जज vs जज: अमित शाह के विरोध में आए पूर्व जजों के खिलाफ 56 रिटायर्ड जजों ने खोला मोर्चा; उपराष्ट्रपति उम्मीदवार सुदर्शन से जुड़ा है मामला
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INDIA गठबंधन के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर जज बनाम जज हो गया है। (फाइल फोटो)
उपराष्ट्रपति चुनाव से पहले INDIA गठबंधन के उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर जज बनाम जज हो गया है। दरअसल, 56 पूर्व जजों ने मंगलवार को उन 18 रिटायर्ड जजों की आलोचना की है, जिन्होंने अमित शाह की आलोचना के खिलाफ उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बी सुदर्शन का बचाव किया था। 56 जजों ने पत्र लिखकर कहा, यह राजनीतिक सुविधा के लिए न्यायिक स्वतंत्रता की आड़ का दुरुपयोग के समान है। इन जजों में भारत के सीजेआई जस्टिस पी सदाशिवम और रंजन गोगोई भी शामिल हैं।
दरअसल, 9 सितंबर को उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना है। जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद पद खाली हो गया था। NDA ने सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाया है। जबकि विपक्षी INDIA गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बी सुदर्शन को उतारा है।
अमित शाह ने क्या था
अमित शाह ने बीते शुक्रवार को रेड्डी पर नक्सलवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया था कि अगर सलवा जुडूम पर फैसला नहीं आता तो वामपंथी उग्रवाद 2020 तक खत्म हो गया होता। सुदर्शन 2011 में सलवा जुडूम पर फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच में शामिल थे। बेंच ने छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ पुलिस के साथ लड़ने वाले आदिवासी युवाओं के सशस्त्र संगठन सलवा जुडूम को भंग करने का फैसला सुनाया था।
18 पूर्व जज बोले- अमित शाह का बयान दुर्भाग्यपूर्ण
अमित शाह के बयान पर 18 पूर्व जजों ने पत्र लिखा था और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया था। इन पूर्व जजों ने कहा था- केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का सलवा जुडूम मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सार्वजनिक रूप से गलत व्याख्या करने वाला बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। यह फैसला कहीं भी, न तो स्पष्ट रूप से और न ही अपने आदेश से नक्सलवाद या उसकी विचारधारा का समर्थन करता है।
56 रिटायर्ड जजों ने किया पलटवार
56 रिटायर्ड जजों ने कहा- वे खुद को पूर्व जजों के समूह के रुख की आलोचना करने के लिए बाध्य महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह एक सामान्य चलन बन गया है कि हर बड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर एक ही तबके से बयान आते हैं। ये बयान न्यायिक स्वतंत्रता की आड़ में अपनी राजनीतिक पक्षपातपूर्णता को छिपाने के लिए हैं। यह ट्रेंड उस संस्था के लिए बहुत बड़ा नुकसान है, जिसमें हमने कभी सेवा की थी। क्योंकि यह जजों को राजनीतिक कर्ता के रूप में पेश करती है। यह उस समृद्धि, गरिमा और तटस्थता को समाप्त कर देती है, जिसकी एक जज के पद को जरूरत होती है।

