ज्ञानेश कुमार के पीछे क्यों पड़ गया पूरा विपक्ष: देश में पहली बार CEC के खिलाफ इतना बड़ा प्रोटेस्ट, 20 महीने के कार्यकाल में ऐसा क्या हो गया; पूरी कहानी
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ज्ञानेश कुमार 19 फरवरी 2025 को देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उनका कार्यकाल फरवरी 2029 में खत्म होगा। (फोटो सोर्स: ANI)
नेशनल डेस्क। चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए आज पूरा विपक्ष लामबंद है। बीते दो हफ्तों से लगातार दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में प्रोटेस्ट हो रहे हैं। न केवल विपक्ष बल्कि आम लोग भी इस मुहिम में शामिल हैं। एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट सामने आने के बाद से यह सब शुरू हुआ है।
हालांकि, हालिया कंट्रोवर्सी के पहले भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चुनाव में गड़बड़ी करने के आरोप लगते रहे हैं। इसी साल मार्च में उन्हें हटाने के लिए विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव भी लाया था। वह ऐसे पहले CEC हैं, जिनके खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया। यानी देश में पहली बार CEC के खिलाफ प्रोटेस्ट इस लेवल पर पहुंचा है।
आखिर, ज्ञानेश कुमार का इतना विरोध क्यों है, क्या वाकई कुछ गड़बड़ है या वह महज राजनीति का शिकार हो रहे हैं? कुछ फैक्ट्स और अवेलेबल इन्फोर्मेशन से इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करते हैं...
सबसे पहले ज्ञानेश कुमार का बतौर CEC रिकॉर्ड
ज्ञानेश कुमार 19 फरवरी 2025 को देश के 26वें चीफ इलेक्शन कमिश्नर बने। उनके 20 महीने के अब तक के कार्यकाल में देश में 6 विधानसभा चुनाव हुए। इनमें 4 में BJP की जीत हुई। बिहार, असम और पश्चिम बंगाल में BJP के मुख्यमंत्री बने। वहीं केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में BJP के सहयोगी दल से CM चुना गया।
महज उन दो राज्यों (केरल और तमिलनाडु) में कांग्रेस या उसके सहयोगी की सरकार बनी, जहां आजादी के बाद 7 दशक में भी BJP का कोई खास वजूद नहीं रहा। केरल में कांग्रेस की सरकार बनी और तमिलनाडु में एक्टर विजय की TVK को सफलता मिली।
चुनाव नतीजे और SIR कनेक्शन
इन चुनावों में सबसे ज्यादा चौंकाने वाले नतीजे पश्चिम बंगाल के रहे। 2024 लोकसभा चुनाव में राज्य की 42 सीटों में से 29 सीट TMC के खाते में गई थी, लेकिन महज 2 साल बाद पाला ऐसा पलटा कि 294 सीटों में TMC महज 80 सीटें ला पाई। BJP ने रिकॉर्ड 207 सीटें हासिल कर पहली बार राज्य में सरकार बनाई। TMC ने अपनी इस हार का ठीकरा SIR पर फोड़ा। यहां 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 3 सीटों से 77 तक का सफर तय किया था और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी।
दरअसल, पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक था, जहां सबसे पहले वोटर लिस्ट में छंटनी शुरू हुई। यहां कुल 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से कांटे गए थे। TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी पूरे SIR प्रोसेस के दौरान विरोध प्रदर्शन करती रहीं। उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट जाकर अपना पक्ष रखा लेकिन कामयाब नहीं हुईं। आखिरी में SIR के बाद तैयार हुई वोटर लिस्ट के साथ ही चुनाव हुए और ममता पूरे 15 साल बाद सत्ता से बाहर हो गईं।
इसी तरह बिहार और असम में भी चुनाव से पहले SIR हुआ। बिहार में करीब 50 लाख और असम में 10 लाख से ज्यादा नाम डिलीट हुए। विपक्षी पार्टियों ने इन राज्यों में भी अपनी हार के लिए SIR को ही दोष दिया। तीनों राज्यों में इसके साथ ही इलेक्शन कैंपेन, वोटिंग और काउंटिंग के दौरान चुनाव अधिकारियों पर पक्षपात के भी आरोप लगे और सैकड़ों शिकायतें दर्ज हुईं।

अब ज्ञानेश कुमार की चुनाव आयोग में एंट्री से समझते हैं एक और कहानी
चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार की एंट्री ही बड़ी दिलचस्प थी। 8 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अचानक इस्तीफा दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लोकसभा चुनाव से जुड़े कुछ मुद्दों पर अरुण गोयल और तत्कालीन CEC राजीव कुमार के बीच मतभेद थे। बता दें कि राजीव कुमार पर भी विपक्ष के आरोप लगते रहे थे।
चुनाव आयोग में पहले से एक चुनाव आयुक्त का पद खाली था। यह पद एक साल से ज्यादा वक्त से खाली था। ऐसे में लोकसभा चुनाव के ठीक पहले अचानक दो पद खाली होने के बाद केन्द्र सरकार ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू का नाम आगे बढ़ाया। यहीं से विवाद शुरू हुआ।
दरअसल, मोदी सरकार ये नियुक्ति 2023 में पास हुए नए कानून के जरिए कर रही थी। विपक्ष इसके विरोध में था। विपक्ष का कहना था कि नए कानून पर अभी सुप्रीम कोर्ट में केस पेंडिंग है, ऐसे में इसके जरिए नई नियुक्ति अवैध है। नियुक्ति को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से याचिका भी लगी लेकिन हुआ कुछ नहीं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने 15 मार्च 2024 को पद संभाल लिया। इसके अगले दिन ही लोकसभा चुनाव का ऐलान हो गया।
नए कानून के विरोध में क्यों था विपक्ष?
