1993 में ठिकाना बना था: बोट क्लब से शुरू हुई कहानी, 33 साल बाद फिर बदली; यहां कौन-कौन से बड़े प्रदर्शन हुए-डीटेल्स
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जंतर-मंतर का निर्माण 1724 ईस्वी में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने कराया था। अब यहां प्रदर्शन पर रोक लग गई है।
स्पेशल डेस्क. पिछले तीन महीने में जंतर-मंतर कई बार चर्चा में आया। पहले NEET पेपर लीक को लेकर CJP के प्रदर्शन का साक्षी बना। अब यहां प्रदर्शन पर रोक की वजह से चर्चा में है। पिछले 33 सालों से जंतर-मंतर, देश के कई बड़े आंदोलनों का ठिकाना रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपनी मांगें लेकर यहां पहुंचते रहे। कभी यहां कभी किसान अपनी मांगों के लिए धरने पर बैठे, तो कभी भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई गई।
जंतर-मंतर पर अब और आंदोलन नहीं
दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक बार फिर जगह बदल दी गई है। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की लिस्ट से हटा दिया है।

यह पहली बार नहीं है, जब दिल्ली में आंदोलन की जगह बदली गई है। आजादी के बाद लंबे समय तक बोट क्लब विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र था। 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हुए किसान आंदोलन और 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद सुरक्षा संबंधी हालात के बीच बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों को सीमित किया गया। इसके बाद 1993 के आसपास जंतर-मंतर दिल्ली में धरना-प्रदर्शन का प्रमुख ठिकाना बन गया।
आइए राज एक्सप्रेस के इस एक्सप्लेनर में आसान भाषा में समझते हैं कि दिल्ली में आंदोलन की जगह क्यों बदली जाती रही और जंतर-मंतर का इतिहास क्या है?
बोट क्लब क्या था और यहां आंदोलन क्यों होते थे?
आजादी के बाद दिल्ली में बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों और जनसभाओं के लिए बोट क्लब के लॉन प्रमुख जगहों में शामिल थे। यह इलाका इंडिया गेट और संसद के नजदीक था। यहां बड़ी संख्या में लोगों के इकट्ठा होने के लिए पर्याप्त जगह थी।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि प्रदर्शनकारी देश की सत्ता के प्रमुख केंद्रों के पास अपनी आवाज उठा सकते थे। सरकार के बड़े दफ्तर और संसद भी आसपास थे। इसलिए राजनीतिक दलों, किसान संगठनों और अन्य ग्रुप्स के लिए यह जगह काफी अहम थी।
1988 के किसान आंदोलन में क्या हुआ था?
बोट क्लब के इतिहास में अक्टूबर 1988 का किसान आंदोलन सबसे अहम घटनाओं में से एक माना जाता है। भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में 25 अक्टूबर 1988 से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली पहुंचे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस आंदोलन में करीब लाखों किसान शामिल हुए थे। किसान अपने साथ ट्रैक्टर, बैलगाड़ियां, जानवरों और खाने पीने के इस्तेमाल का सामान लेकर आए थे। उन्होंने बोट क्लब के लॉन में कई दिनों तक डेरा डाले रखा।
यह आंदोलन कई दिनों तक चला। बड़ी संख्या में किसानों के एक साथ पहुंचने से दिल्ली के ट्रैफिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर असर पड़ा। आंदोलन के बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की ओर से रियायतों का भरोसा मिलने पर किसान लौटे।
बोट क्लब से जंतर-मंतर पर आंदोलन क्यों शिफ्ट हुए?
1988 के किसान आंदोलन के बाद भी बोट क्लब पर राजनीतिक रैलियां और प्रदर्शन होते रहे। लेकिन दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देशभर में तनाव बढ़ गया। दिल्ली में भी सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ीं। फरवरी 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय बोट क्लब पर बड़े जमावड़ों को रोकने के लिए कदम उठाए गए। इस बदलाव के पीछे सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताएं बताई गईं।

1993 में जंतर-मंतर प्रदर्शनों का नया ठिकाना बना
इसके बाद 1993 आते आते जंतर-मंतर प्रमुख प्रदर्शन स्थल के रूप में उभरने लगा। हालांकि, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल बनाने के लिए उस समय कोई अलग अध्यादेश या औपचारिक ऐलान नहीं हुआ। बल्कि पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था के जरिए धीरे-धीरे यहां प्रदर्शन होने लगे।

