इंदौर में आज भी दौड़ती है 'धन्नो'!: आधुनिकता के दौर में भी तांगा चला रहे 80 साल के बब्बू भाई; जानिए संघर्ष और जज्बे की अनूठी कहानी
Published:
3 min read

इंदौर के 80 वर्षीय बब्बू भाई 50 साल से तांगा चलाकर जी रहे हैं जिंदगी।
इंदौर। फिल्म शोले का मशहूर डायलॉग 'चल भाग धन्नो!' आज भी लोगों की जुबान पर है। फिल्म में बसंती का तांगा और उसकी धन्नो भले ही काल्पनिक कहानी का हिस्सा थे, लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर में तांगे की सवारी आज भी देखने को मिलती है। शहर की तेज रफ्तार जिंदगी, आधुनिक गाड़ियों और बदलते परिवहन के दौर में करीब 80 साल के बब्बू भाई पिछले 50 वर्षों से तांगा चलाकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। मोती तबेला वाले बब्बू भाई के नाम से पहचाने जाने वाले इस शख्स का संघर्ष और जज्बा लोगों के लिए प्रेरणा है।
पांच दशक से तांगे के पहियों के साथ जारी है सफर
बब्बू भाई ने उस दौर में तांगा चलाना शुरू किया था, जब शहरों में घोड़ा गाड़ी परिवहन का एक प्रमुख साधन हुआ करती थी। उस समय तांगे की सवारी का अलग ही आकर्षण था और यात्रियों को कुछ पैसों में मंजिल तक पहुंचाया जाता था। कभी अठन्नी-चवन्नी और एक रुपये से शुरू हुआ सफर अब 100 से 200 रुपए तक पहुंच चुका है।
वक्त के साथ शहर की सड़कें बदलीं, वाहनों की संख्या बढ़ी और परिवहन के नए साधन आए, लेकिन बब्बू भाई ने अपना पुराना पेशा नहीं छोड़ा। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे रोजाना तांगा लेकर सड़कों पर निकलते हैं और यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाते हैं।
राजबाड़ा से छप्पन दुकान तक कराते हैं सैर
बब्बू भाई के मुताबिक, वे सुबह करीब 7 बजे राजबाड़ा क्षेत्र से अपने दिन की शुरुआत करते हैं। इसके बाद राजबाड़ा, छप्पन दुकान, रीगल, गांधी हॉल और किशनपुरा जैसे इलाकों में तांगा चलाते हैं। आज के दौर में जहां तांगे धीरे-धीरे शहरों से गायब हो चुके हैं, वहीं बब्बू भाई का तांगा इंदौर की पुरानी पहचान की याद दिलाता है। उनकी सवारी करने वाले लोगों को शहर के पुराने दौर की झलक भी देखने को मिलती है। वर्तमान में वे यात्रियों से आने-जाने के लिए करीब 100 से 200 रुपए किराया लेते हैं।
बदलते दौर में खत्म होती जा रही तांगा संस्कृति
बब्बू भाई बताते हैं कि उनके समय के ज्यादातर तांगा चालक अब इस दुनिया में नहीं रहे। आधुनिक वाहनों के बढ़ते चलन ने तांगा चलाने के व्यवसाय को लगभग खत्म कर दिया है। कई लोगों ने इस पेशे को छोड़कर दूसरे काम अपना लिए हैं।
इसके बावजूद बब्बू भाई आज भी अपने पुराने काम से जुड़े हुए हैं। उनके लिए तांगा चलाना केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि जीवन का वह हिस्सा है, जिसके साथ उन्होंने अपनी जिंदगी के पांच दशक बिताए हैं।
रोजाना 300 से 400 रुपए की कमाई, मेहनत से चल रहा परिवार
बब्बू भाई के मुताबिक, वे रोजाना करीब 300 से 400 रुपये कमा लेते हैं। इसी कमाई से अपने जीवन का गुजारा करते हैं। बदलती परिस्थितियों और सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने मेहनत का रास्ता नहीं छोड़ा है।
उनकी कहानी बताती है कि मेहनत और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का जज्बा उम्र का मोहताज नहीं होता। जब आधुनिकता की दौड़ में पुरानी परंपराएं पीछे छूट रही हैं, तब बब्बू भाई जैसे लोग अपने हुनर और मेहनत से उन्हें जिंदा रखे हुए हैं। बब्बू भाई का तांगा आज सिर्फ सवारी का साधन नहीं, बल्कि इंदौर की पुरानी यादों, मेहनतकश जिंदगी और कभी हार न मानने वाले हौसले की पहचान बन गया है।
ये भी पढ़ें- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को मिलेंगे 7 नए जज: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दी मंजूरी, स्वीकृत पदों की संख्या बढ़कर 45 होगी

