नेपाल से राज एक्सप्रेस एक्सक्लूसिव- पार्ट 4: Gen-Z को सियासत से ज्यादा बेरोजगारी, महंगाई की चिंता; हालात न सुधरे तो भारत को भी 3 नुकसान
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काठमांडू से धीरेंद्र कुमार झा: नेपाल की सड़कों पर आंदोलन अब अंजाम तक पहुंचता नजर आ रहा है। सुशीला कार्की इंट्रिम प्राइम मिनिस्टर चुन ली गई हैं। नेपाल की मौजूदा उथल-पुथल भारत के लिए सिर्फ एक पड़ोसी देश का संकट नहीं है। इसे गौर से देखें तो यह मामला हमारे लिए सीधे सिक्योरिटी, पॉलिटिक्स और इकोनॉमी का सवाल है। काठमांडू की गलियों में जो नारे लग रहे हैं, उनकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देती है।
भारत के सामने चुनौती है कि वह नेपाल के संकट को सिर्फ सत्ता के खेल के तौर पर न देखे, बल्कि नेपाली जनता और युवाओं के गुस्से को समझे। तभी भारत अपने सबसे करीबी पड़ोसी को स्थिर रख पाएगा और इस क्षेत्र में अपनी स्ट्रैटेजिक लीड बनाए रख सकेगा। नेपाल से ग्राउंड रिपोर्ट की चौथी सीरीज में आइए जानते हैं पूरे विवाद का भारत पर क्या असर होगा, नेपाली युवा बदलाव को लेकर क्या सोचते हैं...
पोखरा यूनिवर्सिटी के छात्र दीपेश गुरूंग राज एक्सप्रेस से कहते हैं- सरकार ने हमारी आवाज दबाई, इसलिए हम सड़कों पर उतर आए। हालांकि, अब युवा खुद नॉर्मलाइजेशन में जुट गए हैं। एक स्टूडेंट ग्रुप भद्रकाली (नेपाल आर्मी हेडक्वार्टर) में सरकार बनाने की प्रोसेस में जुटा है, तो वहीं दूसरा ग्रुप सड़कों पर साफ सफाई और व्यवस्था सुधारने में जुटा है। Gen-Z को लोग भले ही उनकी रील और कंटेंट के लिए क्रिटिसाइज करते हों, लेकिन वह इनफॉॅर्म्ड हैं, उसे पता है कि क्या सही है और क्या गलत।
यह सिर्फ सियासी खेल नहीं, बल्कि आम जनता के जीवन पर इसका असर हो रहा है। जमीनी स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई और असमानता बड़ा मुद्दा हैं। युवाओं को ये मुद्दे बेचैन कर रहे हैं। हमारा मकसद ये ही है कि नेपाल किसी की कठपुतली बनने के बजाए अपने युवाओं को मजबूत करे। अपनी छोटी ही सही, लेकिन अलग पहचान बनाएं।
भारत पर क्या होगा असर
काठमांडू यूनिवर्सिटी में हिमालया सेंटर फॉर एशियन स्टडीज के डीन, प्रोफेसर डॉ. सागर राज शर्मा कहते हैं—अगर नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता लंबी खिंची, तो भारत को तीन स्तर पर असर झेलना होगा। पहला, बॉर्डर सिक्योरिटी। दूसरा, ट्रेड और एनर्जी प्रोजेक्ट में रुकावट। तीसरा, भारत की नेबर डिप्लोमेसी की साख पर चोट।
1. बॉर्डर सिक्योरिटी पर प्रेशर
नेपाल में अगर अस्थिरता बढ़ी तो सबसे पहले असर भारत-नेपाल बॉर्डर पर दिखेगा। खुले बॉर्डर से आवाजाही बढ़ेगी, अवैध गतिविधियां तेज होंगी और सिक्योरिटी एजेंसियों पर बोझ बढ़ेगा। यह सीधा भारत की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा मसला है। नेपाल के बॉर्डर से पहले, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन के घुसपैठियों को पकड़ा जा चुका है।
2. ट्रेड और एनर्जी प्रोजेक्ट्स में रुकावट
भारत और नेपाल के बीच चल रहे बड़े हाइड्रोपावर और ट्रेड प्रोजेक्ट्स पर नेपाल के अशांति माहौल का असर होगा। इन प्रोजेक्ट्स में देरी भारत की आर्थिक और स्ट्रैटेजिक पकड़ कमजोर कर सकती है। इससे नेपाल में चीन को स्पेस मिलने का खतरा और बढ़ेगा।
3. भारत की डिप्लोमेसी और साख पर चोट
अगर भारत ने नेपाल के यूथ की भावनाओं और राजनीतिक बदलाव को समय पर नहीं समझा, तो इसके नेबरहुड फर्स्ट नीति पर सवाल उठेंगे। चीन मौके का फायदा उठाकर अपनी पकड़ मजबूत करेगा। हालांकि, अगर भारत संतुलन साधकर डिप्लोमेसी और डेवलपमेंट दोनों पर जोर दे, तो यही संकट भारत के लिए आपदा में अवसर बन सकता है।
नेपाल की अस्थिरता का फायदा चीन उठा सकता है
भारत और नेपाल के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। लोग बिना पासपोर्ट–वीजा के आवाजाही करते हैं। लाखों नेपाली भारत में रोजगार पाते हैं, जबकि भारत के लिए नेपाल पानी, एनर्जी और मिलिट्री स्ट्रैटजी के लिहाज से अहम है। भारत की सेना में आज भी हजारों गोरखा सैनिक हैं। यही वजह है कि नेपाल के हालात का असर भारत पर भी मुमकिन है।
