बड़ौदा रियासत के आखिरी महाराज: यहां के राजा दुनिया के 8वें सबसे अमीर व्यक्ति रहे, 3 बच्चों की मां से दूसरी शादी के लिए बदला कानून
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बड़ौदा रियासत के आखिरी महाराजा प्रताप सिंह राव गायकवाड़।
19 जुलाई 1968 यानी आज ही के दिन बड़ौदा रियासत के आखिरी महाराजा प्रताप सिंह राव गायकवाड़ का लंदन में निधन हुआ था। एक जमाने में यहां के राजा दुनिया के 8वें सबसे अमीर राजा हुआ करते थे। इन्हीं का बनाया हुआ बड़ौदा का लक्ष्मी पैलेस ब्रिटेन के बकिंघम पैलेस से 4 गुना बड़ा है। ये उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर एंटिलिया से भी बड़ा है।
बड़ौदा रियासत का भारत में कैसे विलय हुआ और आखिरी महाराजा प्रतापसिंह राव गायकवाड़ की लव स्टोरी के बारे जानेंगे?
डोमिनी लिपियर और लैरी कॉलिंस अपनी किताब फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखते है- बड़ौदा रियासत के राजा दरबार में सोने की पोशाक पहनकर आते थे। बड़ौदा के राजा जिस हाथी से चलते थे। उस हाथी से सोने की जंजीरे लटकती रहती थी। रियासत के पास एक हीरा हुआ करता था, जिसे फ्रांस के सम्राट नेपोलियन ने अपनी प्रेमिका यूजीन को दिया था।
बड़ौदा रियासत कैसे हुई शुरुआत
बड़ौदा रियासत की 18वीं सदी में शुरुआत हुई थी। मराठा साम्राज्य लगातार मजबूत हो रहा था, शाह जी महाराज के आदेश पर मराठा जिंदल खंडेराव दहाड़े ने मुगलों के इलाकों पर हमला कर कब्जा शुरू किया। 1716 में खंडेराव के मराठाओं के सेनापति बने। उनके एक जनरल दामाजी गायकवाड़, जिन्हें शमशेर बहादुर की उपाधि मिली हुई थी। दामाजी गायकवाड़ ने 1721 में बड़ौदा रियासत की नींव रखी थी। उनके बाद पिलाजी गायकवाड़ ने बड़ौदा रियासत की जिम्मेदारी संभाली।
संधि में एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के पास चला गया
1758 में दामाजी गायकवाड़ ने अहमदाबाद के मुगल गवर्नर को पद से हटा दिया। आंग्ल- मराठा युद्ध के बाद बड़ौदा रियासत ने अंग्रेजों के साथ संधि करना ही उचित समझा। 1802 में बड़ौदा के राजा आनंदराज गायकवाड़ और अंग्रेजों के बीच एक संधि हुई, जिसमें इस रियासत का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के कब्जे में चला गया।
1856 में बड़ौदा की गद्दी पर खंडेराव गायकवाड़ द्वितीय बैठे। 1857 की क्रांति के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी की पूरी कमान ब्रिटिश राज के पास आ गई। ब्रिटिश सरकार का एक रेजिडेंट ऑफिसर हर रियासत में तैनात किया गया। बड़ौदा में एक ऑफिसर तैनात रहता था।
महाराजा खंडेराव का कोई पुत्र नहीं था
