'सबसे खराब आदेशों में से एक': इलाहाबाद HC के फैसले पर SC सख्त, फैसला देने वाले जज रिटायरमेंट तक क्रिमिनल केसेज से दूर रहेंगे
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सुप्रीम कोर्ट ने सिविल विवाद को आपराधिक बताने पर सवाल उठाए हैं। (फाइल)
सुप्रीम कोर्ट ने एक सिविल विवाद के मामले में आपराधिक केस की अनुमति देने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज प्रशांत कुमार को फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह हमारे सामने आए सबसे खराब और सबसे गलत आदेशों में से है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रिटायरमेंट तक जस्टिस प्रशांत कुमार क्रिमिनल केसेज की सुनवाई नहीं कर सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जज प्रशांत कुमार हाईकोर्ट में वरिष्ठ जज की बेंच में बैठकर सुनवाई करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा, जज ने न केवल खुद की क्रेडिबिलिटी खतरे में डाली, बल्कि न्याय का भी मजाक उड़ाया है। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हाईकोर्ट के स्तर पर न्यायपालिका में क्या गड़बड़ है।
ये कानून की अज्ञानता- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने कहा, हमें यह सोच कर हैरानी होती है कि क्या ऐसे आदेश किसी बाहरी दबाव में दिए जाते हैं या फिर उन्हें कानून की ही समझ नहीं है। जो भी हो, ऐसे बेतुके और गलत आदेश पारित करना माफी के काबिल नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह गलत आदेश कोई पहला मौका नहीं है। जस्टिस कुमार ने पहले भी इसी तरह के आदेश पारित किए हैं। इसी वजह से यह कदम (आपराधिक मामलों में जज प्रशांत कुमार को सुनवाई से अलग करने) उठाने के अलावा हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा था।
क्या है मामला
यह मामला दो बिजनेसमैन के विवाद का है। एक व्यापारी ने दूसरे को 52.34 लाख का माल बेचा था। उसे 47.75 लाख का पेमेंट भी मिल गया। लेकिन दूसरे व्यापारी ने बाकी रकम नहीं चुकाई। इसके बाद पहले व्यापारी ने दूसरे के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया था। निचली अदालत ने दूसरे व्यापारी के खिलाफ समन जारी किया था। इसे रद्द कराने के लिए दूसरा व्यापारी हाईकोर्ट पहुंचा और इसे दीवानी का केस बताते रद्द करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने दूसरे व्यापारी की याचिका खारिज की
हाईकोर्ट ने मामले में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति दी थी और दूसरे व्यापारी की याचिका को खारिज करते हुए कहा, शिकायतकर्ता दीवानी मुकदमा चलाने की स्थिति में नहीं होगा। इसमें कई साल लगेंगे और उसे केस के लिए काफी पैसा खर्च करना होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

