कैरिबियाई देशों में 180 साल से दीपावली: गिरमिटिया मजदूरों ने रामलीला मंचन शुरू किया; जहाजी भाईचारा क्या है- यहां खास बातें
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त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों ने करीब 150 से 190 साल पहले दीपावली और रामलीला की परंपरा शुरू की। - फाइल
इंटरनेशनल डेस्क। भारत से हजारों किलोमीटर दूर त्रिनिदाद एंड टोबैगो, गुयाना और सूरीनाम में भी भारत की तरह ही दीपावली का त्योहार पूरे उल्लास से मनाया जाता है। दीपावली की रात यहां भी घरों में दीये जलते हैं, सड़कें रोशनी से जगमगाती हैं और आतिशबाजी होती है। रामलीला का मंचन किया जाता है। अगर दिवाली की रात कोई यहां पहुंचे तो ऐसा लगेगा कि यह कोई दूसरा देश नहीं बल्कि भारत ही है।
इन देशों में भारतीय मूल के लोगों के पूर्वज करीब 150 से 190 साल पहले भारत से पहुंचे थे। वे अपने साथ त्योहार, भाषा और परंपराएं भी लेकर आए थे। आखिर सात समंदर पार इन देशों में भारतीयों ने दीपावली और रामलीला की परंपरा कैसे जिंदा रखी.. आइए जानते हैं।
कैसे हुई इस सेलिब्रेशन की शुरुआत
इस कहानी की शुरुआत 19वीं सदी में हुई। गुलामी खत्म होने के बाद कैरिबियाई देशों के गन्ने के खेतों में मजदूरों की कमी हो गई। इसे पूरा करने के लिए ब्रिटिश और डच शासक भारत से लोगों को तय समय के कॉन्ट्रैक्ट पर ले जाने लगे। इन्हें गिरमिटिया मजदूर कहा गया।

इनमें ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग थे। गुयाना में पहली खेप 1838 में पहुंची। त्रिनिदाद में 30 मई 1845 को फेटल रजैक जहाज से 225 भारतीय पहुंचे। सूरीनाम में 5 जून 1873 को लल्ला रूख जहाज से 399 मजदूर पहुंचे।
जहाजी भाईचारा से बची रही परंपरा
विदेश में इन मजदूरों की जिंदगी आसान नहीं थी। उन्हें गन्ने के खेतों में लंबे समय तक काम करना पड़ता था। इसके बावजूद उन्होंने रामायण का पाठ, भजन और दीपावली जैसे त्योहारों की परंपरा नहीं छोड़ी। भारत से आए लोगों के बीच बने आपसी रिश्तों को जहाजी भाईचारा कहा गया। उनकी अगली पीढ़ियों ने भी इन परंपराओं को आगे बढ़ाया।

दीपावली से पहले रामलीला का मंचन
त्रिनिदाद एंड टोबैगो में दीपावली पर रामलीला का मंचन किया जाता है। यहां कई गांवों और कस्बों में दीपावली से पहले रामलीला होती है। प्रिंसेस टाउन के सीडर हिल इलाके में इसका मंचन करीब 10 दिनों तक चलता है। आखिरी दिन रावण का पुतला जलाया जाता है। तासा ढोल, रंग-बिरंगे कपड़े और आतिशबाजी इस आयोजन को खास बनाते हैं। 2012 में वहां की संसद ने नेशनल रामलीला काउंसिल को कानूनी मान्यता दी थी। त्रिनिदाद में दीपावली पर राष्ट्रीय छुट्टी भी होती है।

चागुआनास में लगता है दीपावली का मेला
त्रिनिदाद के चागुआनास शहर में हर साल दिवाली नगर का आयोजन होता है। इसकी शुरुआत 1986 में हुई थी। यहां कई दिनों तक मेला लगता है। भारतीय कपड़ों, गहनों, खाने-पीने की चीजों और पूजा-पाठ के सामान के स्टॉल लगते हैं। भजन और कल्चरल प्रोग्राम भी होते हैं।
गुयाना में दीपावली पर रोशनी से सजी झांकियां निकाली जाती है। रंग-बिरंगी रोशनी वाली मोटरकेड में रामलीला के किरदार शहर भर में घूमने निकलते हैं। इसकी शुरुआत 1974 में हुई थी। गुयाना हिंदू धार्मिक सभा इसका आयोजन करती है। यहां भी दीपावली नेशनल हॉलीडे है। खास बात ये है कि दीपावली सेलिब्रेशन में दूसरी कम्युनिटी के लोग भी शामिल होते हैं।

सरनामी भाषा में इंडिया के कई इलाकों की झलक
सूरीनाम में भारतीय संस्कृति की पहचान सरनामी भाषा से भी जुड़ी है। इसमें भोजपुरी, अवधी और उत्तर भारत की दूसरी बोलियों के साथ डच और स्थानीय भाषा के शब्द भी शामिल हैं। 1873 से 1916 के बीच करीब 35 हजार भारतीय मजदूर सूरीनाम पहुंचे।

इनमें से कई लोग कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद भी वहीं बस गए। उन्होंने पूजा-पाठ, संगीत और त्योहारों की परंपराएं आगे बढ़ाईं। आज त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम में दीपावली और रामलीला सिर्फ भारतीय मूल के लोगों तक सीमित नहीं हैं। इनमें अलग-अलग समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं। करीब दो सदियों पहले शुरू हुआ यह सफर आज भी इंडियन कल्चर को सात समंदर पार जिंदा रखे हुए है।

