अटल गाथा: इंदिरा के विरोध में बैलगाड़ी से संसद पहुंचे, सांसद बने तो नेहरू बोले - ये युवा एक दिन PM बनेगा
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अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को हुआ था। आज उनकी 7वीं पुण्यतिथि है।
बात 1973 की है जब केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी, पेट्रोल के दाम बढ़ने पर विरोध करते हुए अटल जी बैलगाड़ी से संसद पहुंच गए थे। साथ ही कई दूसरे सांसद साइकिल से पहुंचे। तेल निर्यात देशों के संगठन ओपेक (Organization of the Petroleum Exporting Countries) ने दुनिया भर में तेल आपूर्ति में कटौती कर दी थी जिसके बाद पेट्रोल के कम इस्तेमाल को बढ़ावा देने इंदिरा गांधी बग्घी से आना जाना करती थी। अटल जी बग्घी को राजशाही का प्रतीक बताते हुए विरोध में बैलगाड़ी से पहुंचे थे।
अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को हुआ था। आज उनकी 7वीं पुण्यतिथि है। आइए इस मौके पर जानते हैं अटलजी से जुड़े कुछ अनसुने किस्से...
एमपी के ग्वालियर में हुआ जन्म
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति का वो नाम जिसे सदियां याद रखेगी। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व ने ना सिर्फ एमपी की जनता को प्रभावित किया बल्कि वे भारत के वो रत्न हैं जिनसे प्रेरणा लेकर कई राजनेताओं ने अपने राजनीतिक करियर को संवारा है। चाहे वो किसी भी पॉलिटिकल पार्टी से नाता रखे, लेकिन अटल जी को एक आदर्श रूप में अपने दिल में रखता है।
लखनऊ के साथ विदिशा से लड़ा लोकसभा चुनाव
वैसे तो लखनऊ अटल जी का लोकसभा क्षेत्र रहा लेकिन 1991 में एमपी के विदिशा से अटल जी ने चुनाव लड़ा, जीते और बाद में इस्तीफा भी दे दिया लेकिन जब प्रतिद्वंदी प्रताप भानु शर्मा से मुलाकात हुई तो बड़ी आत्मीयता से उन्हे गले लगाया और कहा कि “शर्मा जी क्षेत्र में आपका बड़ा दबदबा है, मुझे दुख है कि आप हार गए”.
शब्दों की जादूगरी कूट कूट के भरी
अटल जी शब्दों के जादूगर कहे जाते थे भाषण देने में तो माहिर थे ही लेकिन जब भी लोगों से मिलते उनपर अलग ही छाप छोड़ जाते। बीबीसी हिंदी में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक कश्मीर घाटी के लोगों के बीच इस अपनेपन से अटल जी ने बातें की कि वहां की जनता का दिल जीत लिया.. अटल जी ने कहा
“हम लोग यहां आपके दुख और दर्द को बांटने आए हैं। आपकी जो भी शिकायतें हैं, हम मिलकर उसका हल निकालेंगे। दिल्ली की केंद्र सरकार के दरवाजे आपके लिए कभी बंद नहीं होंगे। हमारे दिलों के दरवाजे आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे”
18 अप्रैल 2003 को श्रीनगर पहुंचे अटल जी को सुनकर लोगों को लगा कि पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने उनके दुखों को समझा।
पत्रकार किंगशुक नाग ने अपनी किताब ‘अटल बिहारी वाजपेयी – ए मैन फॉर ऑल सीजन’ में जिक्र किया है कि 1977 में अपनी विदेश मंत्री की शपथ के बाद जब अटल जी ऑफिस पहुंचे। उनके आने के पहले नेहरू की तस्वीर उनके ऑफिस से ये सोचकर हटा दी गई कि शायद अटल जी नाराज होंगे। इसके उलट तस्वीर ना दिखने पर तुरंत उन्होंने नेहरू की फोटो दोबारा लगवाई।
नेहरू भी अटल जी में देश का भावी प्रधानमंत्री देखते थे, 1957 में जब नेहरू प्रधानमंत्री थे, तब भारत आए विदेशी डेलीगेट्स से जब अटल जी की मुलाकात हुई तो नेहरू ने ये कह कर मिलवाया कि ये देश के भावी प्रधानमंत्री हैं।
वाजपेयी की भाषण कला के मुरीद थे लोग
अटल जी की भाषण कला का हर कोई कायल है, उनके भाषण को सुनकर जनता मंत्रमुग्ध हो जाती. लेकिन क्या आप जानते है अटल जी ने अपने जीवन का पहला भाषण उज्जैन जिले के बड़नगर में दिया था।
बात 1934 में एंग्लो वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल की है, पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी स्कूल में प्राचार्य थे, अटल का एडमिशन भी स्कूल में कराया गया। 10 साल के अटल के भाषण में जादू था और लोग बस सुनते रह गए। बड़नगर में एक साल पढ़ने के बाद अटल जी आगे की पढ़ाई के लिए ग्वालियर चले गए।
