राहुल की PM मोदी को डिबेट की चुनौती: संविधान क्या कहता है? 1989 में वीपी सिंह को चुनौती देकर पीछे हट गए थे राजीव गांधी
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राहुल गांधी की PM को डिबेट की चुनौती
नेशनल डेस्क. विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ओपन डिबेट की चुनौती दी है। जवाब में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण समेत बीजेपी के नेता संसद में बहस करने के लिए विशेष सत्र बुलाने की बात कह रहे हैं। हालांकि, राहुल गांधी ने पिछले 3 दिन में चार बार ओपन डिबेट के लिए PM को चुनौती दे चुके हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत के संविधान में अमेरिका की तरह ओपन डिबेट का प्रावधान है। क्या चुनाव आयोग इस तरह की डिबेट करा सकता है, क्या भारत में पहले इस तरह की कोई डिबेट या राजनीतिक चुनौती दी गई, इस खबर में इन सब सवालों के जवाब जानने की कोशिश करेंगे...
राहुल ने 3 दिन में चार बार चैलेंज दिया
राहुल गांधी ओपन डिबेट चाहते हैं, जबकि सरकार की ओर से संसद में चर्चा की बात कही गई है।

क्या भारतीय संविधान में ओपन डिबेट का कोई प्रावधान है?
राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच ओपन डिबेट की मांग के मामले में सबसे अहम बात यह है कि भारत के संविधान में प्रधानमंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के बीच आमने-सामने सार्वजनिक बहस कराने का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। हालांकि संविधान में संसद के भीतर चर्चा और बहस की पूरी व्यवस्था मौजूद है।
संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 के तहत- संसद में बहस किस तरह होगी, कौन बोलेगा, प्रश्न कैसे पूछे जाएंगे और कार्यवाही कैसे चलेगी, इसके लिए संसदीय नियम हैं।
चुनाव आयोग क्या ओपन डिबेट कराने का आदेश दे सकता है?
भारत में चुनाव कराने की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग की है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को निष्पक्ष चुनाव कराने की शक्तियां दी गई हैं। लेकिन इनमें कहीं भी सार्वजनिक बहस की कोई व्यवस्था नहीं है।
क्या भारत में पहले भी ओपन डिबेट की कोशिश हुई
चाहें चीन युद्ध हो या परमाणु परीक्षण का मामला, देश में गंभीर मुद्दों पर हमेशा से संसद में चर्चा हुई है। हालांकि, राजीव गांधी और वीपी सिंह के बीच पहली बड़ी टीवी डिबेट की कोशिश हुई थी। अगस्त 1989 में तत्कालीन PM राजीव गांधी ने लोकसभा चुनाव से पहले अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी वीपी सिंह को लाइव टेलीविजन डिबेट की चुनौती दी थी।

वीपी सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। यह खबर भारत समेत दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी। अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट ने इसे इतिहास की पहली ऐसी लाइव टेलीविजन डिबेट कराने की कोशिश बताया था।
चुनौती देने के बाद पलटे राजीव गांधी
द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, राजीव गांधी बाद में यह कहते हुए पलट गए कि उन्हें यकीन नहीं है कि कांग्रेस से कौन वीपी सिंह के साथ बहस करेगा। इसे विपक्ष ने राजीव गांधी का पलटी मारना बताया और ऐलान किया कि सभी टीवी कार्यक्रमों और राजनीतिक रैलियों में राजीव गांधी की कथित कायरता दिखाने के लिए मंच पर खाली कुर्सी रखी जाएगी।
2024: राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच डिबेट का प्रस्ताव
मई 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह और वरिष्ठ पत्रकार एन राम ने दोनों नेताओं को सार्वजनिक बहस का प्रस्ताव दिया था। राहुल ने इसे स्वीकार कर लिया। हालांकि, इस पर BJP की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई और बहस नहीं हो पाई।

किन देशों में ओपन डिबेट का चलन
अमेरिका में परंपरा, लेकिन कानून नहीं
- अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच सार्वजनिक बहस की परंपरा काफी पुरानी है। हालांकि एक दिलचस्प तथ्य यह है कि वहां भी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को डिबेट में शामिल होना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।
- 26 सितंबर 1960 को जॉन एफ कैनेडी और रिचर्ड निक्सन के बीच पहली टेलीविजन डिबेट हुई। हालांकि, बाद के चार चुनावों में डिबेट नहीं हुई। इसके बाद 1976 से अमेरिकी चुनावों में डिबेट की परंपरा बन गई।
- अमेरिका के अलावा फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा में भी चुनाव से पहले सार्वजनिक डिबेट होती है। हालांकि, ये सभी परंपरा के तहत होती है। डिबेट को लेकर कोई नियम या कानून नहीं है। यानी इन देशों में उम्मीदवारों को शामिल होना अनिवार्य नहीं है।
सबसे अहम सवाल- क्या भारत में ऐसी डिबेट हो सकती है
हां, इसके लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत नहीं है। राजनीतिक दलों, नेताओं और प्रसारण संस्थानों की सहमति से इसका आयोजन किया जा सकता है। इसके लिए एक स्वतंत्र डिबेट आयोग भी बनाया जा सकता है।
भारत में ओपन डिबेट क्या संभव है?
पहला सवाल: क्या सिर्फ PM और नेता प्रतिपक्ष के बीच डिबेट होनी चाहिए?
भारत में अमेरिका जैसी राष्ट्रपति प्रणाली नहीं है। न ही टू पार्टी सिस्टम है। भारत संसदीय लोकतंत्र है, कई दल चुनाव में उतरते हैं। यहां जनता सांसद चुनती है और लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन सरकार बनाता है। इसलिए केवल प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के बीच बहस कराने पर दूसरे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधित्व का सवाल उठ सकता है।
दूसरा सवाल: प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है?
भारत में प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता नहीं करती। बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन अपने नेता का चुनाव करती है। इसके बाद राष्ट्रपति उस नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। कई बार पार्टियों और गठबंधन में पीएम उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं बन पाती, ऐसे में चुनाव नतीजों के बाद ही नेता का चुनाव किया जाता है। इसलिए भारत में चुनाव से पहले कानूनी तौर पर किसी को प्रधानमंत्री पद का आधिकारिक उम्मीदवार मानने की व्यवस्था अमेरिका जैसी नहीं है।

