क्या शुरू हो गया अमेरिका का बायकॉट: कनाडा के बाद अब ब्रिटिश PM का चीन दौरा, इंडिया-EU ट्रेड डील; ट्रम्प की नीतियों से अलग-थलग पड़ रहा अमेरिका
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कनाडाई PM मार्क कार्नी दो हफ्ते पहले चीन दौरे पर गए। ब्रिटिश PM कीर स्टार्मर इस हफ्ते बीजिंग विजिट पर हैं। इधर नई दिल्ली में भारत और EU के बीच ट्रेड डील हुई है। EU कमिशन की प्रमुख उर्सुला वान डेर लेयन भारत के गणतंत्र दिवस पर बतौर चीफ गेस्ट भी आमंत्रित थीं। (फोटो सोर्स: रॉयटर्स)
इंटरनेशनल डेस्क। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर इस हफ्ते चीन दौरे पर रहेंगे। 8 साल में यह पहली बार होगा जब कोई ब्रिटिश टॉप लीडर चीन पहुंचा है। यह विजिट ऐसे वक्त में हो रही है, जब अमेरिका और ब्रिटेन के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। ग्रीनलैंड और NATO पर हुई बयानबाजी को लेकर दोनों देशों में तनाव है।
दिलचस्प बात यह भी है कि चीन को अमेरिका अपना मुख्य प्रतिद्वंदी मानता है। वह चीन की नीतियों की सार्वजनिक तौर पर आलोचना करता रहा है। दक्षिण चीन सागर से लेकर कई वैश्विक मुद्दों में अमेरिका और चीन आमने-सामने रहे हैं। ब्रिटेन भी अब तक हमेशा से चीन के विरोध में अमेरिका का साथ देता आया है लेकिन अब अचानक स्टार्मर की यह विजिट चौंकाने वाली है।
कीर स्टार्मर की यह विजिट तीन दिन की होगी। उनके साथ ब्रिटेन के 50 से ज्यादा बिजनेस एग्जीक्यूटिव और कल्चरल लीडर भी हैं। पहले स्टार्मर का यह काफिला बीजिंग पहुंचेगा। इसके बाद शंघाई की ओर रुख करेगा। इस दौरे में ब्रिटेन और चीन के बीच कई व्यापारिक समझौते होने की उम्मीद है।
अचानक यह दौरा क्यों?
संभव है कि ट्रम्प की टैरिफ धमकियों और उनके रवैये के चलते अचानक इस दौरे का प्लान बना हो। दरअसल, दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रम्प ने दुनियाभर के देशों के खिलाफ टैरिफ वॉर चलाया। उन्होंने अपने सहयोगी देशों को भी नहीं छोड़ा। इसमें ब्रिटेन भी शामिल रहा। हालांकि 8 मई को ट्रम्प की शर्तों को मानने के साथ दोनों देशों के बीच ट्रेड डील हो गई। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
जब ट्रम्प ने ग्रीनलैंड के अमेरिका में विलय की बात कही तो पूरे यूरोप ने इसका विरोध किया। इसमें ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश सबसे आगे खड़े नजर आए। यही कारण भी रहा कि जिन भी देशों ने ग्रीनलैंड पर अमेरिका के खिलाफ बयान दिए, ट्रम्प ने उन पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी दे डाली।
ट्रम्प ने NATO के योगदान पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने यहां तक कहा कि अफगान और ईराक वॉर से NATO सैनिक दूर रहे। जबकि सच यह है कि इन दोनों जंग में यूरोपीय देशों से कई सैनिकों ने जान गंवाई। अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा जवान ब्रिटेन ने ही खोए। कीर स्टार्मर ने ट्रम्प को इस बयान पर माफी मांगने तक की बात कह दी थी।
कुल मिलाकर ट्रम्प के रवैये के चलते ब्रिटेन के साथ अमेरिका के मजबूत रिश्ते चंद दिनों में ही बेपटरी हो गए। एक आवाज जो ब्रिटेन समेत पूरे यूरोप से उठ रही है, वह अमेरिका से निर्भरता कम करने की है। यूरोपीय देश डिफेंस से लेकर इकोनॉमी तक में अमेरिका पर से निर्भरता खत्म करने की कोशिश में लग गए हैं। यह एक कारण हो सकता है कि स्टार्मर अचानक चीन पहुंचे हैं।
दो हफ्ते पहले कनाडा PM का चीन दौरा
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी 14 से 17 जनवरी तक चीन विजिट पर रहे। किसी कनाडाई PM का 8 साल में यह पहला चीन दौरा था। इस दौरे में एनर्जी, एग्रीकल्चर फूड और इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पर टैरिफ से जुड़े कई एग्रीमेंट हुए। कार्नी का यह दौरा ट्रम्प की नीतियों के पलटवार के तौर पर देखा गया।
