अरावली पहाड़ियों पर 30 नवंबर तक रिपोर्ट देनी होगी: पैनल ने फरवरी तक का वक्त मांगा; CJI बोले- मेरे रिटायरमेंट तक का टाइम मांग लिया, जरूरत पड़े तो दिन-रात काम करो
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केन्द्र सरकार द्वारा लाई गई अरावली की नई परिभाषा के हिसाब से पर्वतमाला का 90 फीसदी हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है। ऐसे में वहां माइनिंग और अवैध कंस्ट्रक्शन के बढ़ने की आशंका है। (फोटो सोर्स: ANI)
नेशनल डेस्क। अरावली की पहाड़ियों की सही सीमा और पहचान तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर) को बड़ा आदेश दिया। कोर्ट ने अरावली पर बनी हाई पावर कमेटी (HPC) को रिपोर्ट देने के लिए 30 नवंबर तक का वक्त दिया है। कमेटी ने फरवरी 2027 तक का समय मांगा था, लेकिन कोर्ट ने इसे मंजूर नहीं किया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ कहा कि अब इसके बाद कोई और वक्त नहीं दिया जाएगा। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
‘मेरे रिटायरमेंट तक का वक्त मांग लिया’
सुनवाई के दौरान कमेटी की ओर से फरवरी 2027 तक का टाइम मांगे जाने पर CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि ऐसा लग रहा है जैसे कमेटी ने उनकी रिटायरमेंट तक का वक्त मांग लिया हो। CJI सूर्यकांत 9 फरवरी 2027 को रिटायर होने वाले हैं।
कोर्ट ने कमेटी से कहा कि अगर जरूरत पड़े तो दिन-रात काम करके रिपोर्ट तैयार करें। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि तय समय में काम नहीं हुआ तो कमेटी को दोबारा गठित किया जा सकता है।
कमेटी ने क्यों मांगा था 6 महीने का और वक्त?
कमेटी ने कोर्ट को बताया कि अरावली से जुड़े सभी पक्षों की बात सुनने में वक्त लग रहा है। खास तौर पर राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों समेत उन लोगों को भी सुनना है, जिनकी जमीन, रोजगार या रोजमर्रा की जिंदगी अरावली से जुड़ी है।
केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि कमेटी ने एक अंतरिम रिपोर्ट तैयार कर ली है, लेकिन प्रभावित पक्षों को ठीक से सुनने के लिए और वक्त चाहिए।
हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि कमेटी को अंतिम रिपोर्ट देनी होगी। जरूरत पड़ने पर किसी खास मुद्दे पर अलग से अंतरिम रिपोर्ट दी जा सकती है, ताकि जरूरी मामलों पर कोर्ट तुरंत फैसला ले सके।

आखिर अरावली की परिभाषा पर इतना विवाद क्यों?
बीते एक दशक से ज्यादा वक्त से फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) अरावली की पहचान के लिए 3-डिग्री ढलान का मानक इस्तेमाल करता रहा है। 2024 में बनी टेक्निकल कमेटी ने इसे बदलकर 4.57 डिग्री ढलान कर दिया। ऊंचाई की सीमा भी 30 मीटर कर दी गई। यह 30 मीटर समुद्र तल से नहीं बल्कि आसपास के ग्राउंड लेवल से थी। इससे अरावली पर्वतमाला का कुछ हिस्सा पहचान से बाहर हो गया हालांकि फिर भी करीब 40% हिस्सा कवर हो रहा था।
लेकिन पिछले साल जब केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अरावली की नई परिभाषा दी तो इसमें ऊंचाई की सीमा 100 मीटर कर दी गई। यानी वह भू-भाग, जो अपने आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है, उसे अरावली पहाड़ी माना जाएगा। ढलान (4.57 डिग्री) और आसपास के इलाकों से ऊंचाई (100 मीटर) के नए बेंचमार्क से वास्तविक अरावली हिल्स का 90% हिस्सा पहचान से बाहर होने की आशंका है।
इसके बाद सवाल उठे कि अगर सिर्फ ऊंचाई को आधार बनाया गया तो अरावली का बड़ा हिस्सा इस सुरक्षा दायरे से बाहर हो सकता है। इससे वहां माइनिंग और दूसरे कंस्ट्रक्शन का रास्ता खुल जाएगा। इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाकर इस मामले पर पूरी रिपोर्ट मांगी थी।
मई में बनी थी 5 सदस्यों वाली कमेटी
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में पांच सदस्यों वाली हाई पावर कमेटी बनाई। इसका काम अरावली की एक समान परिभाषा तय करना, उसकी सीमा तय करना और माइनिंग से जुड़े पर्यावरणीय असर की जांच करना है। कमेटी में जंगल, भू-विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े एक्सपर्ट शामिल हैं। कोर्ट ने इसे पहले 31 अगस्त 2026 तक रिपोर्ट देने को कहा था।
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