कैसे शुरू हुई भारत की स्पेस जर्नी: मिशन के लिए राकेश शर्मा को ऐसे चुना गया, अंतरिक्ष में योगा करने वाले पहले शख्स
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पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा और शुभांशु शुक्ला।
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष की सैर करने वाले देश के दूसरे अंतरिक्ष यात्री बन गए हैं। शुभांशु शुक्ला से पहले विंग कमांडर राकेश भी अंतरिक्ष की सैर करके लौटे थे। वह पहले भारतीय थे जिन्होंने अंतरिक्ष की सैर की थी। भारत के पहले स्पेस मिशन के लिए 100 से ज्यादा लोगों में से राकेश शर्मा को चुना गया था। राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में जीरो ग्रेविटी योगा किया था। ऐसा करने वाले वह विश्व के पहले इंसान हैं।
आइए, जानते हैं कि कैसे शुरू हुई भारत की स्पेस जर्नी।
राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में बिताए 7 दिन 21 घंटे
3 अप्रैल 1984 को राकेश शर्मा अपने अंतरिक्ष मिशन पर गए थे। उन्होंने 7 दिन 21 घंटे अंतरिक्ष में ISS में गुजारे थे।जब उनसे पीएम इंदिरा गांधी ने पूछा था कि आसमान से भारत कैसा दिखता है तो उन्होंने कहा था- सारे जहां से अच्छा। साथ ही उन्होंने कहा था कि पृथ्वी पर सूर्योदय और सूर्यास्त को स्पेस से देखना सबसे अच्छा टाइम था।
भारत की अंतरिक्ष यात्रा कैसे शुरु हुई
1980 में सोवियत संघ(अब रुस) के राष्ट्रपति लियोनिद ब्रेझनेव भारत की यात्रा पर आए थे। उस समय सोवियत संघ अंतरिक्ष में सबसे बड़ा खिलाड़ी था। उन्होंने इंडो-सोवियत संघ से मानव रहित मिशन का आईडिया दिया। भारत ने भी उस समय मिशन को मंजूरी दे दी। मिशन का नाम पवन रखा गया। इसके लिए 1.7 करोड़ रुपये का बजट अलॉट किया गया था। यह उस समय के हिसाब से एक भारी-भरकम राशि थी।
150 पायलट में से 2 का सलेक्शन
अंतरिक्ष मिशन पर भेजे जाने के लिए ऐसे पायलट की खोज की गई, जो सुपरसोनिक फाइटर जेट उड़ाते हों। इसके साथ ही उनकी फिजिकल फिटनेस भी देखी गई। 150 लोग ऐसे मिले जो इस क्राइटेरिया में सलेक्ट हुए थे। लेकिन बाद में सिर्फ दो नाम 35 साल के स्कड्रन लीडर राकेश शुक्ला और 40 साल के विंग कमांडर रवीश मल्होत्रा का नाम तय हुआ।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, रवीश मल्होत्रा का जन्म लाहौर में हुआ था। 3400 घंटे विमान उड़ाने का अनुभव था। जबकि राकेश शर्मा को 1600 घंटे विमान उड़ाने का अनुभव था। दोनों ने 1971 के युद्ध में भाग लिया था। उन्होंने कई मिशन भी पूरे किए थे।
पायलट को जीरो ग्रेविटी की दी गई ट्रेनिंग
रवीश और राकेश शर्मा को रुस के यूरी गागरिन ट्रेनिंग सेंटर लाया गया। जहां दोनों पायलट की ट्रेनिंग शुरु हुई। उन्हें स्पेस टेक्नोलॉजी और अंतरिक्ष यान के जमीनी मॉडल के बारे में जानकारी दी गई। दोनों को जीरो ग्रेविटी फील कराने के लिए स्पेशल प्लेन IL-76 में फ्लाइंग करवाई गई। जिससे एस्ट्रोनॉट मानसिक और शरीरिक तौर पर तैयार हो सकें।
मिशन पर जाने के लिए 3 लोगों को चुना गया था। सोवियत के मालिशेव गेन्नेडी और स्ट्रेकालोव, भारत से राकेश शुक्ला को चुन लिया गया। उस समय रवीश मल्होत्रा ने कहा था कि चाहे राकेश हों या फिर मैं, आखिरकार वो एक इंडियन हैं जो अंतरिक्ष में जा रहा है। यूरी गागरिन ट्रेनिंग सेंटर के प्रमुख जनरल गेओर्गी टिमोफीविच बेरेगोवॉय ने कहा था कि मल्होत्रा ने भले ही उड़ान नहीं भरी हो लेकिन वह भी 100% अंतरिक्ष यात्री हैं।
तिलक लगाकर अंतरिक्ष स्टेशन भेजा
