नेपाल बाढ़ में अब तक 1282 की मौत: शव नहीं मिले तो कुश के पुतले बनाकर अंतिम संस्कार; 5000 से ज्यादा लापता
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नेपाल बाढ़ में लापता लाेगों के परिवार अब डेड बाॅडी नहीं मिलने पर अपनी फैमिली के लोगों का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार है।
इंटरनेशनल डेस्क। नेपाल में विनाशकारी बाढ़ को 10 दिन हो चुके हैं। रेस्क्यू ऑपरेशन अब भी जारी है, लेकिन हजारों परिवारों के लिए अपनों के जिंदा लौटने की उम्मीद कमजोर पड़ती जा रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 26 अगस्त को आई बाढ़ में अब तक कम से कम 1,282 लोगों की मौत हो चुकी है और 5000 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं।
AP News के मुताबिक, शव नहीं मिलने के कारण कई परिवार अब अपने लापता रिश्तेदारों का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर रहे हैं। काठमांडू के पशुपति आर्यघाट पर गुरुवार को कुश घास से बनाए गए 100 से ज्यादा प्रतीकात्मक शवों का अंतिम संस्कार किया गया।

कुश से बना रहे शव, फिर चिता पर कर रहे अंतिम संस्कार
काठमांडू के पशुपति आर्यघाट पर ऐसे परिवार पहुंच रहे हैं, जिनके अपने बाढ़ में बह गए लेकिन उनकी डेड बॉडी अब तक नहीं मिली। Nepal News के मुताबिक, लापता लोगों का परिवार कुश घास से इंसान के शरीर जैसा प्रतीकात्मक पुतला तैयार करते हैं। इसके बाद उसी को शव मानकर हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार किया जा रहा है।

पशुपति डीसिज्ड रजिस्ट्रेशन ऑफिस के कर्मचारी अनीश संगत के मुताबिक, गुरुवार को ही 100 से ज्यादा ऐसे सिम्बॉलिक अंतिम संस्कार किया गया। उन्होंने कहा कि इनका अलग रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, इसलिए वास्तविक संख्या इससे ज्यादा भी हो सकती है।
माता-पिता नहीं मिले तो बेटे ने किया प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार
Nepal News के मुताबिक, नुवाकोट के बाबिन रिजल के माता-पिता नाथ रिजल और बिनीता रिजल भोटेकोशी की बाढ़ में लापता हो गए थे। कई दिन इंतजार करने के बाद भी दोनों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। इसके बाद परिवार पशुपति आर्यघाट पहुंचा। बाबिन ने कहा- मेरे माता-पिता बाढ़ में लापता हो गए। अब उनके जिंदा मिलने की सारी उम्मीद खत्म हो गई है, इसलिए हमने कुश से उनके प्रतीकात्मक शव बनाए और अंतिम संस्कार किया। कई दूसरे परिवार भी इसी स्थिति से गुजर रहे हैं। शव नहीं मिलने के कारण अपने परिजनों को आखिरी बार देखने तक का मौका नहीं मिला है।

दो भाई 9 दिन से लापता, परिवार ने किया श्राद्ध
ANI के मुताबिक, बेत्रावती के बोगटी टार गांव में भी एक परिवार ने बाढ़ में लापता दो भाइयों के लिए अंतिम संस्कार और श्राद्ध की रस्में पूरी की। केदार प्रसाद आचार्य (65) और मधुसूदन आचार्य (60) 26 अगस्त को नदी किनारे जंगल की तरफ गए थे। इसके बाद दोनों का कोई पता नहीं चला। परिवार के सदस्य विनीत आचार्य ने कहा कि नौ दिन बीतने के बावजूद न दोनों के शव मिले और न सरकार से उनके बारे में कोई जानकारी मिली। हमें एहसास हो गया कि अब वे नहीं मिलेंगे। इसलिए हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक हमने उनका अंतिम संस्कार किया।

क्या है प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार की परंपरा
जब किसी व्यक्ति की मौत मानी जा चुकी हो, लेकिन उसका शव नहीं मिल सके तो हिंदू परंपराओं में कुश जैसी पवित्र घास से उसका प्रतीकात्मक शरीर बनाकर अंतिम संस्कार करने की परंपरा रही है। नेपाल में बाढ़ के बाद कई परिवार इसी परंपरा का सहारा ले रहे हैं। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, अंतिम संस्कार की रस्म पूरी करना मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए जरूरी माना जाता है। कई दिनों तक अस्पताल, मॉर्चरी और रेस्क्यू सेंटर में अपनों को तलाशने के बाद अब वे इसी प्रकार से अंतिम संस्कार कर रहे हैं।

शवों की पहचान भी बड़ी चुनौती
एक तरफ हजारों लोग लापता हैं, दूसरी तरफ बरामद किए गए कई शवों की पहचान नहीं हो सकी है। नेपाल में मॉर्चरी पर दबाव बढ़ने के बाद अज्ञात शवों को अस्थायी रूप से दफनाया भी गया है। अधिकारियों ने पहचान के लिए शवों के DNA सैंपल और दूसरी जरूरी जानकारियां सुरक्षित रखने की व्यवस्था की है। काठमांडू के त्रिभुवन यूनिवर्सिटी टीचिंग हॉस्पिटल में लापता लोगों और अज्ञात शवों की तस्वीरों की एक वॉल ऑफ द मिसिंग भी बनाई गई है। परिवार यहां तस्वीरों और मृतकों के पास से मिली चीजों के जरिये अपने रिश्तेदारों को तलाश रहे हैं।
कुछ लापता विदेशी टूरिस्ट ने किया संपर्क
इस बीच कुछ राहत की खबर भी आई है। AP News के मुताबिक, पहले लापता बताए गए कुछ विदेशी टूरिस्ट ने कम्युनिकेशन बहाल होने के बाद अफसरों और अपने परिवारों से संपर्क किया है। नेपाल में 324 विदेशी नागरिकों को रेस्क्यू किया जा चुका है, जबकि करीब 590 विदेशी अब भी लापता बताए गए हैं। इनमें 39 देशों के नागरिक शामिल हैं। बाढ़ से कई पहाड़ी इलाकों में मोबाइल नेटवर्क नहीं हैं। सड़कें टूट जाने के कारण कुछ लोगों से कई दिनों तक संपर्क नहीं हो सका था। यही वजह है कि लापता लोगों की लिस्ट लगातार वेरिफाई और अपडेट की जा रही है।

