ट्रम्प, पुतिन और जिनपिंग को पसंद आया एक नाम: UN चीफ की रेस में हंगरी के पूर्व PM विक्टर ओर्बन; ब्रिटेन-फ्रांस लगा सकते हैं अड़ंगा
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डाेनाल्ड ट्रम्प हंगरी के पूर्व PM विक्टर ओर्बन को UN का अगला सेक्रेटरी-जनरल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दावा है कि रूस और चीन भी उनके नाम पर तैयार है।- फाइल
इंटरनेशनल डेस्क। अमेरिका, रूस और चीन के बीच कई ग्लोबल मुद्दों पर टकराव रहता है। लेकिन अब तीनों देशों के अफसरों के बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) के अगले चीफ को लेकर एक नाम पर चर्चा हुई है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हंगरी के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन को UN का अगला सेक्रेटरी-जनरल बनवाना चाहते हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूस और चीन के अधिकारी भी इस प्रपोजल को लेकर पॉजिटिव हैं। हालांकि, तीनों देशों ने अभी तक ओर्बन के नाम को ऑफिशियली सपोर्ट करने का ऐलान नहीं किया है।
ओर्बन के नाम पर कैसे शुरू हुई चर्चा
WSJ की रिपोर्ट के मुताबिक, ओर्बन के नाम का सुझाव अमेरिकी अफसरों ने मॉस्को और बीजिंग के अफसरों के साथ बातचीत के दौरान दिया था। इसके बाद अमेरिका की ओर से ओर्बन से भी कॉन्टैक्ट किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, ओर्बन की भी इसमें दिलचस्पी हैं, लेकिन वह तभी अपनी उम्मीदवारी का ऐलान करना चाहते हैं, जब उन्हें जीतने की मजबूत संभावना दिखे।

ओर्बन को कितने वोट चाहिए
UN के सेक्रेटरी-जनरल का चुनाव एक तय प्रक्रिया के तहत होता है। पहले 15 सदस्यों वाली सिक्योरिटी काउंसिल किसी कैंडिडेट के नाम की सिफारिश करती है। इसके बाद जनरल असेंबली उस नाम पर मुहर लगाती है।
किसी कैंडिडेट को सिक्योरिटी काउंसिल में में कम से कम 9 वोट चाहिए। इसके अलावा पांच परमानेंट मेंबर अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस में से कोई भी उसके नाम पर वीटो लगा सकता है।

ब्रिटेन और फ्रांस क्यों बन सकते हैं चुनौती
अमेरिका, रूस और चीन अगर ओर्बन के सपोर्ट में एक साथ आ भी जाते हैं, तो भी उनकी कैंडिडेसी की राह आसान नहीं होगी। ब्रिटेन और फ्रांस उनके नाम पर वीटो लगा सकते हैं। ओर्बन के यूरोपीय संघ (EU) के साथ लंबे समय से मतभेद रहे हैं। उनकी नीतियों को राइटविंग और एमिग्रेशन विरोधी माना जाता है।
इस वजह से यूरोप के कई देशों में उनके नाम पर सहमति बनना मुश्किल हो सकता है। पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने भी कहा है कि उनका देश ओर्बन का समर्थन नहीं करेगा। यूक्रेन के विदेश मंत्री ने भी इस पर आपत्ति जताई है। ऐसे में तीन बड़ी ताकतों के साथ के बावजूद ओर्बन के लिए समर्थन जुटाना चुनौती होगी।
ओर्बन को UN चीफ बनाने की चर्चा क्यों
विक्टर ओर्बन हंगरी के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने करीब 16 साल तक देश की सत्ता संभाली। हालांकि, अप्रैल 2026 में हुए चुनाव में उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और पीटर मैग्यार की टिस्जा पार्टी सत्ता में आई। ओर्बन के अमेरिका, रूस और चीन के शीर्ष नेतृत्व से करीबी रिश्ते रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प एडमिनिस्ट्रेशन को लगता है कि ओर्बन तीनों देशों के बीच सहमति बनाने वाले कैंडिडेट हो सकते हैं। हालांकि, उनके पॉलिटिकल रिकॉर्ड और यूरोपीय देशों के साथ मतभेदों के चलते उन्हें कैंडिडेट बनाने पर सवाल उठ रहे हैं।
गुटेरेस के बाद कौन संभालेगा UN की कमान
मौजूदा UN सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस का टेन्योर 31 दिसंबर को खत्म हो रहा है। नए सेक्रेटरी-जनरल को 1 जनवरी 2027 से पद संभालना है। इस पद के लिए कैंडिडेट चुनने में सिक्योरिटी काउंसिल की भूमिका सबसे अहम होती है। किसी कैंडिडेट को पर्याप्त वोट मिलने के साथ ही पांचों परमानेंट मेंबर का वीटो भी बचाना होता है। इसलिए अमेरिका, रूस और चीन का किसी नाम पर राजी होना अहम तो है लेकिन इससे नियुक्ति तय नहीं हो जाती। ओर्बन के मामले में भी यही स्थिति है।
अब आगे क्या होगा
फिलहाल ओर्बन ने अपनी कैंडिडेटसी का ऑफिशियली ऐलान नहीं किया है। अमेरिका, रूस और चीन की सरकारों ने भी इसकी पुष्टि नहीं की है। रूस के डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर अलेक्जेंडर अलीमोव ने कहा है कि सिक्योरिटी काउंसिल के परमानेंट मेंबर खुद किसी कैंडिडेट को नॉमिनेट नहीं करते।
अगर ओर्बन चुनाव में उतरते हैं, तो उन्हें किसी देश के जरिए नॉमिनेट होना होगा। इसके बाद काउंसिल में वोटिंग और वीटो का सामना करना होगा। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ट्रम्प, पुतिन और जिनपिंग उनके नाम पर राजी हैं या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या ओर्बन ब्रिटेन, फ्रांस और दूसरे देशों का भरोसा जीत पाएंगे।

