रेयर अर्थ मिनरल: 16,000 करोड़ रुपए का मिशन लॉन्च, GSI को 1200 लोकेशन का टारगेट; चीन पर से निर्भरता घटाने के लिए क्या-क्या कर रहा भारत
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तस्वीर चार रेयर अर्थ मिनरल की है। इस तरह के 17 खनिज हैं। चीन इनका सबसे बड़ा एक्सपोर्टर देश है।
नेशनल डेस्क। ‘दुर्लभ खनिजों की सप्लाई चेन में बाधा न आए, इसलिए BRICS देशों को मिलकर काम करने की जरुरत है। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कोई भी देश इन रिसोर्स को एक-दूसरे के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल न करें।’ पीएम मोदी ने यह बयान इसी जुलाई में ब्रिक्स देशों की सालाना मीटिंग में दिया था।
रेयर अर्थ मिनरल पर दुनियाभर में चल रही चर्चा के बीच पीएम मोदी का यह बयान वास्तव में चीन पर निशाना था। दरअसल, चीन ने हाल ही में इन खनिजों के एक्सपोर्ट पर कुछ बंदिशें लगाई हैं। इस फैसले ने दुनिया के तमाम देशों के लिए चिंता खड़ी कर दी है। ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया का 90% रेयर अर्थ मिनरल प्रोडक्शन चीन ही करता है। वहां इस तरह के खनिजों का सबसे बड़ा भंडार है। चीन के अलावा इक्का-दुक्का देशों में ही यह खनिज अच्छी तादाद में मिलते हैं।
रेयर अर्थ मिनरल्स में 17 तरह के खनिज आते हैं। यह ईवी गाड़ियां, स्मार्टफोन, विंड टरबाइन, मिसाइल और राडार जैसी कई आधुनिक तकनीकों वाले उपकरण बनाने में काम आते हैं। चीन ने इन 17 में से 7 खनिजों के एक्सपोर्ट पर लाइसेंसिंग समेत कुछ नियम सख्त किए हैं, जिससे सप्लाई चेन में रुकावट आई है।
भारत के लिए भी यह एक बड़ी समस्या है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत बड़ी मात्रा में चीन से ही इन खनिजों को इंपोर्ट करता है। भारत ने 2024-25 में कुल 53,748 मीट्रिक टन रेयर अर्थ मिनरल इंपोर्ट किया। इसमें से 93% चीन से आया। ऐसे में अब चीन की ओर से सप्लाई में आ रही कमी और देरी के कारण भारत में ऑटोमोबाइल से लेकर ग्रीन एनर्जी और डिफेंस सेक्टर्स का प्रभावित होना तय है। यही कारण है कि केंद्र सरकार इसे लेकर संवेदनशील है और बैक टू बैक बड़े कदम उठा रही है।
दरअसल, भारत में भी इस तरह के खनिजों का भंडार है लेकिन भारत के पास उस स्तर पर प्रोडक्शन फैसिलिटी नहीं है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल के तटीय इलाकों में मोनाजाइट की भरमार है। मोनाजाइट में कई तरह के रेयर अर्थ मिनरल्स मिलते हैं। इसी तरह राजस्थान की अलग-अलग लोकेशन पर भी रेयर अर्थ मटेरियल मिलने की बड़ी संभावना है। लेकिन तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर और रेगुलेटरी समस्याओं के कारण भारत को इन खनिजों के लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
हालत यह है कि हर साल भारत से निकाला जाने वाला एक तिहाई रेयर अर्थ मिनरल जापान की कंपनी प्रोड्यूस करती है और अपने देश ले जाती है। भारत सरकार अब इन चुनौतियों से निपटने के लिए बड़े स्तर पर योजना बना रही है।
‘दी नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ लॉन्च हुआ
एक अनुमान के मुताबिक, भारत दुनिया का पांचवां रेयर अर्थ मेटल रिजर्व देश है। यहां करीब 7 मिलियन टन रेयर अर्थ मिनरल हैं, जो दुनिया का 6% हिस्सा है। इसका उपयोग करने के लिए भारत में रिफाइनिंग कैपेसिटी से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीक विकसित करने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है। ऐसे में भारत सरकार ने इस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए इसी जुलाई में ‘दी नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ लॉन्च किया है। इसके लिए 16,300 करोड़ रुपए का बजट रखा गया। पब्लिक सेक्टर से इसमें 18,000 करोड़ का निवेश भी अनुमानित है।
