दीपावली पर जिस झाड़ू से होती है मां लक्ष्मी की पूजा, उसे बनाने में जुटा है पूरा गांव: 4 से 7 पीढ़ियों का हुनर दे रहा 1,000 लोगों को रोजगार, तीन राज्यों में है मांग
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झाड़ू बनाने वाले सुसेरा गांव की अनूठी कहानी, 150 घरों में चलता है कारोबार, 1000 लोगों को रोजगार।
ग्वालियर। दीपावली पर जब लोग बाजार से नई झाड़ू खरीदते हैं और उसे मां लक्ष्मी से जोड़कर शुभता और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं, तब शायद ही किसी को पता होता है कि इस एक झाड़ू के पीछे कितने हाथों की मेहनत और कितने परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है। ग्वालियर-चंबल अंचल का सुसेरा गांव इसकी सबसे अनूठी मिसाल है। यहां झाड़ू सिर्फ सफाई का सामान नहीं, बल्कि पूरे गांव की अर्थव्यवस्था का आधार है। गांव के करीब 150 घरों में सुबह से शाम तक झाड़ू बनाने का काम चलता है। खास बात यह है कि इस कारोबार से करीब एक हजार लोग जुड़े हैं और यह हुनर चार से सात पीढ़ियों से परिवारों में आगे बढ़ रहा है।
2500 की आबादी, एक हजार लोगों का रोजगार
सुसेरा गांव की पहचान यहां की झाड़ू निर्माण की परंपरा से है। करीब 2500 की आबादी वाले इस गांव में लगभग एक हजार लोग झाड़ू बनाने के काम में लगे हैं। महिलाएं, पुरुष, युवा, बच्चे और बुजुर्ग सभी अपनी क्षमता के अनुसार इस काम में हाथ बंटाते हैं। किसी के जिम्मे पत्तियों की छंटाई है तो कोई तीलियों की सफाई और कटाई करता है। वहीं कुछ लोग झाड़ुओं को बांधकर बाजार में भेजने के लिए तैयार करते हैं।
यहां झाड़ू बनाना किसी एक व्यक्ति का व्यवसाय नहीं, बल्कि पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी है। बुजुर्गों से सीखा हुनर नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है। चार से सात पीढ़ियों से चले आ रहे इस पारंपरिक काम ने गांव के लोगों को अपने ही घर में रोजगार उपलब्ध कराया है। यही वजह है कि यहां के परिवारों को रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ता।
400 ट्रक कच्चा माल आता है, 1000 ट्रक झाड़ू बनकर निकलते हैं
सुसेरा में झाड़ू का कारोबार अब गांव की सीमाओं से निकलकर बड़े बाजार तक पहुंच चुका है। झाड़ू बनाने के लिए कच्चा माल उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के मऊरानीपुर से मंगाया जाता है। सालभर में 400 से अधिक ट्रक कच्चा माल लेकर गांव पहुंचते हैं। इसके बाद तैयार झाड़ुओं की सप्लाई के लिए करीब एक हजार ट्रक गांव से बाहर जाते हैं।
एक ट्रक में लगभग 150 बोरे लोड किए जाते हैं और एक बोरे में करीब 200 झाड़ू पैक रहती हैं। इस हिसाब से एक ट्रक में लगभग 30 हजार झाड़ू बाजार तक पहुंचती हैं। सामान्य दिनों में एक बोरे की कीमत 2500 से 3000 रुपये रहती है, जबकि दीपावली के सीजन में मांग बढ़ने पर यही कीमत 4 से 5 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। त्यौहार का सीजन सुसेरा के कारीगरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। जैसे-जैसे दीपावली नजदीक आती है, ऑर्डर बढ़ने लगते हैं और गांव के घरों में झाड़ू बनाने की रफ्तार तेज हो जाती है।
मध्य प्रदेश से राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक पहुंचती हैं झाड़ू
सुसेरा में तैयार होने वाली झाड़ुओं का बाजार काफी बड़ा है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिंड, श्योपुर और सबलगढ़ सहित कई इलाकों में इनकी सप्लाई होती है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, इटावा, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद और मथुरा तक यहां की झाड़ू पहुंचती हैं।
राजस्थान के बाड़ी, सरमथुरा और करौली में भी सुसेरा की झाड़ुओं की मांग बनी रहती है। इस तरह एक छोटे से गांव में तैयार होने वाला उत्पाद तीन राज्यों के बाजारों तक पहुंचकर हजारों घरों की जरूरत पूरी करता है।
20 रुपए में तैयार होती है एक झाड़ू, रोजाना 1200 रुपए तक कमाई
एक झाड़ू तैयार करने के पीछे कई चरणों की मेहनत शामिल होती है। कारीगर खुद खजूर की पत्तियां काटकर लाते हैं। एक गाड़ी में करीब 500 बंडल तक कच्चा माल आता है। एक बंडल से लगभग 30 झाड़ू तैयार होती हैं। कच्चे माल के एक बंडल की कीमत 100 से 120 रुपये तक होती है।
इसके बाद पत्तियों की छंटाई, सफाई, कटाई और तीलियों को सही आकार में बांधने का काम किया जाता है। एक झाड़ू तैयार करने में करीब 20 रुपये की लागत आती है। इस काम से जुड़े कारीगर अपनी मेहनत के दम पर रोजाना लगभग 1000 से 1200 रुपये तक कमा लेते हैं।
झाड़ू की पूजा और सुसेरा के परिवारों की खुशहाली का रिश्ता
दीपावली पर नई झाड़ू खरीदने और उसकी पूजा करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं में झाड़ू को मां लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि स्वच्छता और साफ-सफाई से घर में सुख-समृद्धि आती है। ऐसे में सुसेरा के कारीगरों के हाथों से तैयार झाड़ू हजारों घरों तक पहुंचती है। जिन घरों में इस झाड़ू से सफाई होती है, उसी झाड़ू को बनाने वाले परिवारों के घरों का चूल्हा भी इसी मेहनत से जलता है।
हुनर बना गांव की ताकत, पलायन नहीं आत्मनिर्भरता है पहचान
सुसेरा की कहानी उन गांवों के लिए प्रेरणा है, जहां रोजगार के अभाव में लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरे शहरों में जाना पड़ता है। यहां न किसी बड़ी कंपनी का कारखाना है और न ही रोजगार के लिए सरकारी नौकरी पर निर्भरता। पीढ़ियों से मिला हुनर, परिवार के सभी सदस्यों की मेहनत और बाजार में बनी मांग ने इस गांव को आत्मनिर्भर बना दिया है।
सुसेरा की झाड़ू सिर्फ घरों की गंदगी साफ नहीं करती, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन में रोजगार और खुशहाली भी लाती है। दीपावली पर जब देशभर में नई झाड़ू खरीदी जाएगी, तब उसके पीछे सुसेरा के सैकड़ों परिवारों की मेहनत और पीढ़ियों पुराना हुनर भी शामिल होगा।

