कश्मीर से अयोध्या और फिर चुनाव आयोग तक: कौन हैं CEC ज्ञानेश कुमार, जिनके कार्यकाल पर उठ रहे सवाल
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ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के रूप में पदभार संभाला। उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 को खत्म होगा। (फोटो सोर्स: ANI)
नेशनल डेस्क। चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यीय पैनल में पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार फैसलों को लेकर मतभेद सामने आए। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई फैसलों पर आपत्ति जताई और अपनी चिंताओं को कैबिनेट सचिव तक पहुंचाया।
इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब ज्ञानेश कुमार का नाम किसी बड़े राजनीतिक विवाद के केंद्र में आया हो। वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से लेकर जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद की व्यवस्था और अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े ट्रस्ट के गठन तक, उनके करियर में कई अहम पड़ाव रहे हैं।
केरल से शुरू हुआ सफर, कश्मीर ने बदली दिशा
ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अफसर हैं। इससे पहले उन्होंने IIT कानपुर से B.Tech और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एनवायरनमेंटल इकोनॉमिक्स का कोर्स किया।
1990 में उन्होंने केरल के पथनमथिट्टा में सब-कलेक्टर के तौर पर करियर शुरू किया। इसके बाद उन्होंने राज्य सरकार के अलग-अलग विभागों में काम किया। 2012 में वह दिल्ली स्थित केरल हाउस में रेजिडेंट कमिश्नर बने।
लेकिन उनके करियर में बड़ा बदलाव 2016 में आया। मई 2016 में उन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय के कश्मीर डिवीजन में जॉइंट सेक्रेटरी बनाया गया। उस वक्त घाटी में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की लीडरशिप में आतंकी गतिविधियां चर्चा में थीं और जम्मू-कश्मीर में PDP-BJP गठबंधन की सरकार थी।
आर्टिकल 370 हटाने की प्रोसेस से जुड़े
2019 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद ज्ञानेश कुमार को जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से जुड़े काम में लगाया गया। उन्होंने उस प्रोसेस में भूमिका निभाई, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने और आर्टिकल 370 हटाने से जुड़ा कानून तैयार किया गया।
आर्टिकल 370 हटने के बाद कश्मीर में एडमिनिस्ट्रेशन और सिक्योरिटी से जुड़े काम में भी उनकी भूमिका रही। बताते हैं कि इस दौरान उनके काम करने के तरीके ने गृह मंत्री अमित शाह का भरोसा जीता।

फिर अयोध्या में राम मंदिर से जुड़ी जिम्मेदारी
कश्मीर के बाद ज्ञानेश कुमार को एक और बेहद अहम जिम्मेदारी मिली। उन्हें राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की प्रोसेस में लगाया गया। यह ट्रस्ट अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की देखरेख के लिए बनाया गया था।
इस तरह उनके करियर के दो बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव कश्मीर में आर्टिकल 370 और अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े रहे।
2020 में लगा झटका, फिर तेजी से वापसी
2020 में ज्ञानेश कुमार को 1988 बैच के 24 IAS अधिकारियों की सेक्रेटरी पद के लिए हुई एम्पैनलमेंट (काबिल अफसरों को सिलेक्टर कर एक लिस्ट में डालना) में जगह नहीं मिली। लेकिन यह स्थिति ज्यादा देर तक नहीं रही।
फरवरी 2021 में उन्हें संसदीय कार्य मंत्रालय का सचिव बनाया गया। इसके बाद वह नए बने कोऑपरेशन मिनिस्ट्री में भी अमित शाह के साथ काम करने पहुंचे।
रिटायरमेंट के सिर्फ दो महीने में बने चुनाव आयुक्त
ज्ञानेश कुमार जनवरी 2024 में IAS से रिटायर हुए। इसके दो महीने के अंदर उन्हें चुनाव आयुक्त अपॉइंट कर दिया गया। 15 मार्च 2024 को उनकी नियुक्ति का ऐलान हुआ और अगले ही दिन चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव का शेड्यूल जारी कर दिया।
सबसे सीनियर चुनाव आयुक्त होने के कारण उनका अगला CEC बनना तय माना जा रहा था। फरवरी 2025 में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाल लिया।

CEC बनते ही बदला चुनाव आयोग का माहौल?
CEC बनने के बाद उनके शुरुआती आदेशों में से एक चुनाव आयोग के कर्मचारियों की बायोमेट्रिक अटेंडेंस को लेकर था। अधिकारियों के मुताबिक, बैठकों में बहस और गर्मागर्म चर्चा भी बढ़ी।
इसके बाद आया SIR, यानी वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन। कई राज्यों में वोटर लिस्ट की इस प्रोसेस को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि वोटरों के नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया से चुनावों में BJP को फायदा पहुंचाया जा सकता है।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया और इन दावों को गुमराह करने वाला बताया।
2024 के लोकसभा चुनाव और इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों के दौरान विपक्षी लीडर लगातार CEC के फैसलों पर सवाल खड़े करते रहे। इसमें BJP नेताओं द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों पर कार्रवाई न करना, विपक्षी पार्टियों के अकाउंट ब्लॉक करना, ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतों पर ध्यान नहीं देना, चुनाव अधिकारियों को बीजेपी के पक्ष में काम करने के दबाव जैसे आरोप शामिल रहे।
अब इंडियन एक्सप्रेस की ताजा रिपोर्ट ने उन्हें और विवादों में डाल दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनावों और इलेक्टोरल रोल से जुड़े कई ऐसे फैसले रहे जो ज्ञानेश कुमार ने बिना चुनाव आयुक्तों की सहमति के लिए। अब यह देखना दिलचस्प है कि यह नई कंट्रोवर्सी ज्ञानेश कुमार को किस ओर ले जाती है।
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