MP हाईकोर्ट में 7 अधिवक्ताओं की जज नियुक्ति पर विवाद: OBC, SC और ST वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर उठे सवाल; जनहित याचिका पर फैसला सुरक्षित
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मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट में सात अधिवक्ताओं की जज नियुक्ति के खिलाफ याचिका पर सुनवाई पूरी हुई। (फाइल फोटो)
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सात अधिवक्ताओं को न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की अनुशंसा के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर गुरुवार को दोनों पक्षों के बीच विस्तृत बहस हुई। मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने सुनवाई पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष की मांग पर अदालत ने अतिरिक्त तथ्य और लिखित तर्क प्रस्तुत करने के लिए 6 नवंबर तक का समय दिया है।
यह याचिका OBC एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर की गई है। इसमें न्यायपालिका में सामाजिक विविधता और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में वर्तमान में करीब 95 प्रतिशत न्यायाधीश सवर्ण वर्ग से हैं। उनका यह भी कहना है कि आजादी के बाद से अब तक ST वर्ग से कोई न्यायाधीश नियुक्त नहीं हुआ है।
इंद्रा साहनी फैसले का भी दिया हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने इंद्रा साहनी विरुद्ध भारत संघ मामले का उल्लेख करते हुए न्यायपालिका में सामाजिक दृष्टिकोण और प्रतिनिधित्व का सवाल उठाया। इसके अलावा 9 अक्टूबर 2026 के OBC आरक्षण संबंधी निर्णय और न्यायमूर्ति शील नागू के एक पूर्व फैसले का भी हवाला दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि न्यायिक निर्णयों में सामाजिक परिस्थितियों और वर्गों के प्रतिनिधित्व को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
नियुक्तियों में पक्षपात का आरोप, AAG ने जताई आपत्ति
बहस के दौरान विधि अधिकारियों की नियुक्तियों में कथित पक्षपात का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ता पक्ष ने प्रशांत सिंह की नियुक्ति का उदाहरण देते हुए प्रभावशाली पदों पर नियुक्तियों में जातिगत निकटता को प्राथमिकता दिए जाने का आरोप लगाया। इस पर अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह ने आपत्ति जताई और स्वयं को OBC वर्ग से संबंधित बताया।
कॉलेजियम की अनुशंसा निरस्त करने की मांग
एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर के अनुसार, याचिका में कॉलेजियम की अनुशंसा निरस्त करने और नियुक्तियों पर पुनर्विचार की मांग की गई है। साथ ही हाईकोर्ट के स्वीकृत न्यायाधीश पदों में OBC, SC और ST वर्गों को कुल 85 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की मांग भी रखी गई है।
उन्होंने बताया कि सुनवाई के दौरान लाइव स्ट्रीमिंग बंद कर दी गई थी और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़ने के इच्छुक अधिवक्ताओं को भी बहस में शामिल नहीं किया गया। अब युगलपीठ द्वारा फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद याचिकाकर्ता पक्ष को 6 नवंबर तक लिखित तर्क और अतिरिक्त तथ्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है।

