यह हीरा जिनके पास रहा, उनकी बर्बादी हुई: इसे देखते ही नादिर शाह के मुख से निकला- कूह-ए-नूर; औंरंगजेब ने दूरी बनाई, इसलिए ज्यादा वक्त टिका
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कोहिनूर का इतिहास 700 साल से भी पुराना है। इसे दुनिया का सबसे कीमती हीरा माना जाता है।
जिन-जिन शासकों ने कोहिनूर को अपने पास रखा, उनका खराब समय शुरू हो गया। कहा गया कि यह हीरा या तो महिलाओं के पास फलेगा या भगवान के पास। मुगल शासक शाहजहां ने एक सिंहासन बनवाया। उस पर कोहिनूर जड़वाया। इसे बनाने में ताजमहल से भी ज्यादा खर्च आया। हालांकि, इस पर बैठने के कुछ ही दिन बाद उसका तख्तापलट हो गया। पंजाब के राजाओं के पास भी काफी समय तक कोहिनूर रहा। सबकी असामयिक मृत्यु हुई।
जब यह हीरा ब्रिटेन पहुंचा, वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री चल बसे। कोहिनूर के बारे में कहा जाता था कि यह इकलौता हीरा हजारों किलो गोल्ड के बराबर है। इसकी वैल्यू के हिसाब से पूरी दुनिया को ढाई दिन खाना खिलाया जा सकता था।
कोहिनूर हीरे का इतिहास क्या है, इसका नाम कोहिनूर कैसे पड़ा, इसे लेकर श्राप वाली थ्योरी क्यों प्रचलित है? आज की स्टोरी में हम इन्हीं पॉइंट्स को जानेंगे..
खुदाई में मिला 158 ग्राम का हीरा
आज के आंध्र प्रदेश का गूंटूर जिला सन 1303 के आसपाल गोलकुंडा साम्राज्य का पार्ट था। उस वक्त गोलकुंडा ही एकमात्र क्षेत्र था, जहां हीरे की खदानें हुआ करती थीं। यहां के लोकल लोग हीरों की खुदाई करते फिर उन्हें देश-विदेश में बेचते।
एक दिन खुदाई के दौरान 158.6 ग्राम (793 कैरेट) का हीरा मिला। यह दूसरे हीरों से बड़ा और चमकदार था। उस वक्त गोलकुंडा में काकतीय वंश का शासन था। यह हीरा राजा को दे दिया गया। राजा ने इसे अपनी कुलदेवी मां भद्रकाली की मूर्ति में लगवा दिया।
अब राजा ने ऐसा क्यों किया, इसकी अलग वजह थी। दरअसल, उस वक्त यह बात फैल गई कि औरतों और भगवान को छोड़ दें तो किसी भी पुरुष शासक के पास यह हीरा नहीं फलेगा।
इसका श्राप खिलजियों को भी लगा
दिल्ली सल्तनत पर काबिज अलाउद्दीन खिलजी को इस हीरे के बारे में पता चला। उसने गोलकुंडा पर आक्रमण कर हीरे को कब्जा लिया। खिलजी इस हीरे का मालिक बन गया। कुछ ही वक्त बाद वो अपने सेनापति मलिक कफूर द्वारा मारा गया। खिलजियों के बाद यह हीरा तुगलक वंश के राजाओं के पास चला गया। यह प्रक्रिया चलती रही। सल्तनत के साथ-साथ हीरे का मालिक भी बदलता रहा।
हीरा पहली बार विदेशी धरती पर पहुंचा
भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना हुई। बाबर और उसके बेटे हुमायूं ने इब्राहिम लोदी को हराकर हीरा छीन लिया। 1530 में हुमायूं शासक बना। शासन संभालते ही शेरशाह सूरी ने उस पर आक्रमण कर दिया। 1544 में वो पर्शिया (अब ईरान) भाग गया। हालांकि, उसने हीरे को अपने साथ रख लिया था।
हुमायूं ने पर्शिया के शासक शाह तहमास्क के पास शरण ली। तहमास्क ने हुमायूं की सुरक्षा सुनिश्चित की। हुमायूं ने इसके बदले उसे हीरा गिफ्ट कर दिया। इस बेशकीमती हीरे की ओनरशिप पहली बार भारत से बाहर गई।
तहमास्क शिया मुस्लिम था। उस वक्त दुनिया में सुन्नी सल्तनत की संख्या बढ़ रही थी। तहमास्क को अस्तित्व मिटने का डर सताने लगा। उस वक्त हिंदुस्तान के अहमदनगर में एक शिया शासक था- बुरहान निजाम शाह। तहमास्क ने सोचा कि अगर बुरहान निजाम शाह को अपने साथ मिला लिया जाए तो हिंदुस्तान के शिया मुस्लिम साथ आ जाएंगे। तहमास्क ने बुरहान निजाम शाह को अपने साथ जोड़ने के बदले हीरा गिफ्ट कर दिया। भारत का हीरा वापस भारत में आ गया।
