भारत के सबसे खतरनाक जासूस की कहानी: प्ले में एक्टिंग देख RAW अफसर ने एजेंट बनने का ऑफर दिया, PAK सेना में मेजर बना; इंदिरा गांधी ने नाम दिया 'ब्लैक टाइगर'
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भारत आज 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए कई वीर सपूतों ने अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया। आजादी के बाद देश की आन बान शान को कायम रखने के लिए भी समय-समय पर वीर सपूत अपनी शहाहत देते रहे। ऐसे ही एक रियल हीरो रविंद्र कौशिक थे, जो RAW के एजेंट थे। वे पाकिस्तान की सेना में मेजर बने और भारत को कई अहम खुफिया जानकारी भेजीं। आईए जानते हैं भारत के सबसे खतरनाक जासूस ब्लैक टाइगर की पूरी कहानी...
एक ऐसा भारतीय जासूस जो पाकिस्तानी आर्मी में मेजर के पद तक रहा। कई सारी ऐसी जानकारियां भेजी जो भारत के लिए सोने की खान साबित हुई। काम में इतनी सफाई की इंदिरा गांधी ने इस जासूस को ब्लैक टाइगर नाम दिया। 30 साल तक अपनी जान की बाजी लगाकर और दुश्मनों के बीच रहकर देश की सेवा करने वाले इस शख्स का नाम है रविंद्र कौशिक।
एक्टिंग से प्रभावित हुए रॉ ऑफिसर
रंगमंच के शौकीन रविंद्र की एक्टिंग ऐसी की जैसे सचमुच की जिंदगी जी रहे हो। 1973 में रॉ के एक अधिकारी ने रविन्द्र को थियेटर में देखा और फिर गंगापुर के एक साधारण से लड़के की जिंदगी ही बदल गई। रविंद्र की लाइव परफॉर्मेंस को देखकर ही अधिकारी ने उन्हे रॉ के एजेंट के तौर पर काम करने का ऑफर दिया। रविंद्र दिखने में किसी हीरो से कम नहीं थे और हमेशा अपने अलग ही स्टाइल में रहते।
देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा उनमें बचपन से ही था। भगत सिंह का एक्ट करना उनके लिए पहली पसंद था। जब रॉ के अधिकारी ने उन्हे देखा तब भी वे एक सैनिक का रोल कर रहे थे जिसे चीनी सेना ने पकड़ लिया था। जब रविंद्र को भारतीय खुफ़िया एजेंसी रॉ में नौकरी का ऑफर मिला तो उन्होंने तुरंत हां कर दी और घर पर कह दिया कि उनकी दिल्ली में नौकरी लगी है।
उर्दू बोलना सीखा, पूरी पहचान ही बदल गई
कॉलेज से बी कॉम के बाद 23 साल की उम्र में भारत के अंडरकवर एजेंट बन गए। परिवार छूटा, देश छूटा, पहचान भी बदल गई। रविंद्र ने अपनी जिंदगी के करीब 30 साल देश के नाम कर दिये। दो महीने तक रविंद्र की ट्रेनिंग हुई। ट्रेनिंग के दौरान पाकिस्तान में आसानी से रहने के तौर तरीके सिखाए गए। उन्होंने उर्दू सीखी, नमाज करना सीखा यहां तक की खतना भी करवाया ताकि किसी को जरा शक ना हो। राजस्थान के गंगापुर जिले में 1952 में उनका जन्म हुआ। भारत पाक के रिश्तों को देखते हुए ही बड़े हुए और पर्याप्त जानकारी भी थी। उन्हे क्षेत्र की भाषा बखुबी आती थी। जिससे उन्हें काफी आसानी हुई।
भारत के सारे डॉक्युमेंट्स से हटा नाम
1975 में ट्रेनिंग के बाद रविंद्र पाकिस्तान पहुंचे और वहां के लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। भारत से उनके सारे डॉक्युमेंट्स हटा दिये गए थे। नए पाकिस्तानी पासपोर्ट के साथ अब रविंद्र, नबी अहमद शेख बन चुके थे। वे अपने काम में काफी माहिर थे और जिगर इतना की पाकिस्तानी आर्मी की बकायदा एग्जाम दी और आर्मी जॉइन भी कर ली।
लिपिक के तौर पर जॉइन हुए रविंद्र ने आर्मी में इतनी तरक्की की कि मेजर रैंक तक पहुंचे। भारत को जानकारियां भेजने के दौरान पाकिस्तानी आर्मी को कभी शक भी नहीं होने दिया। ये जानकारियां भारत के लिए सोने की खान साबित हुई। रविंद्र की जानकारी के बदौलत ही पाकिस्तान का भारत के खिलाफ कोई भी मिशन नाकामयाब हो जाता।
पाकिस्तान की मियांवली जेल में हुई मौत
1983 में रविंद्र से मिलने के लिए रॉ ने भारत से एक जासूस भेजा। लेकिन ये जासूस पकड़ा गया और उसने सारी सच्चाई बता दी। जाल बिछा के रविंद्र को रंगे हाथों पकड़ा लेकिन वहां से चकमा देकर वह भाग गए। आखिरकार पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसी ने रविंद्र कौशिक को पकड़ लिया और सियालकोट जेल में डाल दिया। 1985 में मियांवाली की जेल में उम्रकैद की सजा सुनाई गई। 16 साल जेल में गुजारने और तमाम प्रताड़ना झेलने के बाद 2001 में टीबी और हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। भारत ने एक जांबाज जासूस खो दिया। भारत सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली।

