Explainer - नक्सलियों का काल बनी DRG: इस स्पेशल फोर्स की जंगल के हर कोने तक पहुंच, सरेंडर नक्सली भी इसके जवान; इस फोर्स की खास बातें जानिए
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नवंबर, 2024 में छत्तीसगढ़ के सुकमा में DRG जवानों ने 10 नक्सलियों को मार गिराया था। इसके बाद जवानों ने जश्न मनाया था। (फाइल वीडियो)
सबसे पहले एक बयान…‘31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का खत्म होना तय है।’ ये बात 14 मई 2025 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 नक्सलियों के एनकाउंटर के बाद कही थी।
केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ रही हैं। दोनों सरकारों की ज्वॉइंट स्ट्रैटेजी और कम्बाइंड ऑपरेशन्स कितने कामयाब रहे? इसको एक आसान आंकड़े से समझा जा सकता है। 2 या 3 साल पहले तक छत्तीसगढ़ के 12 जिले नक्सल प्रभावित थे। अब यह संख्या महज 4 रह गई है। नक्सलियों के खिलाफ हर ऑपरेशन में सबसे आगे DRG (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) के जवान ही मोर्चा संभालते हैं। सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स मानते हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ DRG ही गेमचेंजर साबित हुई।
तो चलिए कि एक वक्त जिस नक्सलवाद को नासूर माना जा रहा था, उसी नक्सलवाद को उसी के स्ट्रॉन्ग होल्ड में DRG ने किस स्ट्रैटेजी से नेस्तनाबूद कर दिया। क्या खास है इस स्पेशल फोर्स DRG में…हर पहलू पर नजर डालते हैं…
‘जैसे को तैसा…’ वाली रणनीति
DRG नक्सलियों को उन्हीं की स्ट्रैटेजी में फंसाकर खत्म कर रही है। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में मारे गए मोस्ट वॉन्टेड नक्सल कमांडर बसवराजु के कैम्प से एक डायरी मिली। इसमें लिखा था- कॉमरेड तुम कहीं भी छिप जाओ, DRG फोर्स तुम्हें ढूंढ कर मार ही देगी।

DRG का आईडिया कहां से आया
2008 में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का बड़ा नेटवर्क था। सुरक्षाबल इन नक्सलियों को ट्रैक नहीं कर पा रहे थे। इसके उलट नक्सलियों को फोर्स के मूवमेंट की हर जानकारी रहती थी। नक्सली एम्बुश (जंगल में चारों तरफ से घेरना) लगाकर जवानों पर हमला करते थे। सुरक्षाबल नाकाम हो रहे थे। या कहें कि उनके ऑपरेशन्स को नक्सली कामयाब नहीं होने दे रहे थे।
सरकार के लिए यह बहुत गंभीर मुद्दा था। ऐसे में सरकार ने स्थानीय लोगों को फोर्स में भर्ती करना शुरू किया। इस तरह छत्तीसगढ़ पुलिस की स्पेशल जंगल वॉर फेयर यूनिट DRG बनाई गई। DRG की पहली पोस्टिंग सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित कांकेर और नारायणपुर जिलों में की गई। फिलहाल ये फोर्स बीजापुर, बस्तर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा में पूरी मुस्तैदी से ऑपरेशन्स को अंजाम दे रही है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 तक छत्तीसगढ़ में 3500 जवान DRG में थे।
DRG में नक्सल प्रभावित इलाकों के युवाओं की भर्ती की जाती है। इन्हें नक्सल इलाकों की तमाम बारीकियां पता होती हैं। सरेंडर कर चुके कुछ नक्सली भी इस फोर्स का हिस्सा हैं। इन्हें ‘धरती पुत्र’ कहा जाता है। कुछ वक्त पहले छत्तीसगढ़ में तैनात रहे एक अफसर ने कहा था- जंगल में तो कांटे से ही कांटा निकालना होता है।

