना साफ है कि जिस गुट के पास दो-तिहाई विधायक होंगे, नाम और चुनाव चिन्ह उसी के पास जाएगा। महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP में हुई टूट में यह देखा जा चुका है। ऐसे में बंगाल में बागी गुट का पलड़ा भारी है।
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