महज 99 हजार वोट की बढ़त से 566 वार्ड ज्यादा जीती BJP: राजस्थान निकाय चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनी, 0.94% वोट शेयर के अंतर ने कांग्रेस को दूसरे नंबर पर धकेला; रिजल्ट के मायने
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राजस्थान के 309 शहरी निकायों के नतीजों में BJP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही, लेकिन कई बड़े शहरों में दोनों दल बहुमत से दूर रहे। निर्दलीयों ने बड़ी संख्या में वार्ड जीतकर कई निकायों में सत्ता की चाबी अपने हाथ में रख ली है।
नेशनल डेस्क। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव के नतीजे BJP के लिए राहत की खबर लेकर आए। सोमवार (14 सितंबर) को आए 309 शहरी निकायों के नतीजों में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 10,244 वार्डों में BJP ने 4179 वार्ड जीते। कांग्रेस भी ज्यादा पीछे नहीं रही। उसने 3613 वार्ड पर जीत हासिल की। यानी BJP को कांग्रेस के मुकाबले 566 वार्ड ज्यादा मिले।
यहां दिलचस्प फैक्ट यह है कि BJP और कांग्रेस के बीच इस मार्जिन का कारण महज 99,615 वोट रहे। यानी महज 99 हजार वोट ज्यादा हासिल करते हुए BJP राजस्थान के शहरों में सबसे बड़ी पार्टी बन गई। यह आंकड़ा कुल वोट शेयर के एक फीसदी से भी कम है।
राजस्थान के इस चुनाव में BJP को 35.18 फीसदी वोट (37.35 लाख) मिले, जबकि कांग्रेस के हिस्से 34.24% वोट (36.35 लाख) आए। यानी वोट शेयर का डिफरेंस 0.94% रहा। यहां निर्दलीयों के हाथ बड़ी बाजी आई। निर्दलीय उम्मीदवारों ने 27.38 प्रतिशत वोट शेयर के साथ कुल 2,273 वार्ड जीते। यानी निर्दलीयों की संख्या इतनी बड़ी है कि कई निकायों में बोर्ड बनाने के लिए उनका समर्थन जरूरी होगा।
309 निकायों में किसका कितना दबदबा?
BJP 148 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी बनी। इनमें से 85+ में उसे साफ बहुमत मिला। यानी 60 से ज्यादा निकाय में सरकार बनाने के लिए उसे निर्दलीय पार्षदों के सपोर्ट की जरूरत होगी। इसी तरह कांग्रेस 104 निकायों में सबसे ज्यादा वार्ड जीतने में सफल रही। इनमें से 45+ में उसे स्पष्ट बहुमत मिला। 10 निकायों में दोनों पार्टी को बराबर वार्ड मिले।

नगर निगमों में क्या हुआ?
जयपुर: 150 वार्ड वाले जयपुर नगर निगम में BJP ने 78 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। यानी राजधानी में पार्टी अकेले बोर्ड बनाने की स्थिति में है। यह BJP के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि जयपुर राजस्थान की सबसे बड़ी शहरी राजनीतिक जमीन है। यहां की जीत को राज्य सरकार के लिए बड़ा पॉजिटिव माना जाएगा।
जोधपुर: जोधपुर में कहानी बिल्कुल अलग रही। 100 वार्ड वाले नगर निगम में BJP और कांग्रेस दोनों ने 44-44 सीटें जीतीं, जबकि बाकी सीटें अन्य दलों और निर्दलीयों के खाते में गईं। यानी यहां किसी भी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला।
अजमेर: कांग्रेस 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि BJP को 32 सीटें मिलीं। 11 निर्दलीय पार्षद भी जीते। यहां 80 वार्ड हैं यानी कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए 4 निर्दलीय पार्षदों की जरूरत पड़ेगी।
भरतपुर: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर में BJP को सबसे बड़ा झटका लगा। 65 वार्ड वाले नगर निगम में निर्दलीयों ने 36 वार्ड, BJP ने 20 और कांग्रेस ने 7 वार्ड जीते। यानी यहां निर्दलीय सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आए।
अलवर: 65 वार्ड के इस नगर निगम में BJP को 28 और कांग्रेस को 23 वार्ड में जीत मिली। 13 निर्दलीय कैंडिडेट जीते। यहां BJP को सत्ता हासिल करने के लिए 5 निर्दलीय पार्षदों का सपोर्ट चाहिए।
पाली: BJP प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह क्षेत्र में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही। 65 वार्डों में कांग्रेस को 29, BJP को 21 और निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं। हालांकि बोर्ड बनाने के लिए कांग्रेस को 4 और पार्षद की जरूरत होगी।
उदयपुर: BJP ने यहां के 80 वार्ड में से 53 जीते यानी साफ तौर पर बहुमत हासिल किया।
बीकानेर: कांग्रेस को साफ बहुमत मिला। 80 वार्ड वाले इस निगम में कांग्रेस ने 42 में जीत दर्ज की।
भीलवाड़ा: 70 में से 45 वार्ड जीतकर BJP ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कांग्रेस यहां 10 वार्ड ही जीत पाई।
कोटा: 100 वार्ड वाले इस नगर निगम में BJP ने 55 सीट जीतकर बहुमत हासिल किया।
AAP और छोटी पार्टियों की दस्तक
इस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी राजस्थान की शहरी राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। बारां नगर परिषद में AAP ने 60 में से 31 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया। यह राजस्थान में किसी नगर परिषद में AAP के लिए पहली बड़ी कामयाबी है।
बीकानेर की नोखा नगरपालिका में CPI(M) ने दमदार प्रदर्शन किया और 45 में से 29 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
AAP को इस चुनाव में कुल 42 वार्ड में जीत मिली। CPI(M) 38 पर विजय रही। मायावती की BSP को 19 वार्ड मिले और हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) ने कुल 63 वार्ड पर जीत हासिल की।
इसका मतलब है कि जहां BJP और कांग्रेस के बीच मुकाबला कमजोर पड़ता है, वहां छोटी पार्टियों और स्थानीय नेताओं के लिए जगह बन रही है।

2019-21 के मुकाबले इस बार क्या बदला?
