सैम मानेकशॉ की पुण्यतिथि: ‘अगर मैं जिन्ना की बात मान लेता तो, कभी भी बांग्लादेश नहीं बनता’, सैम मानेकशॉ ने क्यों कही थी ये बात
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फाइल फोटो
देश के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ जो अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी भी उनकी हाजिर जवाबी से नाराज हो गईं थी। दूसरे विश्व युद्ध में म्यांमार में 7 गोलियां लगने के बाद भी वे बच गए। एक बार तो उन्होंने पाकिस्तान आर्मी चीफ को गलत अंग्रेजी पढ़ने के लिए टोका था। आज उनकी पुण्यतिथि है। आइए जानते हैं देश के पहले फील्ड मार्शल के कुछ अनसुने किस्से…
सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 में अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था। उस समय उनके पिता भारतीय ब्रिटिश सेना में मेडिकल सर्विस दे रहे थे। स्कूल पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने अमृतसर के हिंदू कॉलेज में एडमिशन ले लिया। वो ब्रिटेन जाकर डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन उम्र कम होने के कारण उनके पिता ने मना कर दिया। उन्होंने देहरादून में देश की पहली इंडियन मिलिट्री अकादमी में एडमिशन लिया।
सैम मानेकशॉ की अपलब्धियां
1932 में मिलिट्री में कमीशन
1942 में सेकंड वर्ल्ड वॉर में भाग लिया
1952 युद्ध में भूमिका निभाई
1969 में चीफ ऑफ आर्मी बने
1971 में पाक को हराया
1973 में पहले फील्ड मार्शल बने
27 जून 2008 को 94 साल की उम्र में निधन
देश के पहले फील्ड मार्शल
फील्ड मार्शल इंडियन आर्मी में 5 स्टार और सबसे बड़ी रैंक होती है। भारत में अभी तक दो आर्मी अफसरों को ही फील्ड मार्शल बनाया गया है। सैम मनेकशॉ और केएम करियप्पा। फील्ड मार्शल को बैटन दिया जाता है। इसी बैटन से वो सैल्यूट करते हैं। फील्ड मार्शल कभी भी रिटायर नहीं होते हैं। और उन्हें जनरल की पूरी सैलरी और पेंशन मिलती है।
1932 में सैम मानेकशॉ ने IMA के लिए अप्लाई किया। जिसमें सैम मानेकशॉ ने भी 40 सलेक्टेड कैंडिडेट में 6वीं रैंक आई। इस तरह उनका आर्मी का सफर शुरु हुआ था।
1939 में बॉम्बे में सैम मानेकशॉ और सिल्लू की शादी हुई थी। उनकी दो बेटियों माजा और शेरी हैं।
डबल प्रमोशन के बाद बने यंग कैप्टन
सेकंड वर्ल्ड वॉर के समय 1942 में उन्हें डबल प्रमोशन देकर यंग कैप्टन बनाया गया। उन्हें बर्मा (म्यांमार) में शितांग नदी के किनारे जापान की सेना से लड़ने के लिए भेजा गया। जहां जापान और ब्रिटिश सेना के बीच भीषण युद्ध हो रहा था। इस लड़ाई में सैम मानेकशॉ को 7 गोलियां लग गई। ऐसे हालात में भी सैम मानेकशॉ 36 घंटों तक युद्ध के मैदान में घायल ही पड़े रहे। उनके साथ सिख बटालियन के सिपाही शेर सिंह ने अपने कंधे पर टांगकर उन्हें पास के ही मेडिकल कैंप तक पहुंचाया।
सैम मानेकशॉ की बायोग्राफी में मेजर जनरल वीके सिंह ने लिखा- डॉक्टर ने सैम मानेकशॉ की हालत देखकर फिनिश्ड केस बता दिया और वो सैम मानेकशॉ का इलाज करने से मना कर दिया। तभी डिविजनल कमांडर ब्रिटिश मेजर जनरल डीटी काउन मेडिकल कैंप में आए और अपना मिलिट्री क्रास मानेकशॉ के सीने पर लगा दिया। ये सेना में बहादुरी से लड़ने वाले सैनिकों के लिए दिया जाता था।
इसी बीच सैम को होश आ जाता है। जिसे देखकर कैंप में मौजूद डॉक्टर ने पूछा सैम को क्या हुआ था। तब सैम मानेकशॉ ने कहा- मुझे किसी गधे ने लात मार दी थी। इसे सुनकर डॉक्टर भी हंसने लगते हैं और कहते हैं जो आदमी ऐसी हालत में भी मजाक कर सकता है उसे तो बचाना ही होगा। सैम मानेकशॉ बच गए। उन्हें मांडले ले जाया गया। इसके बाद रंगून और फिर भारत। 1946 में उन्हें सेना मुख्यालय दिल्ली में तैनात किया गया।
1947 में देश आजाद हुआ तो उनकी मूल यूनिट 12th फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट पाकिस्तान के पास चली गई। आजादी के बाद उन्हें जिन्ना ने पाकिस्तान आर्मी ज्वाइन करने के लिए कहा। उन्हें प्रमोशन का ऑफर भी दिया गया। लेकिन मानेकशॉ ने इंडियन आर्मी में ही रहना पसंद किया। वह 1948 में कश्मीर का भारत में विलय कराने के लिए वो वीपी मेनन के साथ श्रीनगर गए।
इंदिरा को मानेकशॉ ने क्यों टोका था?