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नियम को लेकर 2023 में बड़ा बदलाव हुआ। दिसंबर 2023 में संसद ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बिल पारित किया। इस कानून में नियुक्ति की कमेटी से CJI को हटाकर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। इससे पहले तक सीधे केंद्र सरकार की सिफारिश पर नियुक्ति होती थी।
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने नया कानून बनने तक फैसला दिया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होगी।
नए कानून के तहत कमेटी में अब तीन सदस्य थे: प्रधानमंत्री मोदी, PM की ओर से नामित एक यूनियन कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता। इसी कमेटी की सिफारिश पर राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्त या मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करनी थी।
तो विवाद क्यों? नई व्यवस्था में प्रधानमंत्री और उनकी ओर से नामित मंत्री, दोनों केंद्र सरकार का हिस्सा थे। यानी कमेटी में सरकार के दो सदस्य और विपक्ष का एक सदस्य हो गया। ऐसे में सरकार जिसे चाहे चुनाव आयुक्त अपॉइंट कर सकती थी। विपक्ष का कहना था कि इस कमिटी में कैबिनेट मिनिस्टर की जगह फिर से CJI को रखा जाए ताकि बैलेंस बना रहे।
हालांकि ऐसा नहीं हो सका और सरकार ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त अपॉइंट कर दिया। तभी से नियुक्ति का यही सिस्टम चलता आ रहा है। CEC राजीव कुमार के रिटायरमेंट के बाद जब ज्ञानेश कुमार CEC बने तो खाली हुई चुनाव आयुक्त की सीट पर विवेक जोशी की नियुक्ति भी इसी नए कानून के तहत हुई।

SIR अभी शुरू हुआ, नियुक्ति का कानून भी ताजा लेकिन विपक्ष तो 12 साल से चुनाव हार रहा?
यही सबसे बड़ा सवाल है। वोटर लिस्ट से फर्जी और अयोग्य नाम हटाने का यह अभियान 2025 से शुरू हुआ। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रोसेस में बदलाव भी 2023 से आया। लेकिन इससे पहले बीते 10 साल में केन्द्र के साथ-साथ ज्यादातर राज्यों में BJP की सरकार बनती रही है। विपक्षी लीडरों से भी यह सवाल पूछे जाते रहे हैं। इसके जवाब में यह कहा जाता रहा है कि चुनाव आयोग आज से नहीं बल्कि पूरे दशक से मोदी सरकार के कंट्रोल में काम कर रहा है। दरअसल, पिछले 7-8 सालों में हमने लगातार विपक्ष की शिकायतें सुनी हैं। इनकी लिस्ट कुछ ऐसी है...
- BJP सरकार EVM में सेटिंग से बैक टू बैक जीत दर्ज कर रही है
- हर विकसित देश में बैलेट पेपर से चुनाव होता है लेकिन भारत में EVM मोदी सरकार को जिताने के लिए इस्तेमाल हो रही है
- EVM में गड़बड़ी रोकने के लिए VVPAT मशीनें हैं, काउंटिंग के दौरान VVPAT की सभी पर्चियों का मिलान क्यों नहीं किया जाता
- चुनाव अधिकारी एकतरफा कार्रवाई करते हैं। BJP द्वारा आचार संहिता उल्लंघन पर एक्शन नहीं होता, विपक्ष को बिना गलती के कार्रवाई झेलनी पड़ती है
- राज्यों की BJP सरकारें चुनाव के ठीक पहले महिलाओं के खाते में पैसे डालने वाली योजना लाती है, जो एक तरह से वोट खरीदने का सिस्टम बन गया है
- BJP चुनावों के दौरान दंगा भड़काने जैसे बयान देती हैं, जिन पर एक्शन लिया जाना चाहिए लेकिन नहीं लिया जाता
- लोकसभा चुनाव 2024 के पहले कांग्रेस के सारे खाते फ्रीज कर दिए गए, बंगाल में इसी तरह TMC की फंडिंग रोकी गई
- लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के कई मुस्लिम बहुल इलाके के पोलिंग बूथ पर से लोगों को भगाया गया

यानी SIR के विरोध के बहाने अब विपक्ष अपनी सारी शिकायतों का समाधान चाहता है?