इसकी चमक देख शाहजहां की आंखें चौंधियाईं
इस हीरे की चर्चा देश-विदेश में हर जगह थी। इसे लेकर संघर्ष भी होता था। जो शासक ताकतवर होता, वही इसे हथिया लेता। 1656 में मुगल शासक शाहजहां के पास यह हीरा पहुंचा। इसकी चमक देख उसकी आंखें चौंधिया गईं। शाहजहां ने जौहरी को बुलवाकर कहा कि इसे जितना खूबसूरत बना सको, बना दो।
सिंहासन में लगवाया हीरा, ताजमहल से भी महंगा
जौहरी ने हीरे को खूबसूरत बनाने के चक्कर में इतनी कटिंग कर दी कि वो छोटा हो गया। 793 कैरेट से 280 कैरेट हो गया। नाराज शाहजहां ने जौहरी पर 10,000 रुपए का जुर्माना लगा दिया।
शाहजहां ने उसी वक्त बेशकीमती रत्नों से जर्णित एक सिंहासन बनवाया। इसे मयूर सिंहासन कहा गया। इसके ऊपरी भाग पर हीरे को भी जड़ दिया गया। इसे बनाने में ताजमहल से भी ज्यादा खर्च आया। हालांकि इस सिंहासन पर बैठने के कुछ समय बाद ही तख्तापलट हो गया। पिता शाहजहां को सत्ता से बेदखल कर औरंगजेब तख्त पर बैठा।

औरंगजेब ने हीरे से दूरी बनाई, तभी ज्यादा दिन टिका
औरंगजेब ने मयूर सिंहासन पर बैठने से मना कर दिया। कहा जाता है कि इसी वजह से वो ज्यादा दिन सत्ता में रहा। उसके ऊपर हीरे के कथित श्राप का असर नहीं पड़ा।
औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगलिया सल्तनत कमजोर हो गई। उसके पोते मोहम्मद शाह रंगीला के समय पर्शिया के शासक नादिर शाह ने हिंदुस्तान पर आक्रमण कर दिया। उसने सारा खजाना लूट लिया। मोहम्मद शाह रंगीला ने चालाकी से मयूर सिंहासन पर लगा हीरा अपनी पगड़ी में छिपा लिया।
नादिर शाह को हीरे की तलाश थी। उसने पगड़ी बदलने (एक्सचेंज) का कार्यक्रम कराया। इसके तहत दोनों शासकों को एक-दूसरे को अपनी पगड़ी देनी थी। मोहम्मद शाह रंगीला ने जैेसे ही पगड़ी निकाली, हीरा जमीन पर जा गिरा। उसे देखते ही नादिर शाह के मुंह से एक शब्द निकला- कूह-ए-नूर। यहीं से इसे कोहिनूर हीरा कहा जाने लगा।
कोहिनूर एक फारसी शब्द कूह-ए-नूर से लिया गया है। यहां कूह का अर्थ पर्वत और नूर का अर्थ प्रकाश है। यानी प्रकाश का पर्वत।
अफगानिस्तान की रॉयल फैमिली के भी पास रहा कोहिनूर
नादिर शाह कोहिनूर लेकर पर्शिया चला गया। हीरे का मालिकाना हक मिलते उसका भी डाउनफॉल शुरू हो गया। कुछ दिन बाद मारा भी गया। नादिर शाह का नजदीकी कमांडर अहमद शाह दुर्रानी कोहिनूर को लेकर अफगानिस्तान चला गया। उसने वहां दुर्रानी सल्तनत की स्थापना की।
कई साल बीत गए। 1803 में अफगानिस्तान में शाह शुजा दुर्रानी का शासन आया। शाह शुजा के चचेरे भाई ने उसके खिलाफ विद्रोह कर दिया। शाह शुजा ने पत्नी सफा बेगम को कोहिनूर देकर पंजाब की तरफ भेज दिया। वहां महाराजा रणजीत सिंह का शासन था। सफा बेगम ने महाराजा रणजीत सिंह से कहा कि अगर वो उसके पति शाह शुजा को बचाते हैं तो बदले में कोहिनूर देगी।
रणजीत सिंह ने शाह शुजा को उसके चचेरे भाई से बचा लिया। बदले में उन्हें कोहिनूर मिल गया। कोहिनूर की घर वापसी हो गई। महाराजा रणजीत सिंह इसे हाथ पर पहनते थे।
इसे देखते ही अंग्रेजों के होश उड़े
1830 तक भारत में अंग्रेजों ने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। उन्होंने कोहिनूर के बारे में सुन रखा था। उन्होंने महाराणा रणजीत से एक बार कोहिनूर दिखाने की रिक्वेस्ट की। उसे देखते ही अंग्रेजों के होश उड़ गए। अब वे किसी भी कीमत पर इसे पाना चाहते थे।