दरअसल, ट्रम्प लगातार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बताते रहे हैं। कनाडा उन तीन देशों में शामिल था, जिस पर ट्रम्प ने सबसे पहले टैरिफ बढ़ाया था। ग्रीनलैंड के मुद्दे पर जब कनाडा ने अमेरिका का विरोध किया तो ट्रम्प ने इस देश को फिर से टैरिफ धमकी दी। इसी के ठीक बाद कार्नी चीन पहुंच गए।
हाल ही में दावोस में संपन्न हुई वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में जब कार्नी ने ट्रम्प की दबाव डालने वाली नीति की आलोचना की तो ट्रम्प ने यह तक कहा कि कार्नी को माफी मांगना चाहिए क्योंकि कनाडा अब तक अमेरिकी की वजह से ही जी रहा है।
EU चीफ का भारत दौरा और ट्रेड डील
दुनियाभर के तमाम देशों के साथ ट्रम्प लगातार EU को भी टैरिफ पर धमकाते रहे। EU में फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे 27 यूरोपीय देश हैं। EU ने भी ट्रम्प की कई शर्तों के आगे झुकते हुए 27 जुलाई को ट्रेड डील पर हस्ताक्षर कर दिए।
लेकिन परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े कई मामलों में ट्रम्प ने EU को नजरअंदाज करते हुए फैसले लिए। ग्रीनलैंड के मुद्दे पर भी उन्होंने EU के देशों की दोस्ती ताक पर रख दी और ऊल-जुलूल बयान दिए। नतीजा यह हुआ कि मंगलवार (27 जनवरी) को EU ने इंडिया के साथ ट्रेड डील का ऐलान कर दिया।
यहां भी यही फैक्टर नजर आया कि EU अमेरिका के विकल्प के तौर पर बिजनेस और डिफेंस में नए साथी तलाश रहा है। दरअसल, ग्रीनलैंड विवाद के बाद EU का अमेरिका से विश्वास डगमगाया है। ऐसा इसलिए क्योंकि डेनमार्क हमेशा से अमेरिका का सहयोगी रहा। अमेरिकी हितों वाले युद्धों में भी डेनमार्क के सैनिक शहीद हुए। इन सब के बावजूद अमेरिका ने डेनमार्क के इलाके ‘ग्रीनलैंड’ पर कब्जा करने के अपने इरादे जाहिर किए। ऐसे में EU लीडर्स ने भी अमेरिका से निर्भरता खत्म करने के लिए अन्य विकल्प तलाशने शुरू कर दिए। भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर साइन होना इसी का नतीजा है।
अमेरिका का रिएक्शन क्या है?
डोनाल्ड ट्रम्प ने मार्क कार्नी के चीन दौरे से गुस्सा होकर कनाडा पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी दी। उसी तरह US के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने EU-भारत डील को गलत बताया। उन्होंने कहा कि इस डील से रूस का फायदा होगा और EU का नुकसान। बेसेंट ने यह भी कहा कि EU इस डील के जरिए खुद के खिलाफ जंग को फाइनेंस कर रहा है। यानी साफ है कि अमेरिका अपने सहयोगियों को इस तरह इधर-उधर जाते देख भड़क भी रहा है।
क्या अलग-थलग पड़ रहा अमेरिका?
ट्रम्प पिछले साल सत्ता में आए। उन्होंने दुनियाभर के देशों के खिलाफ टैरिफ वॉर छेड़ा, रूस-यूक्रेन जंग में अपने साथी देशों (EU) के उलट फैसले लिए, इंटरनेशनल कानून का उल्लंघन कर ईरान पर हमला किया, वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा किया और ग्रीनलैंड के अमेरिका में विलय की बातें कहीं।
उन्होंने कई विवादित बयान भी दिए। भारत की अर्थव्यवस्था को मृत बताया, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस में बुलाकर अपमानित किया, NATO जैसे संगठन को भी अमेरिका के लिहाज से बेकाम का बताया।
ट्रम्प के इस बर्ताव से दुनिया हैरान रही। उन्होंने सहयोगी देशों के साथ भी दुश्मनों जैसा रवैया अपनाया। यही कारण है कि सात दशकों से अमेरिका के सहयोगी रहे देश अब उससे छिटकते नजर आ रहे हैं।
8 साल बाद ब्रिटिश और कनाडा PM का चीन दौरा, फ्रांस और चीन के बीच व्यापार समझौता और भारत-EU के बीच ट्रेड डील… यह सब इसी का नतीजा है।
फिलहाल, जो भी कुछ हो रहा है। उससे यह साफ लग रहा है कि अमेरिका का बायकॉट शुरू हो गया है। अगर ट्रम्प अभी भी नहीं संभले तो अमेरिका अलग-थलग पड़ सकता है।

