फ्रांस के साथ 6th जेनरेशन फाइटर जेट बनाएगा भारत: कोई भी राडार डिटेक्ट नहीं कर पाएगा, दुश्मन का सर्विलांस भी जाम कर देगा- यहां प्रोजेक्ट डीटेल्स
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इंडियन एयरफोर्स को फाइटर जेट की कमी का सामना करना पड़ रहा है। IAF के पास 42.5 स्क्वाड्रन होनी चाहिए, लेकिन अभी 29 स्क्वाड्रन ही हैं। (AI इमेज)
नेशनल डेस्क. भारत फ्रांस के 6th जनरेशन फाइटर जेट 'FCAS' प्रोग्राम में शामिल हो सकता है। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने संसद में बताया, भारत फ्रांस के एंबिशियस 'फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम' (FCAS) प्रोग्राम का हिस्सा बनने की तैयारी कर रहा है।
जानिए क्या है FCAS प्रोजेक्ट, इसकी खूबियां, भारत को इससे क्या हासिल होगा और IAF को जरूरत क्यों पड़ी।
अचानक इसकी चर्चा क्यों है?
फ्रांस और जर्मनी मिलकर 6th जनरेशन का एक बेहद एडवांस फाइटर जेट बनाने के प्रोजेक्ट 'FCAS' पर काम कर रहे थे। हाल ही में जर्मनी इस प्रोजेक्ट से अलग हो गया है। जर्मनी के हटने से भारत के लिए इस प्रोजेक्ट में शामिल होने के रास्ते खुल गए। भारत ने इसमें एंट्री के लिए फ्रांस से बातचीत शुरू कर दी है। भारत के रक्षा मामलों की स्थायी समिति की 25वीं रिपोर्ट में इस बारे में जानकारी दी गई है।

IAF को इसकी जरूरत क्यों?
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब इंडियन एयरफोर्स को फाइटर जेट की कमी का सामना करना पड़ रहा है। अभी IAF के पास 42.5 स्क्वाड्रन होनी चाहिए, लेकिन 29 स्क्वाड्रन ही हैं। आने वाले सालों में पुराने हो रहे जगुआर और मिराज 2000 जेट भी रिटायर होंगे।
IAF की नजर तेजस प्रोग्राम और 5th जेन AMCA पर टिकी हैं, जिसे 2035 के आसपास शामिल करने का लक्ष्य है। FCAS इन सबसे एडवांस होगा, और भारत के पास इस तरह का अभी कोई भी प्रोजेक्ट नहीं है।

भारत ने FCAS को क्यों चुना?
भारत और फ्रांस के संबंध भी बहुत अच्छे रहे हैं। दोनों देशों के बीच डिफेंस रिलेशन राफेल से कई दशक पुराने हैं। IAF सात दशकों से भी ज्यादा समय से फ्रांस में बने या फ्रांस की तकनीक वाले फाइटर जेट का इस्तेमाल कर रही है।
इसकी शुरुआत 1953 में 'तूफानी' के तौर पर शामिल किए गए 'ओरागन' (Ouragan) से हुई थी, जिसके बाद 'मिस्टेयर' (Mystere), 'जगुआर' (Jaguar) और 'मिराज 2000' (Mirage 2000) को शामिल किया गया। 'मिराज 2000' ने 1999 के कारगिल वॉर में भारत को विजय दिलाई थी। अब राफेल, IAF का सबसे आधुनिक और ऑपरेशनल लड़ाकू विमान है।

रक्षा अधिग्रहण परिषद ने फरवरी में मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम के तहत 114 अतिरिक्त राफेल जेट डील को मंजूरी दी। नेवी पहले ही कैरियर ऑपरेशन के लिए 26 राफेल-मरीन फाइटर जेट की डील कर चुकी है।
भारत- फ्रांस के डिफेंस रिलेशन
भारत-फ्रांस की स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप सिर्फ फाइटर जेट तक ही सीमित नहीं है। 1998 में भारत के पोखरण-II परमाणु टेस्टिंग के बाद लगाए गए बैन में फ्रांस शामिल नहीं हुआ था, उसी साल नई दिल्ली ने फ्रांस के साथ स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप की थी। दोनों देशों ने 2023 में 'होरिजोन 2047' रोडमैप अपनाया, और अब उनका सहयोग सबमरीन, स्पेस, मिलिट्री एक्साइज और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में भी बढ़ गया है।

फ्रांस से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स में छह स्कॉर्पीन-क्लास सबमरीन बनाई हैं, जबकि सफ्रान ने हैदराबाद में M88 इंजन के मैंटनेंस के लिए एक सर्विस सेंटर भी बनाया है। इस साल की शुरुआत में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारत विजिट के दौरान एक जॉइंट एडवांस्ड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट ग्रुप बनाने का फैसला भी लिया है।
प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी में भी साथ
फ्रांस की कंपनी सफ्रान और DRDO की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट मिलकर AMCA Mk2 के लिए ज्यादा थ्रस्ट वाले इंजन पर काम कर रहे हैं। इसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मुख्य है। इस प्रस्ताव को सरकार की मंजूरी का इंतजार है। अगर सबकुछ सही रहा तो इस टेक्नोलॉजी के जरिए स्वदेशी फाइटर जेट प्रोग्राम (कावेरी इंजन) की सबसे पुरानी कमियों में से एक को दूर किया जा सकता है।
FCAS क्या है और भारत को क्या हासिल होगा?
- FCAS की शुरुआत 2017 में फ्रांस और जर्मनी के 6th जेनरेशन प्रोग्राम के रूप में हुई थी। बाद में स्पेन भी जुड़ा।
- यह सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं होगा, बल्कि पायलट वाले और बिना पायलट वाले रिमोट कैरियर का एक नेटवर्क होगा। ये 'कॉम्बैट क्लाउड' के जरिए आपस में जुड़े होंगे।
- भारत इस प्रोजेक्ट में केवल मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रहना चाहता। भारत की कोशिश डिजाइन, डेवलपमेंट और सिस्टम में हिस्सेदारी की होगी, ताकि वह इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर हासिल कर सके।
- इससे पहले भारत ने तकनीक और कॉस्ट डिफरेंस के चलते रूस के साथ 5वीं पीढ़ी (FGFA) का प्रोजेक्ट 2018 में छोड़ दिया था।

कब तक पूरा होगा ये प्रोजेक्ट
FCAS एक लॉन्ग टर्म प्रोजेक्ट है। इसका डेमोंस्ट्रेटर 2031-32 तक तैयार होने का लक्ष्य है। 2040 के दशक तक इसके ऑपरेशनल होने की उम्मीद है। भारत की इसमें दिलचस्पी फ्यूचर की कॉम्बैट एविएशन तकनीक में अपनी जगह सुरक्षित करने की है।