यह तुलना थोड़ी सावधानी से करनी होगी, क्योंकि पिछले चुनाव के बाद राजस्थान में कई नए निकाय बने, कई शहरों की सीमा बदली और वार्डों का परिसीमन हुआ। इसलिए सीधे वार्ड-टू-वार्ड तुलना करना सही नहीं होगा। फिर भी राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव साफ है।
पिछले निकाय चुनाव 2019 से 2021 के बीच अलग-अलग चरणों में हुए थे। तब कांग्रेस को BJP के मुकाबले ज्यादा वार्ड में जीत हासिल हुई थी। आधे से ज्यादा निकायों पर कांग्रेस के मेयर और अध्यक्ष चुने गए थे। हालांकि तब राज्य में सरकार भी कांग्रेस की ही थी और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे। इस बार BJP की सरकार है और ऐसे में शहरीय निकाय चुनाव में भी BJP का पलड़ा हावी रहा है।
लेकिन एक बड़ा फर्क भी है- इस बार बड़ी संख्या में निकायों में किसी एक पार्टी को साफ बहुमत नहीं मिला। इसका मतलब है कि BJP की बढ़त के बावजूद स्थानीय स्तर पर मुकाबला अभी खुला हुआ है।
2028 विधानसभा चुनाव के लिए क्या संकेत?
अगर एक लाइन में समझें तो- BJP जीती है, कांग्रेस हारी है, लेकिन राजस्थान की शहरी राजनीति BJP के लिए भी पूरी तरह आसान नहीं हुई है। BJP ने राज्यभर में सबसे ज्यादा वार्ड जीते और सबसे ज्यादा निकायों में बढ़त बनाई। बड़े शहरों में भी पार्टी का प्रदर्शन मजबूत रहा। लेकिन जोधपुर में बराबरी, अजमेर-पाली में कांग्रेस की बढ़त और भरतपुर में निर्दलीयों का दबदबा बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर BJP को अभी भी कई जगह चुनौती मिल रही है।
वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव एक चेतावनी है- सिर्फ BJP विरोधी माहौल के भरोसे वापसी नहीं होगी। उसे संगठन, स्थानीय नेतृत्व और उम्मीदवारों पर काम करना होगा।
इन नतीजों को 2028 विधानसभा चुनाव का सीधा रिजल्ट मानना सही नहीं होगा। नगर निकाय चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, वार्ड की समस्याएं, व्यक्तिगत रिश्ते और निर्दलीय उम्मीदवार विधानसभा चुनाव के मुकाबले कहीं ज्यादा असर डालते हैं। फिर भी तीन संकेत साफ हैं...
संकेत नंबर 1: BJP का शहरी किला मजबूत है
बड़े शहरों में BJP का प्रदर्शन बताता है कि 2028 के लिए कांग्रेस को शहरों में काफी मेहनत करनी होगी।
संकेत नंबर 2: कांग्रेस खत्म नहीं हुई
बीकानेर, अजमेर, पाली और जोधपुर जैसे नतीजे बताते हैं कि BJP के सामने कांग्रेस अब भी मुकाबला खड़ा कर सकती है।
संकेत नंबर 3: स्थानीय चेहरा बहुत महत्वपूर्ण है
भरतपुर और कई दूसरे निकायों में निर्दलीयों की जीत बताती है कि मतदाता सिर्फ पार्टी के नाम पर वोट नहीं कर रहा।
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