केरल में MBBS एग्जाम पेपर में लापरवाही: मॉडल पेपर से जस के तस उठा लिए गए 6 सवाल; यूनिवर्सिटी ने बताई कहां हुई गलती
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केरल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेस
नेशनल डेस्क। देश में कॉम्पिटिटिव और प्रोफेशनल एग्जाम की ट्रांसपेरेसी को लेकर जारी बहस के बीच अब केरल में MBBS फाइनल ईयर की परीक्षा सवालों के घेरे में आ गई है। केरल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (KUHS) के गायनेकोलॉजी पेपर में 15 में से 6 सवाल पहले से जारी मॉडल क्वेश्चन पेपर से लगभग हूबहू उठा लिए गए। मामला सामने आने के बाद स्टूडेंट्स ने एग्जाम प्रोसेस पर सवाल उठाए, वहीं यूनिवर्सिटी ने भी जांच के बाद गलती को मान लिया है।
15 में से 6 सवाल मॉडल पेपर से मिले
KUHS ने MBBS फाइनल ईयर का Obstetrics and Gynaecology (Paper-II: Gynaecology and Family Welfare) का पेपर 31 जुलाई को रखा था। 100 नंबर के इस पेपर में कुल 15 सवाल थे।
मनोरमा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मॉडल पेपर और असली क्वेश्चन पेपर के कंपेरिजन पर पता चला कि 6 शॉर्ट आंसर वाले सवाल ऐसे थे, जो पहले से यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर मौजूद मॉडल पेपर में दिए गए थे। इनमें Complete Molar Pregnancy, LNG-IUCD, Primary Infertility की जांच, Hirsutism और Fibroids के इलाज जैसे सवाल शामिल थे। एक सवाल को केवल थोड़ा बदलकर Palliative Care से जोड़ दिया गया। इस तरह 24 अंकों का हिस्सा मॉडल पेपर से ही आ गया।
स्टडेंट्स और यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने क्या कहा
रिपोर्ट के मुताबिक, स्टूडेंट्स ने ईमेल के जरिए यूनिवर्सिटी को शिकायत भेजी। उनका कहना था कि इतने बड़े स्तर पर मॉडल पेपर से सवाल दोहराए जाने से उन स्टूडेंट को फायदा मिला, जिन्होंने सिर्फ मॉडल पेपर के आधार पर तैयारी की थी।
मामला सामने आने के बाद KUHS के एग्जामिनेशन कंट्रोलर डॉ अनिल कुमार ने माना कि क्वेश्चन पेपर तैयार करने और बाद में उसकी जांच करने की स्टेज पर लापरवाही हुई।
उन्होंने बताया कि मॉडल क्वेश्चन पेपर बाहरी पेपर सेटर को रेफरेंस के लिए भेजा जाता है। यही मॉडल पेपर स्क्रूटिनाइजर (जांच अधिकारी) को भी दिया जाता है, जिसकी जिम्मेदारी क्वेश्चन पेपर की जांच करना होती है। डॉ कुमार ने कहा कि पेपर सेट करने वाले शिक्षक और स्क्रूटिनाइजर, दोनों ही दोहराए गए सवालों को पहचान नहीं पाए, जिसके कारण वही सवाल फाइनल पेपर में शामिल हो गए।
प्रैक्टिकल एग्जाम पर भी उठे सवाल
स्टूडेंट्स ने 5 अगस्त से शुरू हुई प्रैक्टिकल एग्जाम पर भी सवाल उठाए हैं। मनोरमा की रिपोर्ट में स्टूडेंट्स के हवाले से लिखा गया है कि OSCE (Objective Structured Clinical Examination) में कॉलेज खुद मरीज और सवाल चुनते हैं, जिससे अलग-अलग कॉलेजों में कठिनाई का स्तर अलग हो सकता है। स्टूडेंट्स का कहना है कि पूरे राज्य में OSCE के लिए एक जैसा सिस्टम लागू होना चाहिए।
हालांकि यूनिवर्सिटी इस मांग को सही नहीं मानती। डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि अगर OSCE के केस और सवाल पहले से तय किए जाएंगे तो उनके लीक होने का खतरा बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रैक्टिकल एग्जाम का मकसद स्टूडेंट्स की वास्तविक क्लीनिकल कैपिसिटी का आकलन करना है, इसलिए मौजूदा तरीका ही बेहतर है।
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