उनकी मौत के बाद उनके भाई मल्हारराव गायकवाड़ महाराज बने। यहां पर एक ब्रिटिश अधिकारी रोबर्ट फायरे की तैनाती हुई। 1874 में रोबर्ट फायरे सुबह-सुबह वॉक से आए थे, उनके नौकर ने उन्हें एक शरबत का ग्लास दिया। जैसे ही उन्होंने एक घूंट लिया। उन्होंने देखा ग्लास के अंदर कुछ काला जमा हुआ था। रोबर्ट ने आरोप लगाया कि महाराजा ने उन्हें मरवाने के लिए जहर दिया था। ब्रिटिश सरकार खुद मल्हार राव को हटाने का सोच रही थी। जांच बैठाई गई। फैसला महाराज के पक्ष में नहीं आया। उन्हें गद्दी से हटा दिया गया।
12 साल का गोपाल बना महाराजा
अब एक नए महाराज की तलाश होने लगी। पूर्व महाराज खंडेराव की पत्नी जमुना बाई ने गायकवाड़ राजवंश के सभी रिश्तेदारों को बड़ौदा आमंत्रित किया। 12 साल का गोपाल भी अपने पिता के साथ यहां आया था। वो महाराष्ट्र के कबलाना से 600 किमी की यात्रा कर बड़ौदा आए। जब गोपाल राव से पूछा गया कि आप यहां क्यों आए हैं। तब उन्होंने कहा मैं यहां राज करने आया हूं। उन्हें बड़ौदा रियासत का नया महाराज चुन लिया गया। नया नाम दिया गया- सयाजीराव गायकवाड़। 1881 आते- आते उन्होंने पूरी तरह से बड़ौदा का राज काम संभाल लिया। अंग्रेजों ने उन्हें ‘फर्ज-ए-खास, दौलत-ए-इंग्लिशिया’ की पदवी दी। ये पदवी उन्हें ही मिलती थी, जो उनके सबसे खास होते थे। सयाजीराव ने 58 साल तक बड़ौदा पर राज किया।
सयाजीराव गायकवाड़ की उपलब्धियां
- स्कूल बनवाए
- बाल विवाह पर रोक
- अस्पताल बनवाए
- बैंक ऑफ बड़ौदा की स्थापना की
- देश की पहली पब्लिक लाइब्रेरी बनवाई
- बड़ौदा यूनिवर्सिटी की स्थापना की
- 1862 में उन्होंने गायकवाड़ बड़ौदा रेलवे की स्थापना की
- भीमराव अंबेडकर को स्कॉलरशिप दी, इसी वजह से अंबेडकर अमेरिका जा पाए
- फेमस पेंटर राजा रवि वर्मा को भी स्कॉलरशिप प्रदान की।
लक्ष्मी विलास पैलेस बड़ौदा, जिसे 1890 में सयाजीराव गायकवाड़ ने बनवाया था। 3 करोड़ स्केयर फीट में फैले विला में छोटे-बड़े करीब 170 कमरे हैं। हाउसिंगडॉटकॉम के मुताबिक इसकी कीमत 24 हजार करोड़ से अधिक है। ये बकिंघम पैलेस से 4 गुना बड़ा है।
दादा के बाद प्रतापसिंह राव ने संभाली सत्ता
सयाजीराव गायकवाड़-III (1863-1939) का कार्यकाल 1875 से 1939 तक रहा। 1939 में सयाजीराव गयाकवाड़ की मौत के बाद उनके पोते प्रतापसिंह राव गायकवाड़ को बड़ौदा का महाराज बनाया गया। द स्टोरी ऑफ इंटीग्रेशन ऑफ द इंडियन स्टेटस में वीपी मेनन लिखते है- बड़ौदा रियासत देश की सबसे ताकतवर रियासतों में से एक थी। भारत के किसी भी राजा के पास इतनी दौलत नहीं थी जितनी प्रतापसिंह राव गायकवाड़ के पास थी।
3 बच्चों की मां पर आया दिल
कोल्हापुर के घोरपड़े परिवार की शांतादेवी उनकी महारानी बनीं। इस शादी से उनके 8 बच्चे हुए। एक बार प्रताप सिंह राव गायकवाड़ घुड़सवारी के लिए मद्रास गए। जहां उनकी मुलाकात वुय्युर के जमींदार अप्पाराव बहादुर की पत्नी सीता देवी से हुई। सीता देवी के उस समय 3 बच्चों की मां थीं। प्रताप सिंह राव का दिल सीता देवी पर आ गया। महाराज प्रताप सिंह राव गायकवाड़ उस समय दुनिया के 8वें सबसे अमीर व्यक्ति थे। सीता देवी भी उन्हें पसंद करने लगी थी।