उनकी यह बात भले ही तंज लगे, लेकिन DRG और उसके ऑपरेशन्स पर आप बारीकी से गौर करेंगे तो यह बात हकीकत लगेगी। सरेंडर्ड नक्सली वहां तक आसानी से पहुंच जाते हैं, जहां अमूमन पुलिस फोर्स नहीं पहुंच पाती। इन्हें आप घने जंगल में बने नक्सल हाइड आउट्स कह सकते हैं। दूसरी बात, DRG के जवानों को नक्सलियों की माॅडस ऑपरेंडी (काम करने के तरीके) की तमाम बातें पता होती हैं। उनका यही अनुभव सिक्योरिटी ऑपरेशन्स को कामयाब बना देता है।
पुलिस और आर्मी दोनों की ट्रेनिंग
DRG फोर्स को नक्सलियों पर कार्रवाई के लिए आर्मी की तर्ज पर स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें राज्य पुलिस अकादमी में एक साल का कोर्स कराया जाता है। कांकेर के काउंटर टेररिज्म सेंटर और जंगल वारफेयर कॉलेज में DRG जवानों की स्पेशल ट्रेनिंग होती है। यहां पर गुरिल्ला वॉर फेयर और मॉर्डन वेपन्स की ट्रेनिंग दी जाती है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, कई बार जवानों की एडवांस ट्रेनिंग आर्मी कैंप में भी होती है। इन्हें आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड फैसेलिटी ले जाकर वहां जंगल वारफेयर की ट्रेनिंग दी जाती है।
सरेंडर नक्सली बनते हैं सीक्रेट ऑपरेटिव
DRG में जवानों की 3 पदों पर भर्ती होती है। असिस्टेंट कॉन्स्टेबल, कॉन्स्टेबल और सीक्रेट ऑपरेटिव। असिस्टेंट कॉन्स्टेबल पद पर नक्सली हिंसा से प्रभावित युवा और पूर्व नक्सलियों को भर्ती किया जाता है। कॉन्स्टेबल की औपचारिक भर्ती की जाती है, जबकि सरेंडर नक्सलियों को सीक्रेट ऑपरेटिव (गोपनीय सैनिक) बनाया जाता है।

बाकी फोर्स से अलग क्यों हैं DRG
स्थानीय होने की वजह से DRG को नक्सलियों के मूवमेंट, घने जंगल में छिपे होने, उनके ऑपरेशन पैटर्न के बारे में जानकारी होती है। ये दूर-दराज के गांव, पहाड़ियों, जंगलों के बीच कई-कई दिन सर्चिंग करते हैं। मई 2025 में बीजापुर के कर्रेगुट्टा पहाड़ी क्षेत्र में DRG ने 21 दिन जंगल में रहकर बड़ा ऑपरेशन किया था, इसमें 31 नक्सली मारे गए थे।
नक्सल क्षेत्र से जुड़े होने से DRG जवानों का लोकल इंटेलिजेंस नेटवर्क जबरदस्त होता है। वो स्थानीय भाषा और आदिवासी ग्रामीणों के बीच घुले-मिले रहते हैं। इससे नक्सलियों की हर हरकत पर इनकी नजर होती है। अभी DRG में 40 प्रतिशत सरेंडर नक्सली हैं।
DRG प्लानिंग कैसे करती है
नारायणपुर के सीनियर पुलिस अफसर प्रभात कुमार कहते हैं- DRG की कोर फिलॉसफी 3 प्वाॅइंट के आसपास घूमती है, मति (दिमाग या बुद्धि या इंटेलिजेंसी), गति और कम नुकसान।’
मति- ऑपरेशन के पीछे का इंटेलिजेंस
DRG नक्सल क्षेत्र का एनालिसिस भी करते हैं। ऑफ ड्यूटी के दौरान वो लैपटॉप पर जगह का मैप देखकर अगले मिशन की प्लानिंग करते हैं।
गति- DRG जवान रात में पहाड़ियों पर भी 30-35 किलोमीटर तक ट्रैक कर सकते हैं। जंगली रास्तों की जानकारी होने के चलते इस फोर्स के जवान तेज भागने में एक्सपर्ट होते हैं। कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर बड़ा ऑपरेशन इसी स्ट्रेटजी का हिस्सा था।
कम नुकसान: हर ऑपरेशन में सबसे पहले जवान छोटी टीम बनाकर सर्चिंग करते हैं। पूरी जानकारी जुटाने के बाद ही बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया जाता है।

सेंटर और स्टेट का कम्बाइंड प्लान
हाल ही में केंद्र सरकार ने नक्सलियों के खात्मे के लिए 870 करोड़ का पैकेज दिया है। छत्तीसगढ़ की नक्सल सरेंडर पॉलिसी 2025 के अनुसार अगर कोई इनामी नक्सली सरेंडर करता है तो इनामी राशि सरेंडर नक्सली को दी जाती है। साथ ही 50 हजार रुपये तुरंत दिए जाते हैं और 3 साल तक 10 हजार रुपये हर महीने मिलते हैं।
AK-47 के साथ सरेंडर करने पर 4 लाख रुपये मिलते है। इसके अलावा समर्पित नक्सलियों को रोजगार के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। इतना ही नहीं केंद्र और राज्य की सभी योजनाओं का लाभ उन्हें मिलता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024 में 881 ने नक्सलियों ने सरेंडर किया था। मार्च 2025 तक 521 नक्सली हथियार डाल चुके हैं।
5 महीने में 180 से अधिक नक्सली ढेर
सरकारी डेटा के अनुसार सुरक्षाबलों ने 2024 में 239 नक्सलियों को मार गिराया। इस साल मई 2025 तक 38 ऑपरेशन्स में करीब 180 नक्सली मारे जा चुके हैं।

