पोलैंड में जजों की लड़ाई सड़क पर पहुंची: जज ने चीफ जस्टिस को हटाया, सरकार और विपक्ष आमने-सामने; राष्ट्रपति ने बीच में रोका फॅारेन टूर
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पोलैंड के कॉन्स्टिट्यूशन ट्रिब्यूनल के प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट को हटाने के बाद कोर्ट बिल्डिंग के बाहर प्रोटेस्ट करते लोग।
इंटरनेशनल डेस्क। पोलैंड में कोर्ट और जजों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच चल रही लड़ाई अब सड़कों तक पहुंच गई है। 30 अक्टूबर को देश के कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल (Constitutional Tribunal) के प्रेसिडेंट बोगदान स्विएंचकोव्स्की (Bogdan Roman Swieczkowski) और वाइस प्रेसिडेंट बार्तलोमिए सोखांस्की (Bartlomiej Sochanski) को उनके पद से हटाने का एलान किया गया। यह फैसला जज अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का (Anna Korwin-Piotrowska) ने लिया।
इसके बाद कोर्ट के बाहर प्रोटेस्ट शुरू हो गए। पुलिस ने इमारत के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी। मामला इतना बढ़ा कि राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की (Karol Nawrocki) को सेनेगल जाते समय अपना प्लेन तक मोड़ना पड़ा... आइए आपको समझाते हैं क्या है पूरा मामला, आखिर पोलैंड में यह विवाद क्यों शुरू हुआ
कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल क्या है
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल कौन सी अदालत है। यह पोलैंड की सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट नहीं है। यह एक अलग अदालत है। इसका काम यह देखना है कि संसद और सरकार जो कानून बनाती हैं, वे देश के संविधान के मुताबिक हैं या नहीं। इस कोर्ट के चीफ को प्रेसिडेंट और दूसरे बड़े अफसर को वाइस प्रेसिडेंट कहा जाता है। इस मामले में कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल के प्रेसिडेंट को हटाने की कोशिश हुई है।

क्या एक जज अपने ट्रिब्यूनल के प्रेसिडेंट को हटा सकता है
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है। क्या एक जज अपनी ही अदालत के प्रेसिडेंट को हटा सकता है? इस मामले में अन्ना ने कहा कि उन्होंने दोनों अफसरों के कामकाज पर रोक लगाई है। यह हमेशा के लिए पद से हटाने का फैसला नहीं था। ऑर्डर में एक महीने की रोक की बात थी। इसके लिए एक कानून का हवाला दिया गया। हालांकि,कानून के जानकारों ने इस पर सवाल उठाए हैं।

लीगल एक्सपर्ट्स कहना है कि जिस कानून का सहारा लेकर प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट को हटाया गया है, वह इस ट्रिब्यूनल पर लागू नहीं होता। ट्रिब्यूनल के अपने ऑफिशियल X अकाउंट ने भी ऑर्डर को गलत बताया और कहा कि बोगदान ही उसके प्रेसिडेंट हैं। उसने अन्ना को ट्रिब्यूनल का जज मानने से भी इनकार कर दिया।
कब शुरू हुआ पूरा मामला
यह पूरा मामला 30 अक्टूबर की शाम करीब 6 बजे शुरू हुआ। कोर्ट की वेबसाइट पर एक नोटिफिकेशन जारी किया गया। इसमें प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट को निलंबित करने की बात कही गई थी। अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने कहा- ट्रिब्यूनल में कानून बहाल कराने के लिए यह कदम जरूरी था। मैं सबसे लंबे समय से काम करने वाली जज हूं। ऐसे में कोर्ट की जिम्मेदारी संभालना मेरा काम है।
ट्रिब्यूनल का ऑफिशियल स्टैंड क्या
हालांकि, कोर्ट के ऑफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। इस पर लिखा गया- वेबसाइट पर गलत तरीके से कब्जा किया गया है। बोगदान स्विएंचकोव्स्की ही ट्रिब्यूनल के प्रेसिडेंट हैं। उन्हें इस पोस्ट से हटाना तख्तापलट की तरह है।
राष्ट्रपति नावरोत्सकी ने आधे रास्ते से लौटाया प्लेन
इस विवाद के बीच राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की सेनेगल के विजिट पर जा रहे थे। खबर मिलते ही उन्होंने अपना प्लेन वापस पोलैंड मोड़ने का फैसला किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा- ऐसे समय में राष्ट्रपति का पोलैंड में रहना जरूरी है। शुक्रवार देर रात वे वारसा पहुंचे। शनिवार तड़के वे सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख ज्बिग्न्येव कापिन्स्की के साथ कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट की इमारत में भी पहुंचे।