1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान ही उन्हें पूर्वी कमान की जिम्मेदारी दी गई। उसी समय पीएम नेहरु और रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने सीमा क्षेत्रों का जायजा लिया। ‘सैम मानेकशॉ- द मैन एंड हिज़ टाइम्स’ में ADC ब्रिगेडियर बहराम पंताखी ने लिखा- पीएम नेहरु के दौरे में इंदिरा गांधी भी उनके साथ थी। तब सैम मानेकशॉ ने इंदिरा गांधी से कहा- आप ऑपरेशन रुम में नहीं घुस सकती, क्योंकि आपने गोपनीयता की शपथ नहीं ली है। ये बात इंदिरा गांधी को बहुत बुरी लगी।
गोरखा सैनिकों से मिले तो मिला 'सैम बहादुर' नाम
1967 में गोरखा राइफल्स के एक सैनिक ने चो ला में चाइना के बंकर में घुसकर 5 चीनी सैनिकों के खुखरी से सिर काट दिए थे। इसके बाद 1969 में आर्मी चीफ बनने के बाद सैम मानेकशॉ 8 गोरखा राइफल्स की बटालियन का दौरा कर रहे थे। तब उन्होंने एक गोरखा सैनिक से पूछा- तुम्हे अपने सेना अध्यक्ष का नाम पता है। तब एक सिपाही ने बोला- सैम बहादुर साहब। इसी वजह से उनका नाम सैम बहादुर भी पड़ा। सैम मानेकशॉ ने कहा था कि अगर कोई मौत से नहीं डरता, या तो वो झूट बोल रहा है या फिर वो गोरखा है।
मानेकशॉ की कार से क्यों हुई शर्मिला टैगोर की विदाई
1969 में शर्मिला टैगोर और मंसूर अली खान की शादी हुई थी। शर्मिला टैगोर ने मुस्लिम धर्म अपना लिया था। जिससे कोलकाता के ऑफिसर्स क्लब के बाहर माहौल बिगड़ गया। द वीक के अनुसार ऑस्टिन शीरलाइन कार उस समय वहां पहुंच गई। ये कार मानेकशॉ की थी। उस कार ने दोनों को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला।
युद्ध के इंकार से हैरान हुईं थी इंदिरा गांधी
1971 में इंदिरा गांधी चाहती थी की सेना मार्च में ही पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध करे, लेकिन मानेकशॉ ने इसके लिए मना कर दिया। इंदिरा गांधी उनकी हाजिर जबावी से नाराज हो गई। तब मानेकशॉ ने कह- उन्हें 6 महीने का वक्त चाहिए, ‘मैं गारंटी देता हूं की जीत आपकी होगी’।
पाक आर्मी चीफ को गलत अंग्रेजी के लिए टोका
1971 युद्ध के बाद कश्मीर में दो चौकी थाकोचक और कैयान पाकिस्तान के कब्जे में थी। 1972 में सैम मानेकशॉ दोनों चौकियों पर बात करने के लिए लाहौर गए। उस समय पाकिस्तान में आर्मी चीफ जनरल टिक्का थे, जो सैम से 8 साल जूनियर थे। उनकी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी।
ब्रिगेडियर बहराम पंताखी ‘सैम मनाकेशॉ: द मैन एंड हिज टाइम्स’ में लिखा- जब जनरल टिक्का अग्रेंजी में लिखी हुई स्पीच पढ़ रहे थे, तो मानेकशॉ ने उन्हें टोक दिया। इतना सुनते ही टिक्का हकलाने लगे और नर्वस हो गए। हालांकि पाकिस्तान ने इन दो चौकियों को भारत को सौंप दिया।
…तो कभी बांग्लादेश नहीं बनता
रिटायरमेंट के बाद जब उनसे पूछा गया कि अगर 1947 में जिन्ना की बात मान लेते और पाकिस्तान आर्मी ज्वॉइन कर लेते तो क्या होता। तब उन्होंने कहा- ‘अगर वो जिन्ना की बात मान लेते तो, भारत पाकिस्तान से 1971 का युद्ध हार जाता।’
सैम मानेकशॉ का 27 जून 2008 को 94 साल की उम्र में निधन हुआ था। तमिलनाडु के ऊटी में उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

