AK-203 अब 100% मेड इन इंडिया: फायरिंग टेस्ट सक्सेस, सितंबर में इंडियन आर्मी ट्रायल लेगी; जानिए भारत के लिए यह बड़ा अचीवमेंट क्यों
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AK-203 राइफल को रूस ने 2028 में तैयार किया। इसके एक साल बाद ही भारत ने इसे अपने देश में बनाने का फैसला लिया।
नेशनल डेस्क। भारत ने डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। रूस की मशहूर कलाश्निकोव सीरीज की AK-203 ‘शेर’ राइफल का 100% भारतीय वर्जन तैयार हो गया है। अमेठी की कोरवा ऑर्डनेंस फैक्ट्री में बनी इस राइफल का 23 अगस्त को सफल टेस्ट-फायर किया गया।
खास बात यह है कि इस राइफल में इस्तेमाल होने वाला हर पार्ट और कच्चा माल भारतीय कंपनियों से लिया गया। यानी अब यह सिर्फ भारत में असेंबल होने वाली रूसी राइफल नहीं रही, बल्कि पूरी तरह भारतीय सप्लाई चेन से तैयार होने वाली AK-203 बन गई है। अब सितंबर 2026 में इन राइफलों को भारतीय सेना को ट्रायल के लिए दिया जाएगा।
ट्रायल सफल रहने के बाद ये राइफल सेना की पुरानी INSAS राइफल को रिप्लेस कर सकती हैं। भारत के लिए यह एक बड़ा अचीवमेंट माना जा रहा है। इस आर्टिकल में यही जानेंगे की आखिर यह राइफल देश के लिए क्यों खास है...

पहले जानिए, AK-203 ‘शेर’ क्या है?
AK-203 रूस की मशहूर अवतोमात कलाश्निकोव (AK) राइफल फैमिली का एडवांस मॉडल है। भारत में इसे ‘शेर’ नाम दिया गया है। इसे अमेठी की कोरवा फैक्ट्री में इंडो-रशियन राइफल प्राइवेट लिमिटेड (IRRPL) तैयार कर रही है।
इसका वजन करीब 3.6 किलो है और इसमें 7.62×39 mm की गोली इस्तेमाल होती है। यह एक मिनट में करीब 700 राउंड फायर कर सकती है। इसका मैक्सीमम टारगेट एंगेजमेंट रेंज करीब 800 मीटर है, जबकि बैटल साइट रेंज 350 मीटर आंका गया है।
यानी यह पुरानी AK-47 जैसी राइफल का सिर्फ नया नाम नहीं है, बल्कि कलाश्निकोव प्लेटफॉर्म का ज्यादा एडवांस्ड वर्जन भी है।

AK-203 क्या INSAS राइफल से बेहतर है?
DRDO की बनाई INSAS को भारतीय सेना में 1990 के दशक में शामिल किया गया था। दुनिया में अब और एडवांस्ड राइफलें आ चुकी हैं। यह देखते हुए लंबे अरसे से भारत में भी राइफल अपग्रेड होने की जरूरत थी। इसके साथ ही वक्त के साथ सैनिकों की ओर से भी INSAS में कई दिक्कतों की शिकायतें आने लगीं। इनमें राइफल के जाम होने और बेहद ठंडे मौसम में मैगजीन में दरार आने जैसी समस्याएं शामिल थीं।
AK-203 इन सब कमियों को दूर करने के मकसद से ही बनाई गई। AK-203 हल्की है, इसमें ज्यादा राउंड आते हैं और इसकी रेंज भी INSAS से ज्यादा है।

AK-203 पूरी तरह मेड इन इंडिया कैसे बनी?
भारत और रूस ने 2019 में AK-203 राइफलों को भारत में बनाने के लिए समझौता किया। इसके बाद अमेठी में IRRPL के जरिए इसका प्रोडक्शन शुरू हुआ।
शुरुआत में भारत में बनने वाली राइफलों में बड़ी मात्रा में रूस से आए सामानों का इस्तेमाल होता था। यानी राइफल के कई हिस्से विदेश से आते थे और भारत में उन्हें जोड़कर तैयार किया जाता था।
धीरे-धीरे भारतीय कंपनियों को सप्लाई चेन में जोड़ा गया। 2025 के मध्य तक राइफल में भारतीय सामग्री की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी तक पहुंची। अब कंपनी का दावा है कि उसने हर पार्ट और हर इनपुट के लिए भारतीय सोर्स तैयार कर लिए हैं।
IRRPL को भारतीय सशस्त्र बलों के लिए 6 लाख से ज्यादा AK-203 राइफलें तैयार करनी हैं। इनकी सप्लाई दिसंबर 2030 तक पूरी करने की योजना है।

सेना और डिफेंस इंडस्ट्री को इससे क्या फायदा होगा?
अगर सितंबर में होने वाले ट्रायल सफल रहते हैं और राइफल को सेना की मंजूरी मिलती है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सेना को बड़ी संख्या में आधुनिक राइफल देश में ही मिल सकेगी।
इससे विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम होगी। युद्ध या किसी बड़े इंटरनेशनल डिप्रेशन के वक्त अगर विदेश से पार्ट्स या हथियारों की सप्लाई रुकती है, तो घरेलू प्रोडक्शन ज्यादा भरोसेमंद साबित हो सकता है।
दूसरा फायदा भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री को होगा। AK-203 के हर पार्ट के लिए स्थानीय कंपनियों के तैयार होने का मतलब है कि भारत में एक डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को और बूस्ट मिलेगा।
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