उधर, कोर्ट के बाहर सैकड़ों लोग जमा हो गए। प्रोटेस्टर्स ने प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के खिलाफ नारे लगाए। पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया है। पुलिस के मुताबिक, कुछ प्रोटेस्टर्स ने सुरक्षा घेरा तोड़ने और अफसरों पर सामान फेंकने की कोशिश की थी।
10 साल पुरानी है इस विवाद की कहानी
इस विवाद की जड़ करीब 10 साल पुरानी है। 2015 में लॉ एंड जस्टिस यानी PiS पार्टी की सरकार बनी। उस सरकार ने कोर्ट और ट्रिब्यूनल्स में जजों की अपॉइंटमेंट के नियमों में बदलाव किए। आरोप लगा कि सरकार ने अपनी पसंद के लोगों को अहम पदों पर बैठाया और अदालतों पर अपना असर बढ़ाया।
यूरोपियन यूनियन ने भी पोलैंड के ज्युडिशियल सिस्टम में सरकार के दखल पर सवाल उठाए।यहां तक कि पोलैंड को दी जाने वाली फंडिंग तक रोक दी। इस वजह से पोलैंड और यूरोपियन यूनियन के बीच भी टेंशन बढ़ी। PiS पार्टी 2023 तक सत्ता में रही।इस दौरान कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट भी लगातार विवादों में रही।
प्रधानमंत्री टस्क से नाराजगी की वजह क्या
2023 में डोनाल्ड टस्क की अगुआई में नई सरकार बनी। उसने सभी कोर्ट और ट्रिब्यूनल को पॉलिटिक इनफ्यूएंस से फ्री करने का वादा किया। इस साल मार्च में संसद ने कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल के लिए छह नए जज चुने। बाद में चुने गए जजों की संख्या आठ हो गई। लेकिन राष्ट्रपति कारो नावरोत्स्की ने इनमें से पांच जजों को पद की शपथ नहीं दिलाई। इसके बाद लोगों की नाराजगी शुरू हो गई।
पोलैंड में संसद चुनती है जज
बता दें कि पोलैंड में संसद जजों को चुनती है, लेकिन उन्हें राष्ट्रपति के सामने शपथ लेनी होती है। इन जजों ने संसद में शपथ ली और राष्ट्रपति कार्यालय को इसकी जानकारी भेजी। इसके बावजूद ट्रिब्यूनल के प्रेसिडेंट बोगदान स्विएंचकोव्स्की ने उन्हें काम करने की इजाजत नहीं दी। अन्ना भी इन्हीं जजों में शामिल हैं, जिन्हें राष्ट्रपति ने शपथ नहीं दिलाई थी।
ट्रिब्यूनल के अंदर ही दो फाड़
कोर्ट के प्रेसिडेंट बोगदान स्विएंचकोव्स्की पर भी आरोप है कि वे संसद से चुने गए नए जजों को काम नहीं करने दे रहे थे। इसी वजह से सरकार के समर्थक जजों और मौजूदा ट्रिब्यूनल प्रेसिडेंट के बीच टकराव बढ़ता गया।यही वजह है कि अब ट्रिब्यूनल के अंदर ही दो फाड़ हो गया है। एक पक्ष का कहना है कि नए चुने गए जजों को काम करने से रोकना गलत है। दूसरा पक्ष अन्ना के आदेश को गैरकानूनी बता रहा है।
PM टस्क और विपक्ष की अपनी-अपनी दलीलें
PM डोनाल्ड टस्क का कहना है कि उनकी सरकार का मकसद कोर्टों में कानून का राज बहाल करना है। उन्होंने कहा कि PiS के शासन में कानून व्यवस्था को नुकसान पहुंचा और अब उसे ठीक करना सरकार की जिम्मेदारी है।
वहीं PiS नेताओं ने जजों को हटाने के फैसले की आलोचना की है। पूर्व न्याय मंत्री ज्बिग्न्येव जियोब्रो ने इसे देश के संविधान पर हमला बताया और लोगों से विरोध करने की अपील की। राष्ट्रपति नावरोत्स्की भी सरकार के कदम को गलत बता रहे हैं। इस तरह एक ही फैसले को लेकर सरकार इसे सुधार बता रही है, जबकि विपक्ष इसे कोर्ट पर कब्जे की कोशिश कह रहा है।

