नवरात्रि का आखिरी दिन आज: मां सिद्धिदात्री की पूजा से मिलती हैं सिद्धियां; जानें स्वरूप, पूजा विधि और आरती
Published:
3 min read

सिद्धियों के बारे में मार्कन्डेय पुराण में कहा गया है कि ये कुल आठ होती।
धर्म डेस्क. आज नवरात्रि का नौवां और अंतिम दिन है। इस दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा होती है। सभी तरह की सिद्धियां देने वाली इन माता के कारण ही भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप बना था। यहां तक कि इनके अवतरण का कारण भी शिवजी ही थे। ऐसा माना जाता है कि उनकी प्रार्थना से इनका अवतरण हुआ था। तो चलिए आज जानते हैं मां सिद्विदात्री के बारें में।
कमल पर विराजी मां सिद्धिदात्री
मां का आसन कमल पुष्प पर होता है। इनकी चार भुजाएं दर्शाई गई हैं। इनके हाथों में गदा, चक्र, कमल और शंख होते हैं। इनका भी वाहन शेर ही है। माता सभी तरह की सिद्धियां देती हैं। किसी भी तरह की सिद्धि पाने के लिए मनुष्य, देव, दानव, गंधर्व
सभी इनसे ही प्रार्थना करते हैं।
शिव का हिस्सा हैं मां सिद्धिदात्री
पुराणों के मुताबिक सृष्टि के आरंभ में महादेव ने सृजन के उद्देश्य से पराशक्ति की आराधना की थी। उस समय तक माता का कोई रूप नहीं था। वे केवल एक शक्ति स्वरूपा ही थीं। वह शक्ति जिसके ऊपर कोई नहीं, आदिशक्ति। आराधना किए जाने पर पराशक्ति ने शिवजी की बांईं भुजा से अवतार लिया। तभी से भगवान शिव अर्धनारीश्वर के रूप में भी पूजे जाने लगे। मां के इसी रूप के साथ शिवजी ने सृष्टि का सृजन किया।
कितनी होती हैं सिद्धियां
सिद्धियों के बारे में मार्कन्डेय पुराण में कहा गया है कि ये कुल आठ होती हैं, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। इन्हें ही अष्ट सिद्धि के नाम से जाना जाता है। वहीं, ब्रह्मवैवर्त्य पुराण में श्री कृष्ण जन्म खंड में ये 18 बताई गई हैं। जो हैं अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, सर्वज्ञत्व, दूरश्रवण, परकायप्रवेशन, वासिद्धि, कल्पवृक्षत्व, सृष्टि, संहारकरण सामर्थ्य, अमरत्व, सर्वन्यायकत्व वाशित्व, भावना और सिद्धि।
चाहे कोई भी किसी भी तरह की सिद्धि हो सभी मां के ही वश में हैं। इन्हीं की अनुकम्पा से प्राप्त होती हैं।

माता सिद्धिदात्री की आरती
।।माँ सिद्धिदात्री की आरती।।
जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता
तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता,
तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि
कठिन काम सिद्ध कराती हो तुम
हाथ सेवक के सर धरती हो तुम,
तेरी पूजा में न कोई विधि है
तू जगदंबे दाती तू सर्वसिद्धि है
रविवार को तेरा सुमरिन करे जो
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो,
तू सब काज उसके कराती हो पूरे
कभी काम उस के रहे न अधूरे
तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया
रखे जिसके सर पैर मैया अपनी छाया,
सर्व सिद्धि दाती वो है भाग्यशाली
जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली
हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा
महानंदा मंदिर में है वास तेरा,
मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता
वंदना है सवाली तू जिसकी दाता..।

