18वीं BRICS समिट: मोदी- जिनपिंग की मुलाकात पर सस्पेंस खत्म; चीन ने कहा- प्रेसिडेंट इंडिया जाएंगे
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत के दौरे पर आएंगे।
इंटरनेशनल डेस्क। BRICS की 18वां समिट 12 अक्टूबर से दिल्ली में शुरु हो रही है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसमें शामिल होंगे। चीन की ओर से इसकी ऑफिशियल अनाउंसमेंट कर दी गई है। चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री ने गुरुवार को कहा- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यौते पर प्रेसिडेंट शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वीं बिक्स समिट में हिस्सा लेंगे।
बता दें कि बुधवार तक इस बात पर सस्पेंस बरकारार था कि जिनपिंग इंडिया की विजिट पर आएंगे या नहीं। एसोसिएटेड प्रेस (AP) न्यूज की रिपोर्ट ने जब चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री ने शिनपिंग के भारत आने से जुड़े सवाल पर कहा था- हमें इसकी ऑफिशियल जानकारी नहीं है। इसके बाद जिनिपंग के इंडिया आने और मोदी से मुलाकात होने को लेकर कयास लगाए जा रहे थे। हालांकि, बुधवार शाम तक चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री ने कनफर्मेशन दे दी।

सात साल बाद जिनपिंग की इंडिया विजिट
जिनपिंग आखिरी बार अक्टूबर 2019 में भारत आए थे। उस समय उन्होंने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री मोदी के साथ इनफॉर्मल समिट की थी। इसके कुछ महीने बाद गलवान क्लैश से दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ गए। जिनपिंग का सात साल बाद भारत आना रिश्ते सुधारने के लिहाज से एक बड़ा स्टेप माना जा रहा है।
भारत-चीन दोनों अमेरिका की ट्रेड पॉलिसी से प्रभावित
मौजूदा समय में दोनों देशों अमेरिका की ट्रेड पॉलिसी से प्रभावित हैं। ऐसे में BRICS उन्हें ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर साथ आने का मौका देगा। हालांकि इसे अमेरिका के खिलाफ फ्रंट मानना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों में सहमति बनती है तो एक बार फिर ट्रेड से जुड़े कई अहम फैसले हो सकते हैं।
गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्ते तल्ख
भारत और चीन के बीच 1962 में 32 दिनों तक जंग चली थी और उसके बाद 2020 में गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों और 40 से 42 चीनी सैनिकों की मौत के बाद भी दोनों देशों के रिश्ते तल्ख हुए थे। हालांकि, चीन ने गलवान क्लैश में ऑफिशियली अपने चार सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि ही की थी। अक्टूबर 2024 में डिसइंगेजमेंट एग्रीमेंट के बाद दोनों देशों ने टेंशन कम करने की शुुरआत की। भारत ने चीन से कहा है कि बॉर्डर पर शांति के बिना रिश्ते पूरी तरह नॉर्मल नहीं हो सकते।

गलवान क्लैश का असर दोनों देशों के ट्रेड पर
गलवान घाटी में हुए हमलों का असर दोनों देशों के ट्रेड पर भी पड़ा। इससे इन्वेस्टमेंट कम हुआ, वीजा प्रोसेसिंग में देरी और इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट्स पर पाबंदी जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। हालांकि, हाल के दिनों में दोनों देशों ने रिश्तों को सामान्य करने की कोशिशें तेज की हैं। करीब पांच साल के अंतराल के बाद दोनों देशों की बीच डाइरेक्ट फ्लाइट शुरू हुई। वहीं, चीन ने भी कैलाश यात्रियों के लिए वीजा इश्यू करना शुरू कर दिया है।
चीन के एक्सपर्ट बोले- चीन रिश्ते सुधारना चाहता है
Indian Express के मुताबिक, शंघाई के फूडान यूनिवर्सिटी में साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट और नई दिल्ली स्थित चाइना एम्बेसी में डिप्लोमैट लिन मिनवांग ने कहा- चीन निश्चित तौर पर रिश्ते सुधारना चाहता है, लेकिन हम इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि भारत किस हद तक इसमें सुधार करने के लिए तैयार है।

इंडियन एक्सपर्ट ने कहा- दोनों देशों में भरोसे की कमी
वहीं, दिल्ली में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन थिंक टैंक के मेंबर हर्ष पंत के मुताबिक- दोनों देशों के बीच भरोसे की बेहद कमी है। चीन फिलहाल इकोनॉमिक तौर पर ज्यादा वजन रखता है और यह एक अच्छा मौका है कि हम इसका इस्तेमाल करें और एक भरोसेमंद साझेदार के तौर पर उभरें, खास तौर पर ऐसे समय में जब दोनों देश कहीं ना कहीं अमेरिका की पॉलिसी से प्रभावित हैं।
भारत ने चीनी इन्वेस्टमेंट पर कुछ पाबंदियां हटाईं
भारत ने मार्च में चीनी इन्वेस्टमेंट पर 2020 के बाद लगाई गई कुछ पाबंदियों में राहत दी। इलेक्ट्रॉनिक्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल सेक्टर में आने वाले इन्वेस्टमेंट को 60 दिनों के भीतर प्रोसेस करने का फैसला हुआ। इसके लिए कंपनी में मेजॉरिटी हिस्सेदारी भारतीय नागरिक के पास होना जरूरी है। सरकार ने डिक्सन टेक्नोलॉजीज और चीनी स्मार्टफोन कंपनी वीवो के मैन्युफैक्चरिंग जॉइंट वेंचर को भी मंजूरी दी। हालांकि BYD और ग्रेट वॉल मोटर जैसी कंपनियां अब भी भारत में बड़े इन्वेस्टमेंट को लेकर सतर्क हैं।
BRICS में दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरत
लोवी इंस्टीट्यूट के एनालिसिस के मुताबिक, भारत को अपनी BRICS चेयरशिप सफल बनाने के लिए चीन की जरूरत है। वहीं, चीन 2027 में BRICS की चेयरशिप संभालेगा और उसे भी भारत के साथ की जरूरत होगी। दोनों देशों के बीच भरोसा कम है, लेकिन वे BRICS को कमजोर भी नहीं होने देना चाहते। नई दिल्ली समिट के जरिए ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती है। वहीं, बीजिंग BRICS के जरिए वेस्टर्न देशों के दबदबे के मुकाबले एक ऑप्शनल ग्लोबल प्लेटफॉर्म तैयार करना चाहता है।

