UP में SP-INC क्या बराबर सीटों पर लड़ेंगी: कांग्रेस जिद पर क्यों अड़ी, अखिलेश मानेंगे या गठबंधन टूटेगा; पिछले चुनाव क्या कहानी बता रहे
Published:
7 min read

नेशनल डेस्क। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस संकेत दे रही है कि वह इस बार सम्मानजनक हिस्सेदारी ही नहीं, बल्कि बराबरी के आधार पर सीट शेयरिंग चाहती है। पार्टी के नए UP प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम साफ कह चुके हैं कि कांग्रेस आधी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है।
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद तो यह तक कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव में सपा को 37 सीट कांग्रेस की वजह से ही मिली। कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और सभी समुदाय और कम्युनिटी को स्वीकार है। इसीलिए हम इस बार 50-50 फॉर्मूले पर सीट बंटवारा चाहते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अखिलेश यादव कांग्रेस की यह मांग मानेंगे? अगर नहीं, तो क्या गठबंधन टूट सकता है? और अगर दोनों साथ रहते हैं, तो सीटों का फॉर्मूला क्या हो सकता है? आइए पूरे मुद्दे को आसान भाषा में समझते हैं।
आखिर विवाद शुरू क्यों हुआ?
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। कांग्रेस का कहना है कि लोकसभा चुनाव में INDIA गठबंधन की सफलता के बाद अब उसे छोटा सहयोगी नहीं माना जाना चाहिए। कांग्रेस के UP प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि गठबंधन बराबरी और सम्मान के आधार पर होना चाहिए।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी मानती है कि उत्तर प्रदेश में उसका संगठन, वोट बैंक और राजनीतिक ताकत कांग्रेस से कहीं ज्यादा है। इसलिए सीटों का बंटवारा भी उसी हिसाब से होना चाहिए।

विधानसभा में खराब परफॉर्मेंस, फिर बराबर सीटें क्यों मांग रही कांग्रेस?
पहला कारण: उत्तर प्रदेश में 10 साल से BJP की सरकार है। ऐसे में कुछ हद तक सत्ता विरोधी लहर होना जाहिर बात है। ग्राउंड पर यह नजर भी आ रहा है। राम मंदिर दान चोरी का मामला भी लोगों को BJP सरकार से दूर कर सकता है। केन्द्र में भी 12 साल से BJP की सरकार है। उसके खिलाफ भी अब सत्ता विरोधी लहर नजर आने लगी है। फिर BJP हाईकमान और योगी आदित्यनाथ के बीच मतभेदों की भी चर्चा है। इन्हीं मतभेदों ने लोकसभा में विपक्षी दलों को BJP गठबंधन से ज्यादा सीट दिलाई थी। कांग्रेस अब BJP के खिलाफ बन रहे इस माहौल का फायदा उठाना चाहती है और उसे इससे बेहतर कोई और मौका नहीं मिलेगा।
दूसरा कारण: 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कम सीटों पर चुनाव लड़ा और बेहतर प्रदर्शन किया। इससे पार्टी का मनोबल बढ़ा। कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटें जीतीं यानी सक्सेस रेट 35 फीसदी रहा। सपा ने 62 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 37 सीट हासिल की। सपा का सक्सेस रेट करीब 60 फीसदी रहा। हालांकि यह भी सच है कि सपा ने कांग्रेस को उन इलाकों में ज्यादा सीटें दी थीं, जहां BJP बहुत मजबूत थी। यानी कांग्रेस ने कमजोर सीटों पर भी अच्छा परफॉर्मेंस दिया।
तीसरा कारण: कांग्रेस को लगता है कि राहुल गांधी ने बीते 4-5 सालों में पिछड़ों-दलितों के आरक्षण और अधिकारों का जो मुद्दा उठाया, उससे कांग्रेस का छिटका हुआ वोट बैंक फिर से एकजुट हुआ। इस वोट बैंक को अपने पास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़े। कम सीटों पर लड़ने से पार्टी अपना वोट बैंक खोती है और संगठन भी कमजोर होता है। यानी कांग्रेस अब सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में अपना संगठन दोबारा खड़ा करने पर फोकस करती नजर आ रही है।

