9 साल में 400+ दिन जेल से बाहर, फिर 21 दिन की छुट्टी: राम रहीम को बार-बार पैरोल और फरलो क्यों मिल रही, इनमें क्या फर्क; क्या सिस्टम में लूपहोल है
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राम रहीम साल 2017 में दो मामलों में दोषी पाया गया था। तभी से वह जेल में है। इस दौरान अन्य कुछ क्रिमिनल केस में भी वह दोषी पाया गया है।
नेशनल डेस्क। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर जेल से बाहर आ गया है। मंगलवार (25 अगस्त) को हरियाणा की रोहतक स्थित सुनारिया जेल से उसे 21 दिन की फरलो पर रिहा किया गया। कड़ी सुरक्षा के बीच राम रहीम को सिरसा के डेरा सच्चा सौदा हेडक्वार्टर ले जाया गया।
राम रहीम की यह रिहाई चर्चा में है। ऐसा इसलिए क्योंकि 2017 में सजा होने के बाद से उसे अब तक 17 बार पैरोल या फरलो मिल चुकी है। जेल रिकॉर्ड के हवाले से आई रिपोर्टों के मुताबिक, वह इन रिहाइयों के जरिए 400 दिन से ज्यादा वक्त जेल से बाहर रह चुका है।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक दोषी पाए गए कैदी को बार-बार पैरोल या फरलो कैसे मिल सकती है? सवाल यह भी है कि क्या टेंपररी रिहाई के लिए बने इस सिस्टम के लूपहोल का राम रहीम फायदा उठा रहा है। इस आर्टिकल में हम इसी से जुड़े कुछ और सवालों के जवाब भी जानेंगे।

2017 में 20 साल की सजा हुई
गुरमीत राम रहीम सिंह को अगस्त 2017 में पंचकूला की स्पेशल CBI कोर्ट ने दो महिला शिष्यों से रेप के मामले में दोषी ठहराया था। दोनों मामलों में उसे 10-10 साल की सजा सुनाई गई थी। दोनों सजाएं अलग-अलग चलने के कारण उसकी कुल सजा 20 साल की है।
राम रहीम की सजा के बाद हरियाणा और पंजाब के कई हिस्सों में हिंसा भड़क गई थी। बाद में उसे दूसरे आपराधिक मामलों में भी दोषी ठहराया गया। वह 2017 से ही जेल में है।
2020 से शुरू हुआ जेल से बाहर आने का सिलसिला
राम रहीम को पहली पैरोल 2020 में मिली। इसके बाद अलग-अलग मौकों पर उसे पैरोल और फरलो मिलती रही।
हाल ही में उसे बैक टू बैक रिहाइयां मिलीं। मई 2026 में उसे 30 दिन की पैरोल मिली थी, जो जून में खत्म हुई। इससे पहले जनवरी 2026 में उसे 40 दिन की पैरोल दी गई थी। वह इस दौरान सिरसा के डेरा हेडक्वार्टर में ही रहा। अगस्त 2025 में भी उसे 40 दिन की पैरोल मिली थी। अब एक बार फिर उसे 21 दिन की फरलो दी गई है।
क्या एक कैदी बार-बार पैरोल मांग सकता है?
हां। कोई कैदी एक बार पैरोल मिलने के बाद दोबारा भी आवेदन कर सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार उसकी मांग मंजूर हो जाएगी।
हर आवेदन पर जेल नियमों के तहत अलग से फैसला होता है। कैदी की पात्रता, पैरोल का कारण, पहले मिली रिहाई के दौरान उसका व्यवहार और लागू नियम जैसे पहलू देखे जाते हैं।
यानी पैरोल कोई ऐसी सुविधा नहीं है जो एक बार मिल गई तो बार-बार अपने आप मिलती रहे। न ही यह ऐसी सुविधा है, जो बार-बार न दी जा सके।

पैरोल और फरलो में क्या फर्क है?
दोनों को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन इनमें फर्क है। पैरोल आम तौर पर किसी खास वजह या परिस्थिति में दी जाती है। उदाहरण के लिए परिवार से जुड़ी कोई इमरजेंसी या दूसरा ऐसा कारण, जहां कैदी को जाना जरूरी होता है। इसके लिए नियमों के तहत परमिशन लेनी होती है।
पैरोल पर बाहर बिताया गया वक्त सजा की अवधि में नहीं जुड़ता। यानी जितने दिन कैदी पैरोल पर बाहर रहता है, उसे सजा की अवधि पूरी होने के बाद उतने ही दिन एक्स्ट्रा जेल में रहना पड़ता है।
वहीं, फरलो एक तय नियम के तहत मिलने वाली टेंपररी छुट्टी है। इसका मकसद आम तौर पर कैदी को कुछ वक्त जेल से बाहर रहने का मौका देना और उसके परिवार और सामाजिक रिश्तों को बनाए रखने में मदद करना होता है।
फरलो पर बिताया गया वक्त सजा की अवधि में ही गिना जाता है। यानी इस तरह की रिहाई मिलने पर कैदी को सजा खत्म होने की अवधि के बाद जेल में अलग से दिन बिताने की जरूरत नहीं है।
क्या सिस्टम के लूपहोल का फायदा उठाया जा रहा
यह कहना ठीक नहीं होगा कि सिस्टम में लूपहोल है और उसका फायदा उठाया जा रहा है। क्योंकि एक कैदी को बार-बार पैरोल मिल सकती है लेकिन राम रहीम के मामले में यह कुछ ज्यादा हो रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि 2022 में हरियाणा में जेल कानून बदले गए थे और उसके बाद से ही राम रहीम की टेंपररी रिहाइयों में तेजी आई।
पीड़ित पक्ष तो यह तक दावा कर चुका है कि यह जेल कानून ही राम रहीम के लिए बदले गए थे। आरोप यह भी है कि नए जेल कानून का इस्तेमाल राम रहीम के मामले में असामान्य तरीके से हो रहा है।
हालांकि, यहां एक फैक्टर यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2025 में राम रहीम की बार-बार पैरोल/फरलो को चुनौती देने वाली SGPC की याचिका खारिज कर दी थी। यानी न्यायिक रूप से यह साबित नहीं होता कि राम रहीम के मामले में सिस्टम के लूपहोल का फायदा उठाया जा रहा है।