शादी के लिए कानून तक बदला
1943 में सीता देवी ने तलाक लेकर प्रतापसिंह राव से दूसरी शादी कर ली। महाराज प्रतापराव को शादी करने के लिए बड़ौदा का कानून भी बदलना पड़ा। सीता देवी ने भी पहले मुस्लिम धर्म अपनाया। मुस्लिम बनकर उन्होंने अपनी पति को तलाक दिया। फिर प्रताप सिंह राव से शादी करने के लिए हिंदू बनी। दोनों की शादी को अंग्रेज अमान्य कर देते है। अंग्रेजों ने उनकी पेंशन (प्रीवी पर्स) 50 लाख से 25 लाख रुपये कर दी। 1947 में आजादी के बाद महाराज प्रतापराव भारत में विलय के लिए मान जाते हैं। लेकिन ऐन मौके पर वो कुछ शर्ते रखते हैं। उन्होंने 2 सितंबर 1947 को सरदार पटेल को लिखे पत्र में लिखा- उन्हें बड़ौदा का महाराज घोषित किया जाए और बड़ौदा को डोमिनियन स्टेट दिया जाए लेकिन सरदार पटेल ने शर्त मानने से इंकार कर दिया।
अभी कई रियासतों के विलय का काम बाकी था। भारत सरकार ने बड़ौदा में एक कॉस्टीट्यूशनल असेंबली बना दी। जीवराज मेहता अंतरिम सरकार के मुखिया बनाए गए। इसी बीच महाराजा प्रतापराव सिंह गायकवाड़ अपनी पत्नी सीता देवी के साथ 6 हफ्ते के लिए अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने 83 करोड़ रुपये की शॉपिंग की। महारानी की शॉपिंग की बात अखबारों की सुर्खियां बन गईं। सीता देवी 1947 में मोनोको चली गई और वहां की नागरिकता ले ली। इस बीच एक बात और पता चली की महाराजा बड़ौदा की ट्रेजरी से प्रीवी पर्स के अलावा भी पैसा निकाल कर विदेश भेजते थे। उन्होंने 1943 से लेकर 1948 तक 6 करोड़ रुपये निकाले थे। साथ ही कई बेशकीमती चीजें, हीरे, ज्वैलरी भी उन्होंने अपनी पत्नी सीता देवी को भेज दी।
महाराजा ने विलय को अवैध बताया
1 मई 1949 में महाराज ने बड़ौदा को भारत में विलय कर दिया। बड़ौदा को उस समय बंबई का हिस्सा बनाया गया। लेकिन 1950 में प्रताप सिंह राव गायकवाड़ ने विलय को अवैध घोषित कर दिया। महाराज प्रताप सिंह राव ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा। महाराज प्रताप सिंह राव ने कुछ रियासत के राजाओं को पत्र लिखकर एक संगठन बना लिया।
पीएम नेहरु ने मुंबई के गृहमंत्री मुरार जी देसाई को प्रतापराव की इन हरकतों को रोक लगाने के लिए कहा। आखिर में संविधान के आर्टिकल 22 के तहत 12 अप्रैल 1951 को महाराज की पदवी छीन ली गई। जिससे उनको मिलने वाली सारी सुविधाएं बंद हो गई। उनकी जगह उनके बेटे युवराज फतेह सिंह को महाराज बनाया गया।
महाराजा का लंदन में हुआ निधन
1951 में ही महाराजा प्रतापसिंह राव देश छोड़कर लंदन चले गए। बाद में वो अपनी पत्नी सीता देवी के साथ मोनेको में बस गए। 1956 में उन्होंने सीता देवी से तलाक ले लिया। महाराज प्रताप सिंह राव लंदन आ गए। 19 जुलाई 1968 को उनका निधन हो गया।