क्या अखिलेश यादव मानेंगे?
बिल्कुल नहीं। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से कहीं ज्यादा मजबूत है। वह यादव, मुस्लिम और PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति पर लगातार काम कर रही है। उसका संगठन मजबूत है और जीत का दम भरने वाले उम्मीदवार भी हैं। कांग्रेस इन सभी चीजों में पीछे है।
कांग्रेस भी ज्यादा से ज्यादा सीट हासिल करने का दबाव बनाने के लिए बराबरी के फॉर्मूले की बात कर रही है। वह भी जानती है कि ऐसा नहीं होगा। संभव है इस मोलभाव में कांग्रेस UP की 403 में से 150 तक सीटों को हासिल करने में कामयाब हो जाए।
अखिलेश इस आंकड़े पर हामी भी भर सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अखिलेश यादव पर दबाव होगा। UP में कांग्रेस के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है जबकि अखिलेश इस बार हाथ आ रही सत्ता गंवा सकते हैं। ऐसे में उन्हें कुछ हद तक कांग्रेस की शर्तों पर झुकना पड़ेगा। मिलकर लड़ना कांग्रेस की नहीं बल्कि अखिलेश की मजबूरी होगी और मिलकर लड़कर ही लोकसभा चुनाव 2024 की तरह यूपी की सत्ता तक पहुंचा जा सकता है।

मायावती-ओवैसी-चंद्रशेखर का फैक्टर कितना अहम?
मायावती फैक्टर: बहुजन समाज पार्टी (BSP) पिछले विधानसभा चुनाव में महज एक ही सीट जीत पाई। लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर 12 फीसदी से ज्यादा था। इस वोट शेयर ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को 2022 में नुकसान पहुंचाया था। कुछ सीटों पर सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशियों की हार का अंतर BSP कैंडिडेट को मिले वोटों से कम था।
हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में BSP इतना नुकसान नहीं पहुंच पाई। ऐसा इसलिए क्योंकि राहुल गांधी लगातार दलितों के अधिकार और आरक्षण बढ़ाने के मुद्दे उठाते रहे। BJP सरकार बनने पर संविधान को खत्म कर देने के दावे भी दलित समाज तक पहुंचे। ऐसे में बड़ी संख्या में दलित वोट BSP से कांग्रेस-SP गठबंधन की ओर शिफ्ट हो गए।
अगर दलित वोटों का यही भरोसा इस बार भी कांग्रेस पर बना रहता है तो SP-कांग्रेस अलायंस को इसका फायदा मिलेगा। लेकिन अगर मायावती मजबूती से चुनाव लड़ती हैं तो वह कुछ सीटों पर जरूरी परेशानी खड़ी करेंगी।
ओवैसी फैक्टर: AIMIM उत्तर प्रदेश में अब तक बड़ी चुनावी ताकत हासिल नहीं कर पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 95 उम्मीदवार उतारे और सभी की जमानत जब्त हो गई। इन 95 सीटों पर उन्हें महज 2 फीसदी वोट मिले। हालांकि इनमें से कुछ मुस्लिम बहुल सीटों पर परफॉर्मेंस ठीक-ठाक रहा। ऐसे में इक्का-दुक्का सीट पर यह पार्टी सपा-कांग्रेस का गणित बिगाड़ सकती है।
चंद्रशेखर आजाद फैक्टर: ASPKR पार्टी ने भी पिछले विधानसभा चुनाव में 110 उम्मीदवार उतारे लेकिन सभी की जमानत जब्त हो गई। इन सीटों पर उन्हें आधा फीसदी वोट शेयर भी हासिल नहीं हुआ। वे किसी भी सीट पर सपा-कांग्रेस गठबंधन को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे में इस बार भी उनका असर न के बराबर है।

अब आगे क्या?
फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। कांग्रेस बराबरी की सीटें मांगने पर अड़ी हुई है। अखिलेश यादव गठबंधन बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन अपनी पार्टी के मजबूत आधार के हिसाब से कांग्रेस के लिए कम ही सीटें छोड़ना चाहेंगे। अंतिम फैसला दोनों दलों की टॉप लीटरशिप के बीच बातचीत से होगा।
2024 लोकसभा चुनाव की सफलता को देखते हुए सपा और कांग्रेस दोनों जानते हैं कि साथ रहना उनके लिए राजनीतिक रूप से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। अब सबसे अहम सवाल यही है कि समझौते का फॉर्मूला 50:50 होता है या 60:40 या 70:30।
यह भी पढ़ें...

