प्रधानमंत्री मोदी बस्तर में जवानों संग मनाएंगे दीपावली : पीेएम नेे पोस्ट में लिखा- 'वीर जवानों के बलिदान और तपस्या को नमन करने जा रहा हूं'
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नक्सलमुक्त बस्तर में पीएम मोदी की दिवाली, AI जनरेटेड फोटो।
रायपुर/जगदलपुर। नक्सली मुक्त होने के बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बस्तर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार दिवाली बस्तर में वीर जवानों के साथ मनाएंगे। उन्होंने X पर पोस्ट कर कहा - दीपावली के पावन अवसर पर बस्तर जा रहा हूं। कल तक जहां नक्सलियों का कहर था, वहां आज विकास की बहार है। वीर जवानों, उनके बलिदान, त्याग और तपस्या को नमन करने जा रहा हूं।
PM का ये दौरा ऐतिहासिक
बस्तर को इसी साल 31 मार्च 26 को केंद्र सरकार ने वामपंथी उग्रवाद LWE से मुक्त घोषित किया है। चार दशक पहले जहां से नक्सलवाद की शुरुआत हुई थी, वहीं आज विकास की नई तस्वीर है। देखने को मिल रही है।
बस्तर में कैसे फैला था नक्सलवाद
विशेषज्ञों के अनुसार बस्तर में नक्सलवाद का इतिहास तीन चरणों में प्रवेश विस्तार 1980 का दशक नक्सलबाड़ी विद्रोह 1967 में पश्चिम बंगाल में शुरू हुआ था, लेकिन बस्तर में इसकी एंट्री 1980 में हुई। 22 अप्रैल 1980 को कोंडापल्ली में पीपुल्स वॉर ग्रुप बनाया। आंध्र प्रदेश में पुलिस के दबाव से बचने के लिए दलम दंडकारण्य के जंगलों में आए। पहला हमला 1981 में सुकमा के गोलापल्ली में हुआ, जहां एक जवान को गोली मारी गई। 2004-2014 तक 2004 में CPI माविष्ट के गठन के बाद आंदोलन अपने पीक पर पहुंच गया। इस दौरान सुरक्षा बलों पर बड़े हमले, सड़क, स्कूल, अस्पताल, बिजली के टावरों को उड़ाना जगह-जगह लैंड माइंस बिछाकर सुरक्षा बाल पर दर्जनों बार हमले किए। सैकड़ो जवान इस दौरान शहीद हुए।
कब हुआ पतन
2014 से 2026 माओवादियों ने भौगोलिक दुर्गमता का फायदा उठाकर नेटवर्क बनाया था, लेकिन पिछले एक दशक में फोकस्ड ऑपरेशन, इंटेलिजेंस, सुरक्षा कैंपों के विस्तार और सरेंडर पॉलिसी से नक्सल इकोसिस्टम ध्वस्त हुआ। इस दौरान सुरक्षा एजेंटीयों ने 500 से अधिक माओवादियों को न्यूट्रलाइज किया। रंडी को 1200 से अधिक माबादियों ने सरेंडर भी किया। साइको असल बारूद बरामद हुआ और माओवादियों के छुपाए हुए पैसे भी सुरक्षा एजेंटीयों ने जप्त किया। कभी जहां राशन 5 दिन कंधे पर ढोकर ले जाना पड़ता था, वहां आज सड़क, बिजली, मोबाइल और पर्यटन पहुंच रहा है।PM मोदी का जवानों के बीच दिवाली मनाना इसी बदले हुए बस्तर की नहीं तस्वीर होगी।

जहां पांच दिन का राशन कंधे पर ढोना पड़ता था, वहां पहुंच रही सड़क और बिजली
नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के साथ बस्तर के अंदरूनी इलाकों में विकास की संभावनाएं बढ़ी हैं। कभी ऐसे गांव थे, जहां तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था और सुरक्षा तथा भौगोलिक चुनौतियों के कारण राशन तक पांच दिन तक कंधे पर ढोकर ले जाना पड़ता था। अब इन क्षेत्रों में सड़क निर्माण, बिजली, मोबाइल नेटवर्क और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हो रहा है। पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता, जलप्रपात, जंगल, जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत को नई पहचान मिलने लगी है।
हालांकि अंदरूनी क्षेत्रों में विकास की प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाना भी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में शांति और सुरक्षा के साथ बुनियादी सुविधाओं का विस्तार क्षेत्र के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जवानों के साथ दिवाली मनाकर देंगे बड़ा संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बस्तर में जवानों के साथ दीपावली मनाने का फैसला केवल एक त्योहार का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के प्रति सम्मान और बदलते बस्तर का प्रतीक भी माना जा रहा है। जिन जंगलों में कभी नक्सली हिंसा का डर था, वहां आज विकास की नई उम्मीदें दिखाई दे रही हैं। प्रधानमंत्री का यह दौरा उन जवानों के त्याग और बलिदान को नमन करने का अवसर होगा, जिन्होंने बस्तर में शांति स्थापित करने के लिए कठिन परिस्थितियों में काम किया। बस्तर की यह दीपावली इसलिए भी खास होगी, क्योंकि यह क्षेत्र दशकों के संघर्ष के बाद शांति, सुरक्षा और विकास की नई राह पर आगे बढ़ने का संदेश दे रहा है।