हां, यह कह सकते हैं। विपक्ष फिलहाल तीन बड़ी मांगों के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहा है। इसमें SIR रद्द करना, CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफा की मांग और चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने वाली कमिटी में बदलाव। यह तीन डिमांड अगर पूरी होती है तो विपक्ष को काफी हद तक राहत मिलेगी। SIR रद्द होती है तो विपक्ष इसे अपनी जीत की तरह पेश करेगा। ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा होता है तो चुनाव आयोग पर दबाव बनेगा कि अगले चुनाव में विपक्ष की शिकायतों पर भी ध्यान दिया जाए और चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की प्रोसेस में बदलाव से ऐसे अफसर अपॉइंट हो सकेंगे, जिस पर विपक्ष को भी एतराज न हो।
कुल मिलाकर, SIR और CEC के विरोध से विपक्ष यह बताना चाहता है कि जिस मुद्दे पर बीते कई सालों से आपत्तियां उठाई जा रही हैं, वो सभी आपत्तियां सही हैं और चुनाव आयोग मोदी सरकार के कंट्रोल में काम कर रहा है। विपक्ष अगर यह मैसेज आगे बढ़ाने में सफल होता है तो यह अगले चुनावों में उसे कुछ हद तक BJP का सामना करने में मदद दे सकता है।
अभी नई कंट्रोवर्सी कैसे आई?
चुनाव आयोग को लेकर पिछले महीने इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट आई। इसमें खुलासा हुआ कि SIR और वोटर लिस्ट को लेकर चुनाव आयुक्तों में मतभेद हैं। चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने चुनाव आयोग के हालिया फैसलों को लेकर बीते 10 महीने में 14 बार CEC को लिखित शिकायत की।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने वोटर जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव, वोटर डेटा के मैनेजमेंट और SIR से जुड़े फैसलों पर आपत्ति दर्ज की थी। चुनाव आयोग का कहना है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मुद्दों पर सवाल और सुझाव जरूर दिए थे, लेकिन इन्हें अंतिम फैसलों से असहमति नहीं माना जा सकता।
हालांकि विपक्ष ने इस रिपोर्ट में हुए खुलासों को अपने अब तक के चुनाव आयोग के खिलाफ अभियान से जोड़ते हुए पेश किया। विपक्ष ने इसी आधार पर आंदोलन खड़ा किया कि चुनाव में जिस धांधली की बात वे बीते कुछ सालों से कर रहे हैं, वह सही है और चुनाव आयोग के अंदर भी अधिकारी यह मानते हैं कि गड़बड़ी हो रही है।

वैसे, चुनाव आयोग फैसले कैसे लेता है?
चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि यह सिर्फ CEC का दफ्तर नहीं, बल्कि तीन सदस्यों वाला एक संवैधानिक संस्थान है। इसके पास चुनाव कराने, इलेक्शन प्रोसेस की मॉनिटरिंग करने और चुनाव से जुड़े कई मामलों में निर्देश देने की जिम्मेदारी है। आयोग के फैसले लेने का तरीका इस तरह समझ सकते हैं...
1. तीनों आयुक्तों की भूमिका: आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। फैसले लेने में तीनों की बराबर भूमिका होती है।
2. बैठक या दस्तावेजों के जरिए विचार: आयोग रेगुलर बैठकों में चुनावी मुद्दों पर चर्चा करता है। कुछ मामलों में दस्तावेजों को सदस्यों के बीच भेजकर भी विचार किया जाता है।
3. बहुमत से फैसला: अगर तीनों सदस्य किसी मुद्दे पर एकमत नहीं हैं, तो फैसला बहुमत के आधार पर होता है। इसका मतलब है कि दो सदस्यों की राय एक होने पर उस आधार पर फैसला लिया जा सकता है।
4. अधिकारियों को जिम्मेदारी: आयोग अपने सचिवालय के अधिकारियों को भी कई एडमिनिस्ट्रेटिव काम सौंप सकता है। हालांकि, इससे आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।
तो निष्कर्ष क्या निकलता है?
शॉर्ट में समझें तो मसला यह है कि विपक्ष लंबे अरसे से चुनाव आयोग पर BJP की मदद करने का आरोप लगाता रहा है। इस बार एक रिपोर्ट की मदद से वह आक्रामक हुआ है। लोगों तक यह मैसेज पहुंचाने की कोशिश है कि चुनाव में धांधलियां होती रही हैं। आंदोलन के जरिए विपक्ष चुनाव आयोग और सरकार पर भी दबाव बना रहा है, ताकि अगले चुनाव में उसे गंभीरता से लिया जाए। विपक्ष की कुछ शिकायतें जायज भी लगती हैं, वहीं कुछ आपत्तियां राजनीति से प्रेरित भी। फिलहाल, CEC, SIR और अन्य चुनावी गड़बड़ियों के कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। इन्हीं पर फैसलों के बाद स्थिति साफ होगी कि गड़बड़ कहां है।
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