सांसद बोले- गया एयरपोर्ट का कोड नेम ‘GAY’ अपमानजनक: सरकार से पूछा- कब तक बदल देंगे; LGBTQ कम्युनिटी बोली- सामाजिक कलंक अभी बहुत गहरा
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बिहार का गया ऐतिहासिक रूप से बहुत प्रसिद्ध है। यहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।
बिहार के ‘गया इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ के तीन अक्षरों का कोड 'GAY' राज्यसभा सांसद भीम सिंह को रास नहीं आया। उन्होंने इस कोड को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अपमानजनक बताकर इसे बदलने की मांग की है।
दरअसल, हर एयरपोर्ट का तीन अक्षरों वाला कोड होता है। यह कोड जिस शहर में एयरपोर्ट होता है, उसके पहले तीन अक्षरों से बना होता है। इसी क्रम में गया इंटरनेशनल एयरपोर्ट का कोड GAY है।
अब LGBTQ एक्टिविस्ट्स ने सांसद की आलोचना करते हुए माफी मांगने को कहा है। उनका कहना है कि भीम सिंह की यह मांग LGBTQ कम्युनिटी के प्रति उनकी नफरत और अपमान को दिखाती है।
पहले LGBTQ कम्युनिटी क्या है, समझ लीजिए
यहां L का मतलब लेस्बियन होता है। अगर कोई फीमेल सेम जेंडर की तरफ अट्रैक्ट हो, तो उसे लेस्बियन कहते हैं। ऐसे ही अगर कोई मेल यानी पुरुष दूसरे पुरुष की तरफ आकर्षित रहता है, तो उसे GAY कहते हैं।
B का मतलब यहां बाइसेक्शुअल है, यानी जो लोग पुरुष और महिला दोनों के प्रति आकर्षित हों। इसके बाद आते हैं ट्रांसजेंडर। ट्रांसजेंडर वो होते हैं, जिनकी शारीरिक बनावट जन्म से ही न पुरुषों की तरह होती है और न ही महिलाओं की तरह। वे थर्ड जेंडर कहलाते हैं।
अंत में आते हैं-क्वीर। ये वो लोग होते हैं, जो अपना जेंडर या सेक्शुअल ओरिएंटेशन छिपाते हैं। इनकी एक कम्युनिटी होती है। इसके जरिए ये अपने हक और अधिकार की बात करते हैं।
सांसद का सवाल- कोड नेम कब तक चेंज होगा
बिहार से बीजेपी समर्थित राज्यसभा सांसद सांसद डॉ. भीम सिंह ने कहा कि उन्हें गया इंटरनेशनल एयरपोर्ट के कोड से दिक्कत है। उन्होंने संसद में एक लिखित सवाल भी पूछा है। उन्होंने पूछा है कि जब लोग इससे अनकंफर्टेबल फील कर रहे हैं, तो इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) इस कोड को इस्तेमाल ही क्यों कर रहा है।
उन्होंने सरकार से कहा है कि गया इंटरनेशनल एयरपोर्ट का कोड नेम सम्मानजनक और सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त होना चाहिए। उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि अगर बदलाव होगा तो उसकी प्रक्रिया कब तक पूरी कर ली जाएगी।
‘सामाजिक कलंक अभी बहुत गहरा’
सांसद की मांग पर LGBTQ समुदाय का गुस्सा फूट पड़ा है। LGBTQ समुदाय से जुड़े एक शख्स ने कहा- इस तरह के बयान समाज में भ्रांतियों और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। हमें अमर्यादित बताना इस समुदाय की गरिमा छीनने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने LGBTQ समुदाय को सम्मान और समान अधिकार दिए हैं।
एक और शख्स ने कहा- इस तरह की बातों से साफ है कि LGBTQ समुदाय के खिलाफ स्टिग्मा यानी सामाजिक कलंक कितना गहरा है।
2018 में समलैंगिक संबंधों को कोर्ट ने मान्यता दी
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 377 को रद्द कर समलैंगिक संबंधों को अपराध की कैटेगरी से हटा दिया। इससे यह कानूनी अधिकार बन गया। हालांकि, देश मेंं सेम सेक्स मैरिज अभी लीगल नहीं है। इस पर फैसला संसद के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया है। समलैंगिक जोड़े कुछ मामलों में लिव-इन पार्टनर की तरह रह सकते हैं। शादी और पूरी तरह कानूनी मान्यता के लिए संसद में कानून बनना बाकी है।