कहा जाता है कि भाषण कला में निपुण अटल असल में एक अंतर्मुखी और शर्मीले व्यक्ति थे। लोगों को हमेशा ध्यान से सुनते थे।
'कविता घुट्टी में घुली मिली'
कवि हृदय अटल जी बचपन से परिवार में साहित्य प्रेमी माहौल में रहने से नन्हे अटल का रूझान खुद ब खुद कविताओं की ओर बढ़ता गया। अटल जी खुद कहा करते थे कि कविता उन्हें घुट्टी में ही घुली मिली। बचपन में वे पिता के साथ आर्य समाज के वार्षिकोत्सव में जाते थे जहां विद्वानों के सस्वर भजन और तुकबंदी उन्हे काफी अच्छी लगती थी। फिर उन्होंने खुद तुकबंदी करना शुरू किया और जीवन की पहली कविता ताजमहल लिखी-
यह ताजमहल, यह ताजमहल
यमुना की रोती धार विकल
कल कल, चल चल
जब रोया हिंदुस्तान सकल
तब बन पाया ताज महल
यह ताजमहल, यह ताजमहल
इस कविता में अटल जी ने ताजमहल की सुंदरता या किसी प्रेम कहानी नहीं बल्कि इसका निर्माण करने वाले मजदूरों की दास्तां लिखी।
इसके अलावा ‘मौत से ठन गई’ अटल जी की बेहद प्रसिद्ध कविता है-
क्या हार में क्या जीत में, किंचीत नहीं भयभीत मैं
कर्तव्य पथ पर जो मिला यह भी सही, वो भी सही
वरदान नहीं मांगुगा, हो कुछ पर हार नहीं मानुंगा

प्रेम के किस्से तो है पर चर्चे नहीं
ग्वालियर के एक ही कॉलेज में पढ़ने वाले युवा अटल बिहारी और राजकुमारी कौल की प्रेम कथा के किस्से तो हैं पर चर्चे बेहद कम। अटल जी ने इस कहानी को कभी छुपाया नहीं लेकिन कभी बताया भी नहीं। कॉलेज के दिनों में अटल जी ने राजकुमारी के लिए लाइब्रेरी की एक किताब में लव लेटर रख दिया, जिसका जवाब राजकुमारी ने दिया लेकिन कभी अटल जी तक पहुंचा नहीं।
दोनों ने एक दूसरे की भावनाओं को समझा, बाद में राजकुमारी कौल के सरकारी अधिकारी पिता ने राजकुमारी की शादी कॉलेज में प्रोफेसर बृज नारायण कौल से कर दी।
राजकुमारी दिल्ली चली गई। जब अटल जी सांसद बने तो उनका दिल्ली जाना हुआ, राजकुमारी कौल से उनकी फिर मुलाकात हुई। बृज नारायण कौल से भी अटल जी के अच्छे संबंध थे और वे कई बार परिवार सहित अटल जी से मिलने आया करती थी।
वाजपेयी जी ने उनकी बेटी नमिता को गोद भी लिया। ये वो प्रेमकहानी थी जिसका मालूम को सभी को था। लेकिन किसी ने इसकी खिलाफत में आवाज नहीं की। या यूं समझे कि राजकुमारी ने ना अपने पति को तलाक दिया ना अटल जी से शादी की। ये तिकड़ी साथ रहने लगी।
अटल जो अमर हो गए लोगों के दिलों में -
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अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 1924 में 25 दिसंबर को ग्वालियर के एक शिक्षक के परिवार में हुआ।
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सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण मिला। 1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद चुना गया, 2015 में भारत रत्न मिला।
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पत्रकार के तौर पर करियर की शुरुआत की, 1951 में जनसंघ से जुड़े और पत्रकारिता छोड़ दी।
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1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया।
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13 अक्टूबर 1999 में दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, 1996 में बहुत कम समय के लिए पहली बार पीएम बने थे।
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अलग अलग 4 राज्यों (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, दिल्ली) से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे, ऐसे वे पहले व्यक्ति हैं।
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राजनीतिक करियर में 9 बार लोकसभा और 2 बार राज्य सभा के लिए चुने गए, ये भी अपने आप में माइल स्टोन है।
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फरवरी 1999 में बजट पेश करने का समय ब्रिटिश टाइमिंग से बदलकर 11 बजे किया गया। तब अटल जी प्रधानमंत्री थे।
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पोखरण परमाणु परीक्षण, आर्थिक नीतियों में दूरदर्शिता, राष्ट्रीय राजमार्ग, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

