बांकीपुर-दतिया-मंजलपुर उपचुनाव: नतीजे BJP के लिए बुरी खबर, लेकिन ये विपक्ष के लिए भी अच्छी खबर नहीं
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दतिया उपचुनाव में कांग्रेस के धनश्याम सिंह, बांकीपुर में पीके और मंजलपुर में बीजेपी के सतेंद्रभाई को जीत मिली।
नेशनल डेस्क. बिहार, MP और गुजरात की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के सोमवार को नतीजे आ गए। BJP बिहार के बांकीपुर, एमपी के दतिया में हार गई। हालांकि, पार्टी को गुजरात की मंजलपुर सीट पर जीत मिली। दतिया कांग्रेस के खाते में गई, जबकि बांकीपुर से प्रशांत किशोर ने जीत हासिल की। पीके पहली बार चुनाव मैदान में उतरे थे।
बांकीपुर में BJP को सबसे बड़ा झटका
बांकीपुर में हार को BJP के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। 2008 में ये सीट बनने के बाद से यहां से BJP ने लगातार जीत हासिल की थी। कभी भी पार्टी को यहां 59% से कम वोट नहीं मिले थे। खास बात तो ये थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नबीन ने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। वे राज्यसभा सांसद चुने गए। उनके इस्तीफे की वजह से ही इस सीट पर चुनाव हुआ था।
प्रशांत किशोर ने इस सीट से इलेक्शन डेब्यू किया था। वे अपने पहले ही चुनाव में सफल रहे। पीके ने बीजेपी की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीट पर सेंध ऐसे वक्त पर लगाई, जब 9 महीने पहले ही हुए विधानसभा चुनाव में NDA ने राज्य ने 243 में से 202 सीटों के साथ प्रचंड जीत हासिल की थी। वहीं, पीके की पार्टी जनसुराज अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। बांकीपुर उपचुनाव में RJD तीसरे नंबर की पार्टी रही।
पीके को उपचुनाव में 49% वोट मिले। वहीं, बीजेपी का वोट शेयर 2025 की तुलना में 62% से घटकर 34% पर आ गया।

बांकीपुर का ट्रेंड क्या कह रहा
बांकीपुर के नतीजों से कई राजनीतिक संदेश मिलते दिख रहे हैं। इनमें से सबसे बड़ा संदेश- बिहार की सबसे सुरक्षित सीट पर बीजेपी को हार मिली। खासकर ऐसी सीट पर जहां उच्च जाति की आबादी ज्यादा है और यह राष्ट्रीय अध्यक्ष की खाली की गई सीट थी। पार्टी के लिए चिता का विषय है।
बांकीपुर में क्यों हारी बीजेपी
राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण आखिरी समय पर उम्मीदवार का बदलना भी है। बाद में बीजेपी ने बूथ स्तर के कार्यकर्ता नीरज सिन्हा को टिकट दिया। बांकीपुर की जनता को नीरज की तुलना में प्रशांत किशोर बेहतर उम्मीदवार लगे। इसके अलावा भरत तिवारी एनकाउंटर केस उच्च जातियों में और NEET प्रोटेस्ट छात्रों में नाराजगी की वजह बना।
हालांकि, राजीतिक जानकारों का मानना है कि एक उपचुनाव से ट्रेंड्स का पता नहीं चलता। लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में नतीजे फिर बदल सकते हैं।
दतिया में कांग्रेस को जीत मिली
मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस के धनश्याम सिंह को जीत मिली। उन्होंने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6 हजार से ज्यादा वोट से हराया। हालांकि, दतिया का झटका बांकीपुर जितना बड़ा नहीं है। बीजेपी 2023 में पूरे राज्य में प्रचंड लहर के बावजूद यहां से चुनाव हार गई थी। तब बीजेपी के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा को राजेंद्र भारती के सामने हार मिली थी।
दतिया कभी कांग्रेस का गढ़ नहीं रही। यहां 1990 के बाद से बीजेपी ने चार बार और कांग्रेस ने तीन बार जीत हासिल की। 1998 में समाजवादी पार्टी को ये सीट मिली थी। तब कांग्रेस नेता राजेंद्र भारती ने कांग्रेस छोड़कर सपा से चुनाव लड़ा था। राजेंद्र भारती 2023 के चुनाव में भी यहां से जीत। हालांकि, उन्हें बैंक फ्रॉड के केस में तीन साल की सजा सुनाई गई है। इसके चलते उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई। उन्हें चुनाव नतीजों से कुछ घंटे पहले कांग्रेस आलाकमान ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में सस्पेंड भी कर दिया।
गुजरात में बीजेपी को जीत मिली
गुजरात की मंजलपुर में बीजेपी को जीत मिली है। यहां से बीजेपी के सतेंद्र भाई पटेल (सतीश भाई) ने कांग्रेस के भीखाभाई पटेल को 30 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। बीजेपी को यहां 75.85% वोट मिले। 2008 में ये सीट बनने के बाद से बीजेपी को कभी भी 65.5% वोट से कम नहीं मिले।
उपचुनाव बीजेपी के लिए झटका, विपक्ष के लिए अच्छी खबर नहीं
तीन में से 2 उपचुनाव में हारना बीजेपी के लिए बुरी खबर हो सकती है। लेकिन ये विपक्ष के लिए बहुत अच्छी नहीं है। बांकीपुर में बीजेपी को हार मिली, वोट प्रतिशत भी कम हुआ। लेकिन यह राज्य में उसके कट्टर धुरविरोधी RJD की तरफ शिफ्ट नहीं हुआ। वोटर्स ने पीके को जीत दिलाई। वहीं, RJD का वोट शेयर 2025 की तुलना में 30% से घटकर 11% रह गया।
दतिया में भी खतरे की घंटी
दतिया में भले ही कांग्रेस ने बीजेपी को हरा दिया हो, लेकिन ये सीट कांग्रेस के पास ही थी। यानी कांग्रेस अपनी सीट को बचाए रखने में सफल रही। दतिया में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता चंद्रशेखर आजाद रहे। आजाद की पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव को 21 हजार से ज्यादा वोट मिले। यानी बीजेपी से नाराज वोट पूरी तरह कांग्रेस में शिफ्ट नहीं हुआ।
मतलब ये कि बीजेपी विरोधी वोट अभी भी बंटे हुए हैं और बीजेपी से नाराज सभी वोटर कांग्रेस को विकल्प के तौर पर नहीं देखना चाहते। इसके बजाय नई और छोटी पार्टियां उन्हें अपनी ओर खींचने में सफल हो रही हैं। ऐसे में विपक्ष के पास खुशी मनाने की कोई बड़ी और खास वजह नजर नहीं आती, बल्कि यह उनके लिए चिंता का विषय है।