भारत की सबसे बड़ी चिंता है कि नेपाल की अस्थिरता का फायदा चीन उठा सकता है। बीते कुछ सालों में काठमांडू में चीनी इनवेस्टमेंट और पॉलिटिकल इंटरफेरेंस काफी बढ़ा है। BRI परियोजनाओं के बहाने चीन नेपाल को अपने खेमे में खींचना चाहता है। इंडियन सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स को डर है कि अगर नेपाल में चीन का असर और ज्यादा हुआ, तो यह भारत की उत्तरी सीमा पर नया सिरदर्द बनेगा। पाकिस्तान के टेरर ग्रुप्स की घुसपैठ की भी आशंका जताई जा रही है। नेपाल का राजनीतिक खेल सिर्फ काठमांडू का मसला नहीं है, यह बीजिंग और नई दिल्ली की जंग का नया मोर्चा है।
अगर भारत ने नेपाल के यूथ की भावनाओं और राजनीतिक बदलाव को समय पर नहीं समझा, तो इससे नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी पर सवाल उठेंगे। चीन मौके का फायदा उठाकर अपनी पकड़ मजबूत करेगा। हालांकि, अगर भारत संतुलन साधकर डिप्लोमेसी और डेवलपमेंट दोनों पर जोर दे, तो यही भारत के लिए आपदा में अवसर बन सकता है।
नेपाल भारत का बड़ा कारोबारी साझेदार
नेपाल भारत का बड़ा कारोबारी साझेदार है। पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स से लेकर दवाइयों तक, नेपाल का ज्यादातर इंपोर्ट भारत से आता है। इसी तरह भारत के लिए नेपाल हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट्स और ट्रांजिट ट्रेड का अहम रास्ता है। हालांकि, मौजूदा अशांति से बॉर्डर ट्रेड पर असर पड़ा है। रक्सौल, जोगबनी और बनबसा जैसे बॉर्डर पॉइंट्स पर कारोबारियों को दिक्कतें हो रही हैं।
राजधानी काठमांडू में नाश्ते की दुकान चलाने वाले बिसेसर मंडल कहते हैं- यहां राजनीति काठमांडू में होती है, लेकिन असर सीधे बिहार और उत्तर प्रदेश की हमारी जिंदगी पर पड़ता है। वहीं, तराई इलाके के रहने वाले व्यापारी रामेश्वर सिंह कहते हैं- यहां संकट से हमारा कारोबार चौपट हो गया है। नेपाल में जो भी नेता आता है, उसकी नजर भारत पर रहती है। भारत को ही मदद करनी चाहिए। कुछ ऐसी व्यवस्था हो कि नेपाल की हालत सुधर सके।
बिहार के व्यापारी रंजीत महतो कहते हैं कि नेपाल में हुए आंदोलन से हमें नुकसान हुआ है। कई शहरों में हमारा माल फंसा है। हमारे हाथ से माल भी निकल चुका है और पैस भी नहीं मिले हैं। नेपाल में अगर हालात जल्द नॉर्मल नहीं हुए तो हमारे जैसे छोटे कारोबारियों का पूरा धंधा चौपट हो सकता है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
- एक्सपर्ट और काठमांडू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एजुकेशन के प्रोफेसर डॉ. टिकरम पौडेल कहते हैं - भारत की विदेश नीति के लिए नेपाल एक लिटमस टेस्ट की तरह है। हर बार जब काठमांडू में सत्ता बदलती है, नई दिल्ली को तुरंत एडजस्ट करना पड़ता है। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने नेपाल के साथ नेवर फर्स्ट पॉलिसी अपनाई है। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि चीन के मुकाबले भारत का असर यहां कम हुआ है। नेपाल की संसद में जो गठबंधन बनते-बिगड़ते हैं, उनका असर सीधे भारत-नेपाल संबंधों की दिशा तय करता है। यही वजह है कि भारत की नजर नेपाल की हर राजनीतिक चाल पर रहती है।
- काठमांडू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. बिनय कुमार मिश्रा कहते हैं- भारत को नेपाल में जनआंदोलन की असली वजह समझनी होगी। यह सिर्फ सत्ता संघर्ष नहीं, बल्कि युवाओं का भरोसा टूटना है। अगर भारत यहां केवल राजनीतिक दलों पर दांव लगाएगा, तो नुकसान हो सकता है। दक्षिण एशिया में नेपाल आज एक अहम देश बन चुका है। यह भारत-चीन और पाकिस्तान तीन देशों के लिहाज से अहम है। नेपाल में अगर कुछ होगा तो इसका इन तीन देशों पर असर होना तय है। नेपाल के पॉलिसी मेकर्स इस बात को समझते हैं। वहीं, भारत को अपनी इंटेलिजेंस और डिप्लोमैटिक ग्रिप मजबूत करनी होगी। नेपाल में अस्थिरता से सीमा पार आतंकी खतरे और चीन का दखल दोनों बढ़ सकते हैं।