जंतर-मंतर को ही क्यों चुना गया?
इसकी सबसे बड़ी वजह है कि बोट क्लब की तरह ये भी संसद भवन, सरकार के बड़े दफ्तरों के पास स्थित है। ऐसे में प्रदर्शनकारियों को लगा कि सरकार तक आसानी से बात पहुंचाई जा सकती है। दूसरी बड़ी वजह ये रही कि यहां जगह सीमित थी। यहां बोट क्लब की तरह लाखों लोगों के एक साथ जुटने की गुंजाइश नहीं थी। पुलिस-प्रशासन के लिए भी यह जगह सहूलियत भरी रही, क्योंकि यहां आने-जाने के रास्ते सीमित थे, इसलिए भीड़ को नियंत्रित करना आसान था।

2017 में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर रोक लगी
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने अक्टूबर 2017 में जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन रोकने और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में भेजने का निर्देश दिया था। इस मामले में स्थानीय निवासियों ने शिकायत की थी कि प्रदर्शनों की वजह से शोर, गंदगी और दूसरी परेशानियां होती हैं। NGT ने अपने आदेश में तीन बातों का जिक्र किया...
1- जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल घोषित करने वाला कोई स्पष्ट आदेश नहीं था।
2- दिल्ली के मास्टर प्लान में इस क्षेत्र को आवासीय इलाके के रूप में दिखाया गया।
3- लगातार होने वाले प्रदर्शनों से शोर और आसपास रहने वाले लोगों को परेशानी होती थी।
सुप्रीम कोर्ट ने बदला फैसला
जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब इलाके में प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाने के फैसले को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि नियमों और शर्तों के तहत प्रदर्शन किए जा सकते हैं। प्रदर्शन के तरीके और उसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है। यानी जंतर-मंतर पर अनुमति के साथ प्रदर्शन करने का रास्ता फिर साफ हो गया।
जंतर-मंतर पर कौन-कौन से बड़े आंदोलन हुए?
2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन
1990 से 2000 के दशक तक जंतर-मंतर पर कई छोटे-बड़े धरने हुए। किसान, मजदूर, सामाजिक संगठनों ने यहां अलग-अलग मुद्दों पर धरने दिए। 5 अप्रैल 2011 को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ और मजबूत लोकपाल कानून की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अनशन शुरू किया। धीरे-धीरे इस आंदोलन को देशभर में समर्थन मिलने लगा। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण समेत कई कार्यकर्ता इससे जुड़े। इस आंदोलन ने लोकपाल के मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया। माना जाता है कि 2014 में कांग्रेस के हारने की वजहों में से एक ये आंदोलन भी था। आगे चलकर AAP का गठन के लिए भी इसी आंदोलन ने रास्ता बनाया।
2012: निर्भया केस के बाद आंदोलन
दिसंबर 2012 में दिल्ली में निर्भया के साथ गैंगरेप और उसकी मौत की घटना से देशभर में गुस्सा फैल गया। महिला सुरक्षा और दोषियों को सजा देने की मांग को लेकर दिल्ली में बड़े प्रदर्शन हुए। जंतर-मंतर भी इस विरोध का एक प्रमुख केंद्र रहा। इस घटना के बाद महिला सुरक्षा और यौन हिंसा से जुड़े कानूनों पर देश भर में बहस तेज हुई।

2017: तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन
मार्च और अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने जंतर-मंतर पर करीब 40 दिनों तक प्रदर्शन किया। किसान सूखे से राहत, कर्ज माफी और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन जैसी मांगें उठा रहे थे। उन्होंने अपनी समस्याओं की ओर ध्यान खींचने के लिए खोपड़ियां दिखाने और मुंह में मरे हुए चूहे रखने जैसे अनोखे तरीके भी अपनाए।
2023: पहलवानों का प्रदर्शन
2023 में देश के कई बड़े पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना दिया। विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया समेत पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए और कार्रवाई की मांग की। इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
2019: CAA के खिलाफ प्रदर्शन
इसके अलावा यहां 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन हुए। इसमें बड़ी संख्या में लोग जुटे।
NEET पेपर लीक
कॉकरोच जनता पार्टी ने हाल ही में NEET पेपर लीक को लेकर क्या करीब 40 दिन तक विरोध-प्रदर्शन किया। एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। ये आंदोलन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हुआ।