1200 लोकेशन पर खोज करेगा GSI
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) को अगले 5 साल में 1200 लोकेशन पर दुर्लभ खनिजों की खोज का जिम्मा सौंपा गया। 2024-25 में GSI 195 लोकेशन पर इन खनिजों की खोज के प्रोजेक्ट भी शुरू कर चुका है। इन प्रोजेक्ट को फौरन परमिशन मिले, इसके लिए रेगुलेटरी अप्रुवल सिस्टम को फास्ट ट्रैक किया गया है। प्राइवेट कंपनियों को भी अब एक्सप्लोरेशन लाइसेंस देना शुरू हो गया है। इसी साल मार्च में केंद्र सरकार ने 13 एक्सप्लोरेशन ब्लॉक के लिए लाइसेंस की नीलामी की थी।
3 से 4 महीने में प्रोडक्शन सिस्टम तैयार करने के दावे
केंद्रीय कोयला और खदान मंत्री जी किशन रेड्डी ने 12 जुलाई को बताया था कि उनका विभाग नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग साइंस एंड मटेरियल (NFTSM) और तमाम इंडस्ट्री के साथ मिलकर रेयर अर्थ मिनरल के प्रोडक्शन के लिए जरूरी मशीनरी का निर्माण करेगा। उन्होंने यह भी बताया था कि इन खनिजों के प्रोडक्शन के लिए सिस्टम 3 से 4 महीनों में तैयार हो जाएगा।
जापान के साथ एग्रीमेंट तोड़ेगी IREL!
केंद्र सरकार जापान के साथ इन खनिजों से जुड़े एक 13 साल पुराने समझौते को भी तोड़ने वाली है। एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। 2012 में हुए एग्रीमेंट के तहत, इंडियन रेयर अर्थ लिमिटेड (IREL) जो दुर्लभ खनिज निकालती है, उसका बड़ा हिस्सा जापान को देना होता है। चीन से सप्लाई में हो रही दिक्कतों के कारण भारत सरकार IREL को यह एग्रीमेंट रद्द करने का कह सकती है, ताकि भारत में ही इन खनिजों की आपूर्ति समय से हो सके। बता दें कि IREL ने 2024 में 2900 टन रेयर अर्थ मिनरल निकाला। इसमें से 1000 टन जापान की कंपनी तोयोत्सु को सप्लाई किया गया।
चीन को काउंटर करने के लिए क्वाड की पहल
भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका ने मिलकर इस मामले में एक पहल भी शुरू की है, ताकि रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई बिना बाधा के होती रहे। इस पहल की कोशिश यही है कि इन खनिजों के प्रोडक्शन में चीन के एकाधिकार को खत्म किया जा सके। जुलाई 2025 में इन क्वाड देशों ने इस मामले में एक संयुक्त बयान भी जारी किया। इसमें चीन द्वारा रेयर अर्थ मिनरल की सप्लाई को बाधित करने पर निशाना साधते हुए कहा गया कि इन खनिजों के लिए एक देश पर निर्भरता हमारी अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, ऐसे में विकल्प के तौर पर सप्लाई चेन बनाने की जरुरत है।
5000 करोड़ तक की स्कीम
जून के आखिरी हफ्ते में एक रिपोर्ट यह भी आई कि केंद्र सरकार रेयर अर्थ मिनरल्स के प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए 3500 से 5000 करोड़ रुपए की स्कीम लेकर आने वाली है। यह इसलिए लाई जा रही है ताकि कम से कम समय में भारत में इन दुर्लभ खनिजों का प्रोडक्शन बढ़ाया जा सके। यह स्कीम किस तरह काम करेगी और प्राइवेट सेक्टर को इसमें कैसे शामिल किया जाएगा, इस बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।
चीन के कदम से भारत को मौका
चीन का रेयर अर्थ मिनरल सप्लाई पर बंदिश लगाना भारत के लिए एक अवसर की तरह हो सकता है। चीन के इस कदम ने भारत को इन खनिजों के भंडारों पर फोकस करने और इनके प्रोडक्शन के लिए सिस्टम विकसित करने की जरुरत की ओर धकेला है। जिस तरह से केंद्र सरकार इस सेक्टर पर फोकस कर रही है, अगर प्रयास इसी तरह चलते रहे तो संभव है कि जल्द ही इन दुर्लभ खनिजों के लिए चीन पर निर्भरता काफी हद तक खत्म हो सके।