इसी बीच रणजीत सिंह बीमार हुए। उनकी इच्छा थी कि कोहिनूर को जगन्नाथ मंदिर में डोनेट कर दिया जाए, लेकिन उनके दरबारियों ने ऐसा करने से मना कर दिया। महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद सिख साम्राज्य बहुत कमजोर हो गया। एक के बाद एक सारे राजा कम उम्र में ही दुनिया छोड़ने लगे। किसी की हत्या हुई तो किसी के ऊपर भारी गेट गिर गया। कोहिनूर के शापित होने की बात हर रोज अखबारों में छपने लगी।
सिख साम्राज्य में बस दलीप सिंह जिंदा बचे। 1843 में सिर्फ 5 साल की उम्र में उनका राज्याभिषेक करा दिया गया। दलीप सिंह की मां महारानी जिंद कौर ने सारा राज-पाट देखा। अंग्रेजों को लगा कि कोहिनूर को हथियाने का यह सही वक्त है। 1845 में उन्होंने सिख एंपायर पर हमला करके महारानी जिंद कौर को हाउस अरेस्ट कर लिया।
अंग्रेजों ने 7 साल के महाराजा दलीप सिंह से ट्रीटी ऑफ लाहौर साइन करा लिया। पंजाब पर ब्रिटिशर्स का अधिकार हो गया। कोहिनूर भी उनके पास चला गया।
कोहिनूर के ब्रिटेन पहुंचते ही पीएम की मौत
अंग्रेजों के पास कोहिनूर आ चुका था। वे इसे अपनी महारानी विक्टोरिया को गिफ्ट करना चाहते थे। 6 अप्रैल 1850 को इसे समुद्री रास्ते से यूनाइटेड किंगडम भेजा गया। 2 जुलाई 1850 को कोहिनूर वहां पहुंच गया। उसी दिन ब्रिटिश पीएम रॉबर्ट पील की घोड़े से गिरकर मौत हो गई। उसी दिन महारानी पर भी किसी ने हमला कर दिया। उनके माथे और आंख पर चोट लग गई थी।
3 जुलाई, 1850 को कोहिनूर महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया। महारानी को इसका शेप पसंद नहीं आया। उनकी सलाह पर इसके डिजाइन में बदलाव किया गया। इसकी वजह से इसका साइज और कैरेट कम हो गया। अब यह सिर्फ 105.6 कैरेट और 21.12 ग्राम ही रह गया।
कोहिनूर को महारानी के ताज में लगाया गया
कोहिनूर के राजमहल आने के 11 साल बाद क्वीन विक्टोरिया के पति प्रिंस अल्बर्ट की मृत्यु हो गई। वे सिर्फ 42 साल के थे। कोहिनूर के शापित होने वाली बात फिर से उठी। तब फैसला हुआ कि ब्रिटिश राजघराने का कोई भी पुरुष इस हीरे को नहीं रखेगा। इसे महारानी के ताज में लगा दिया गया। नियम बनाया गया कि सिर्फ राजघराने की फीमेल मेंबर ही इसे पहन सकेंगी।
आजादी के बाद भारत ने कोहिनूर वापस मांगा
1947 में भारत आजाद हुआ। 1953 में एलिजाबेथ II ब्रिटेन की महारानी बनीं। भारत सरकार ने ब्रिटिश गवर्नमेंट से रिक्वेस्ट करते हुए कोहिनूर को वापस मांगा। लेकिन, उन्हें मना कर दिया गया। भारत को देखते हुए पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सरकारों ने भी कोहिनूर की डिमांड करनी शुरू कर दी। ब्रिटिश सरकार ने सबकी रिक्वेस्ट रिजेक्ट कर दी।
1998 में पत्रकार और सांसद कुलदीप नैय्यर ने 50 MPs की एक टीम बनाई। उनसे कोहिनूर को भारत लाने के लिए एक पेटिशन पर साइन कराया। उन 50 सांसदों में डॉ. मनमोहन सिंह भी शामिल थे। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने भी जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया।
खुले तौर पर मना कर चुकी है ब्रिटिश गवर्नमेंट
ब्रिटिश गवर्नमेंट दलील देती है कि उन्होंने ट्रीटी ऑफ लाहौर के तहत कोहिनूर को लीगल तरीके से लिया है। यह 150 साल से ब्रिटिश क्राउन का पार्ट है। 2010 में उस वक्त के ब्रिटिश प्रधानमंत्री भारत आए थे। उन्होंने कहा था कि अगर हम एक (कोहिनूर) को वापस करने की रिक्वेस्ट मान भी लें तो आगे और भी डिमांड होंगे, फिर ऐसे तो पूरा ब्रिटिश म्यूजियम ही खाली हो जाएगा।