मिशन पर जाने से पहले तीनों अंतरिक्ष यात्रा यूरी गागरिन के कक्ष में गए और वहां उन्होंने एक डायरी पर साइन किए। रवीश और राकेश शर्मा एक रिवाज का हिस्सा बने। मिशन के लिए बैकानूर (कजाखस्तान) रवाना होने से पहले मॉस्को में उनकी पत्नियों ने उन्हें तिलक लगाया। इस मिशन में फ्लाइट कंमाडर मालिशेव गेन्नेडी ने कहा- हम मिशन पर जाने के लिए तैयार हैं।
मॉस्को में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अंतरिक्ष यात्री (सोर्स-इंडिया टुडे)
24 मेक की स्पीड से भरी उड़ान
स्पेस सूट पहनकर तीनों सोयूज टी-11 में सवार हुए। लॉन्चिंग पेड से 3 किमी दूर सोवियत संघ और भारत का झंडा लहरा रहा था। 2 हजार किमी दूर हर भारतीय टीवी पर नजारे गढ़ा कर देख रहा था। 2 घंटे बाद इंजन शुरु हुआ। 24 Mac की स्पीड से रॉकेट ने उड़ान भरी। राकेश शर्मा की पत्नी और बच्चे मॉस्को में टीवी पर इस मिशन को देख रहे थे।
ग्रेविटी के अपोजिट यान जब तेजी से अंतरिक्ष में जा रहा था, तब राकेश शर्मा को सीने में भारीपन महसूस हुआ। राकेश शर्मा रॉकेट सोयूज टी-11 सोवियत स्पेस स्टेशन सैल्यूट-7 में पहुंचे। इस तरह राकेश शर्मा स्पेस में जाने वाले देश के पहले और विश्व के 183 वें व्यक्ति बन चुके थे।
रूसी यात्रियों को खिलाया भारतीय खाना
अपनी अंतरिक्ष यात्रा के दौरान राकेश शर्मा ने कई वीडियो बनाए। राकेश शर्मा स्पेस में मैसूर डिफेंस फूड रिसर्च लैब की मदद से बना इंडियन फूड साथ लेकर गए थे। ISS में रहने के दौरान उन्होंने सूजी हलवा, आलू छोले और पुलाव रुसी साथियों के साथ खाया था।
राकेश शर्मा साथ ले गए थे वतन की मिट्टी
राकेश शर्मा अपने साथ भारत की मिट्टी, इंदिरा गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह की तस्वीरें लेकर गए थे। जब उन्होंने एयरचीफ मार्शल दिलबाग सिंह ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना के लिए आसमान में अब कोई सीमा नहीं है।
मिशन में हुई थी गड़बड़ी
राकेश शर्मा की अंतरिक्षा जर्नी के दौरान एक बड़ी गड़बड़ी भी हुई थी। अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन की फर्नेंस या भट्टी खराब हो गई थी। लेकिन सभी अंतरिक्ष यात्रियों ने मिलकर फर्नेंस को ठीक कर लिया था।
मिशन से भारत को क्या मिला?
जर्नी के दौरान राकेश शर्मा ने अलग-अलग एक्सपेरीमेंट किए। उन्होंने भारतीय क्षेत्रों की तस्वीरें भी क्लिक कीं। उन्होंने विशेष मल्टी-स्पेक्ट्रल कैमरों से भारत के 60 प्रतिशत एरिया को कवर किया। इससे साइंटिस्ट को भारत के मानचित्र और प्राकृतिक संसाधनों की सटीक जानकारी मिली। उनकी क्लिक की गई तस्वीरों से भारत को मानचित्रिकरण में समय और पैसों की बचत हुई। साथ ही उनके जाने से साइंटिस्ट को कई रिसर्च करने में मदद मिली। उन्होंने अंतिरक्ष से ही म्यांमार में जंगल में भीषण आग लगने की सूचना दी थी। इसके बाद आग पर कंट्रोल किया गया।
मॉड्यूल टी-10 से वापस लौटे
11 अप्रैल 1984 के दिन राकेश शर्मा अपने दोनों साथियों के साथ पुराने मॉड्यूल टी-10 से वापस लौटे। सोयूज टी-11 को वहां मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों के लिए छोड़ दिया गया। उसी दिन तीनों यात्री वापस धरती पर लौट आए। मेडिकल परीक्षण के बाद राकेश शर्मा ने 5 मई 1984 को अपने देश जमी पर पैर रखे।
तीनों एस्ट्रोनॉट्स को भारत ने किया सम्मानित
तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को भारत सरकार ने अशोक चक्र से सम्मानित किया। वहीं, सोवियत सरकार ने राकेश शर्मा को ‘सोवियत संघ का हीरो’ सम्मान से नवाजा। रवीश मल्होत्रा इस मिशन पर नहीं जा सके, लेकिन उन्होंने ट्रेनिंग पूरी की थी। इस बात को ध्यान में रखते हुए मल्होत्रा को भी कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।

