रात 2.30 बजे दोस्त को मैसेज: उसने 4 बजे देखा; तब तक वो तन्हा दर्द से तड़पते रहे- यहां आखिरी पलों की पूरी कहानी
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नाना पाटेकर थिएटर को फिल्मों से ज्यादा पसंद करते थे। वो कहते थे- मैं तो एक्टर हूं, हीरो नहीं हूं।
बॉलीवुड/नेशनल डेस्क. ‘किसान का बेटा हूं। मुंबई काम करने आता हूं- सुकून तो गांव में ही मिलता है….एक टीवी इंटरव्यू में यही शब्द कहे थे।
विश्ननाथ गजानन पाटेकर…..यही पूरा नाम था…इस हरदिल अजीज एक्टर का। वो चॉकलेटी हीरो नहीं, डायनेमिक एक्टर थे। जैसी कड़क पर्सनैलिटी, वैसी ही कड़क आवाज और वही खांटी देसी अंदाज।
कभी-कभी तो लगता ही नहीं था कि वो एक्टिंग कर रहे हैं या हकीकतन जिंदगी की बातें कर रहे हैं…लेकिन नाना नहीं रहे।
‘राज एक्सप्रेस’ की इस इनसाइड स्टोरी में बात नाना के उन आखिरी 90 मिनट की। रात 2.30 बजे से 4 बजे तक….क्या-क्या हुआ, कैसे हुआ और बस…नाना चले गए। ये इनसाइड स्टोरी हमने नाना की जान बचाने की कोशिश करने वाले मणिपाल हॉस्पिटल के डॉक्टर शेखर साल्कर के बयान के आधार पर तैयार की है……




