इजराइल इलेक्शन में 61 सीटों का पूरा खेल: क्या अरब पार्टियां बनेंगी किंगमेकर; नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए इनका साथ जरूरी
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मंगलवार को एक बूथ पर वोट डालते इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू- फाइल फोटो
इंटरनेशनल डेस्क। इजराइल में आज जनरल इलेक्शन हो रहा है। इस चुनाव में खास चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि क्या बेंजामिन नेतन्याहू दोबारा सत्ता हासिल कर सकेंगे। इस बार माहौल थोड़ा जुदा-जुदा है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी का मुकाबले देश के EX-आर्मी चीफ गादी आइजेनकोट (Gadi Eisenkot) की पार्टी याशर है।
सबकी नजरें बेंजामिन नेतन्याहू और उनके विरोधियों पर हैं। लेकिन इस चुनाव का नतीजा एक ऐसे सियासी फैक्टर पर भी निर्भर कर सकता है, जिसकी चर्चा खुलकर नहीं हो रही है। यह फैक्टर है अरब पार्टियां।
इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी भी अलायंस को कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। अगर नेतन्याहू और उनके विरोधी इस आंकड़ें तक नहीं पहुंचते, तो अरब पार्टियों का सपोर्ट सरकार बनाने का पूरा गणित बदल सकता है। आइए, समझते हैं पूरा पॉलिटिकल कैलकुलेशन...

20% है अरब नागरिकों की हिस्सेदारी
इजराइल की आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 20% है। चुनाव में अरब पार्टियों को कितनी सीटें मिलती हैं, इससे सरकार बनाने का पूरा गणित बदल सकता है। हालांकि, इन पार्टियों को एक राजनीतिक गुट मानना सही नहीं होगा।

यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राम( Ra'am (United Arab List)) और दूसरी अरब पार्टियों की अपनी-अपनी डिमांड्स हैं। यह भी जरूरी नहीं कि सभी पार्टियां यहूदी लीडरशिप वाली पार्टियों के साथ एक जैसा रवैया रखें।
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कौन-कौन सी अरब पार्टियां मैदान में
इजराइल में अरब पार्टियां मुख्य रूप से दो गुटों में हैं। पहला जॉइंट लिस्ट है। इसमें हदाश, ताअल, बलाद और राम (United Arab List) शामिल हैं। चुनाव से पहले के सर्वे के मुताबिक दोनों को मिलाकर 13–16 सीटें मिल सकती हैं। जॉइंट लिस्ट को 8–9 सीटें और राम (United Arab List) को 5–6 सीटें आने का अनुमान है।

नतीजों के बाद शुरू होगा असली गेम
असली गेम नवंबर के नतीजों के बाद शुरू होगा। सब कुछ इस पर बात से तय होगा कि छोटी पार्टियां कितनी सीटें जीतती हैं और सरकार बनाने के लिए उनसे किस तरह की शर्तों पर बात होती है।अगर किसी भी गुट को 61 सीटें नहीं मिलतीं, तो छोटी पार्टियों की अहमियत बढ़ जाएगी। ये पार्टियां सरकार में शामिल हुए बिना भी उसे बाहर से समर्थन दे सकती हैं।
अरब पार्टियां मंत्री पद लिए बिना भी सरकार के पक्ष में जरूरी वोट दिला सकती हैं। नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की कोशिश कर रहे विपक्ष के लिए यह रास्ता अहम हो सकता है। अगर विपक्ष बहुमत से एक या दो सीट पीछे रह जाता है, तो उसे अरब पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
क्या नेतन्याहू विरोधियों के लिए राह आसान
अरब पार्टियों का समर्थन नेतन्याहू विरोधियों के लिए भी आसान नहीं होगा। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा जंग ने इजराइल की सियासत को बांट दिया है। सिक्योरिटी और फिलिस्तीन के मुद्दे पर पार्टियों के बीच मतभेद हैं। ऐसे में अरब पार्टियों के साथ समझौता करना विपक्षियों के लिए बड़ी चुनौती होगी।
नेतन्याहू के अलायंस में राइटविंग और रिलिजिस पार्टियां शामिल हैं। इनमें कुछ नेता फिलिस्तीनियों को रियायत देने के खिलाफ हैं। ऐसे में विपक्ष को यह भी दिखाना होगा कि वह अलग-अलग आइडियोलॉजी वाली पार्टियों को साथ लेकर भी सरकार चला सकता है।
2021 में भी अरब पार्टी के सपोर्ट से सरकार बनी थी
इजराइल में ऐसा पहले भी हो चुका है। साल 2021 में मंसूर अब्बास के की अगुवाई वाली राम पार्टी ने नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के अलायंस को सपोर्ट किया था। इस अलायंस की मदद से नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया था। इसके बाद ही पता चला की इजराइल की सियासत में अरब पार्टी कितनी अहम हैं।
हालांकि, यह सरकार डेढ़ साल ही चल पाई। इसके बाद हुए दिसंबर 2022 में हुए इलेक्शन के बाद एक बार नेतन्याहू PM चुने गए। मौजूदा समय में 7 अक्टूबर के हमले और गाजा की जंग ने अरब पार्टियों का सपोर्ट जुटना मुश्किल बना दिया है।
चुनाव के बाद क्या बदल सकता है
इस बार अरब पार्टियों का रोल कैसा होगा यह कई बातों से तय होगा। सबसे पहले यह देखना होगा कि अरब वोटर कितनी बड़ी तादाद में वोटिंग करते हैं। उनकी पार्टियों को कितनी सीटें मिलती हैं। इसके साथ ही यह भी अहम फैक्टर होगी कि नेतन्याहू के अलायंस और उनके विरोधी कितनी सीटों पर कब्जा कर पाते हैं।
अगर नेतन्याहू और उनके विरोधी दोनों ही बहुमत से दूर रहते हैं, तो ही अरब पार्टियों को सरकार बनाने का मौका मिलेगा।
भारत की नजर क्यों
इजराइल में किसकी सरकार बनती है, इस पर भारत की भी नजर है। भारत-इजराइल के रिश्तों में डिफेंस, सिक्योरिटी और टेक्नोलॉजी की अहम भूमिका है। ऐसे में चुनाव के बाद बनने वाली सरकार की पॉलिसी दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से बेहद अहम है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत हासिल कर पाएगा। 4 नवंबर को नतीजों के ऐलान के बाद ही इसे लेकर तस्वीर साफ हो सकेगी।

