न दावे सही, न टिकाऊ: लिपुलेख विवाद पर नेपाल काे भारत का जवाब, कहा- हम अपनी पुरानी स्थिति में
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चीन कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए 1000 श्रद्धालुओं की व्यवस्था कर रहा है।
इंटरनेशनल डेस्क. भारत ने नेपाल की उस आपत्ति को खारिज कर दिया है, जिसमें लिपुलेख पास के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा पर सवाल उठाए थे। भारत ने कहा कि नेपाल के ये दावे न तो सही हैं और न ही किसी ऐतिहासिक तथ्य पर टिके हुए हैं।
नेपाल ने उठाया मुद्दा, भारत का दो टूक जवाब
नेपाल सरकार ने रविवार को भारत और चीन दोनों को डिप्लोमैटिक नोट भेजकर इस यात्रा के रूट पर आपत्ति जताई थी। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख उसका इलाका है। इस पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने जवाब दिया कि भारत की स्थिति पहले से साफ है और इसमें कोई बदलाव नहीं है।
भारत का डायरेक्ट मैसेज- न दावे सही, न टिकाऊ
जायसवाल ने कहा कि इस तरह के क्षेत्रीय दावे न तो जायज हैं और न ही इतिहास या सबूतों पर आधारित। उन्होंने कहा कि इस तरह एकतरफा तरीके से सीमा का दायरा बढ़ाने की कोशिशें बिल्कुल स्वीकार नहीं की जाएंगी। लिपुलेख पास से कैलाश मानसरोवर यात्रा कोई नई बात नहीं है। यह रास्ता 1954 से लगातार इस्तेमाल होता आ रहा है।
फिर भी बातचीत के लिए तैयार भारत
हालांकि तेवर सख्त रखने के बावजूद भारत ने यह भी कहा कि वह नेपाल के साथ बातचीत के लिए तैयार है। सीमा विवाद समेत बाकी मुद्दों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाने की बात दोहराई गई है।
जून से अगस्त तक होगी यात्रा, दो रूट तय
इस साल कैलाश मानसरोवर यात्रा जून से अगस्त के बीच होगी। कुल 20 बैच भेजे जाएंगे, जिनमें से 10 बैच लिपुलेख पास और 10 बैच नाथु ला के रास्ते जाएंगे। हर बैच में करीब 50 यात्री होंगे।
नेपाल ने सुगौली संधि का हवाला दिया
नेपाल का दावा है कि 1816 की सुगौली संधि के मुताबिक लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी उसके हिस्से हैं। काठमांडू ने भारत से इस इलाके में सभी एक्टिविटी, जैसे सड़क, ट्रेड और यात्रा रोकने की मांग की थी।

