बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन पर सुनवाई : SC ने कहा-11 डॉक्यूमेंट्स में सिर्फ 1 जरूरी..प्रॉब्लम क्या; पिटिशनर की दलील- ज्यादातर के पास ये भी नहीं
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बिहार में SIR पर विपक्ष को फिर से झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने EC को सही ठहराया है। फाइल फोटो- सोर्स PTI
सुप्रीम कोर्ट में बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन यानी SIR को लेकर लगातार दूसरे दिन सुनवाई की। कोर्ट का कहना है कि चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए 11 में से सिर्फ एक डॉक्यूमेंट मांगे हैं, अगर पूरे ग्यारह मांगते तब समस्या होती। कोर्ट ने कहा कि इलेक्शन कमीशन का यह कदम वोटर फ्रेंडली है। लोगों के पास खुद को वोटर साबित करने के लिए बहुत सारे ऑप्शंस हैं।
EC ने 11 दस्तावेज मेंशन किए थे
दरअसल, 24 जून को SIR की घोषणा करते हुए चुनाव आयोग ने वोटिंग लिस्ट में नाम डालने के लिए 11 दस्तावेज मेंशन किए थे।
ये 11 दस्तावेज, इनमें सिर्फ एक जरूरी
- जन्म प्रमाण पत्र
- पासपोर्ट
- मैट्रिक या उससे ऊपर की शैक्षणिक प्रमाण पत्र
- सरकारी पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश
- मूल निवास प्रमाण पत्र
- वन अधिकार प्रमाण पत्र
- जाति प्रमाण पत्र
- परिवार रजिस्टर
- घर या जमीन का प्रमाण पत्र
- 1 जुलाई 1987 से पहले जारी कोई भी सरकारी पहचान पत्र या प्रमाण पत्र (सरकार, बैंक, पोस्ट ऑफिस, LIC या PSU द्वारा प्रमाणित)
- NRC दस्तावेज (बिहार में लागू नहीं, इसलिए जरूरी नहीं।)
आधार, राशन और वोटर कार्ड शामिल नहीं
गौर करने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग ने इन 11 दस्तावेजों में आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड को शामिल नहीं किया है। इसी वजह से विवाद है। विपक्षी पार्टियों का कहना है कि बिहार की बहुसंख्यक जनता के पास EC के मेंशन किए डॉक्यूमेंट्स नहीं होंगे। जो हैं (आधार और राशन कार्ड) उसे इलेक्शन कमीशन मानने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में लाखों लोग वोटर लिस्ट से बाहर हो सकते हैं।
कोर्ट ने EC को सही ठहराया
मंगलवार को कोर्ट ने EC को सही ठहराते हुए कहा कि आधार सच में नागरिकता का वैलिड प्रूफ नहीं माना सकता। इसे वैलिड मानने से पहले जांच जरूरी है। अब बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने EC को फिर सही ठहराया और कहा कि उन्होंने 11 दस्तावेजों में सिर्फ एक ही मांगे हैं। गलती तब होती, जब पूरे 11 डॉक्यूमेंट मांगते।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के दस्तावेजों की संख्या बढ़ाने के कदम को भले ही वोटर फ्रेंडली बताया, लेकिन यह भी कहा कि इसे ऐसे लागू करें कि किसी वोटर के अधिकारों का हनन न हो।
EC के मांगे दस्तावेज ज्यादातर लोगों के पास नहीं
चुनाव आयोग के खिलाफ केस लड़ रहे सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि SIR के तहत जिन दस्तावेजों की मांग की जा रही है, वे बिहार की ज्यादातर जनता के पास नहीं हैं। बिहार में सिर्फ 1 फीसदी लोगों के पास पासपोर्ट है।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कुछ गड़बड़ियां है, उसे सुधारा जाएगा। उन्होंने कोर्ट से कहा कि बिना सूचना और सुनवाई के किसी भी मतदाता का नाम हटाया नहीं जाएगा।

अब जानिए पूरा मामला है क्या
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को अपडेट करने की प्रक्रिया चल रही है। इसे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कहा जा रहा। चुनाव आयोग ने 24 जून को बिहार में SIR कराने का ऐलान किया था। चुनाव आयोग का कहना है कि लगातार पलायन, युवा वोटरों को शामिल करने, मौतों की सूचना न देने, अवैध विदेशी प्रवासियों के शामिल होने और तेजी से बढ़ते शहरीकरण को देखते हुए वोटर लिस्ट रिवीजन जरूरी है। इससे वोटर लिस्ट में होने वाली गलतियों को सुधारा जा सकेगा।
विवाद का विषय यही है कि विपक्ष को लगता है कि इस प्रक्रिया से लाखों लोग वोटर लिस्ट से बाहर हो सकते हैं। विपक्ष का आरोप है कि नए नियमों के तहत हर मतदाता को दस्तावेज जमा करना जरूरी है, जबकि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में लोगों के पास जरूरी कागजात नहीं हैं। इससे दलित, पिछड़े और वंचित वर्ग के लोगों के वोटिंग अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
विपक्ष को लगता है कि ये फैसला बिहार चुनाव को देखते हुए जल्दबाजी में लिया गया है। उनका कहना है कि जल्दबाजी में लिए गए इस फैसले से सिर्फ बीजेपी और NDA को फायदा होगा। चुनाव आयोग ने सफाई दी है कि प्रक्रिया पारदर्शी है। सभी को दस्तावेज जमा करने के पर्याप्त मौके मिलेंगे। हालांकि, विपक्ष संतुष्ट नहीं है और विरोध जारी है। अब मामला कोर्ट में चला गया है।
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